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दस लाख दूँगा मगर बदले में शराब पर दस ग़ज़लें चाहिए

मुझे लगता है कि एक अच्छा रचनाकार या कलाकार एक साथ तीन काल खंडों में जीता है। उसके फ़न और हुनर में गुज़रे हुए ज़माने की अनुगूँज होती है। मौजूदा दौर की धड़कन होती है और आने वाले वक़्त के क़दमों की आहट होती है। ये क़ाबिलियत जगजीत सिंह के फ़न और शख़्सियत में बख़ूबी नज़र आती थी।

मुझे लगता है कि एक अच्छा रचनाकार या कलाकार एक साथ तीन काल खंडों में जीता है। उसके फ़न और हुनर में गुज़रे हुए ज़माने की अनुगूँज होती है। मौजूदा दौर की धड़कन होती है और आने वाले वक़्त के क़दमों की आहट होती है। ये क़ाबिलियत जगजीत सिंह के फ़न और शख़्सियत में बख़ूबी नज़र आती थी।

अपने इसी हुनर के दम पर उन्होंने पूरी दुनिया को यानी जग को जीत लिया और अपने नाम जगजीत सिंह को सार्थक बना दिया। अपने इसी आला फ़न के चलते वे लगातार तीन-तीन पीढ़ियों के दिलों पर राज करते रहे।

आख़िरी समारोह : पिछले माह 9 सितम्बर 2011 को उनसे मुम्बई के एक समारोह में मुलाक़ात हुई थी। गायिका रश्मिश्री के भक्ति अलबम ‘शेरावाली की नगरिया’ का लोकार्पण करने के लिए जगजीत सिंह बतौर मुख्य अतिथि पधारे थे। संगीत के समंदर में कितने उतार-चढ़ाव आए मगर युवा पीढ़ी में आज भी उनका क्रेज बरक़रार है। समारोह ख़त्म होने के बाद वे आधे घंटे तक नौजवानों के साथ फोटो खिचवाते रहे। वे इतने तरो-ताज़ा और स्मार्ट नज़र आ रहे थे कि जब 23 सितम्बर को उनके ब्रेन हैमरेज की ख़बर आई तो एक बारगी किसी को यक़ीन ही नहीं हुआ। यही शायद उनकी ज़िंदगी का आख़िरी समारोह था, जिसमें उन्होंने जमकर समोसे और मिठाइयाँ खाईं, कई युवा कलाकारों को मुक्तकंठ से आशीर्वाद दिया और सबसे मज़ाकिया लहजे में गुफ़्तगू करते रहे। फिर वो वक़्त भी आया जब 10 अक्टूबर को उन्होंने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

जगजीत सिंह और राजेंद्र मेहता : जगजीत सिंह 1965 में मुम्बई आ गए थे। 1967 में उनकी दोस्ती गायक राजेंद्र मेहता से हो गई। 1965 से 1969 तक दोनों ने एक साथ कई कार्यक्रम किए। इनमें सबसे उल्लेखनीय आयोजन था- ‘ग़ालिब से गुलज़ार तक’। इसमें मीरो-ग़ालिब से लेकर गुलज़ार तक की ग़ज़लों के ज़रिए ग़ज़ल के इतिहास को बड़ी ख़ूबसूरती से पेश किया गया था। इस कार्यक्रम की तैयारी के दौरान राजेंद्र मेहता ने मशहूर संगीतकार नौशाद से मुलाक़ात की और उनसे मशविरा किया कि ग़ज़लों को कम्पोज़ कैसे किया जाए। नौशाद ने कहा कि ग़ज़ल इतनी ख़ूबसूरत चीज़ है कि उसे गाने की ज़रूरत ही नहीं है। उसे तो बस मुहब्बत के साथ पेश करने की ज़रूरत है। यानी जैसे तहत में ग़ज़ल को पढ़ा जाता है उसी तरह गुनगुनाकर ग़ज़ल को पेश कर दिया जाए। बेहतर ये होगा कि ग़ज़ल को गुनगुनाने से पहले दस बार तहत में पढ़ा जाए ताकि उसका मानी खुल जाए-

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी / कि हर ख़्वाहिश पे / दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन / फिर भी कम निकले

नौशाद साहब का मशविरा राजेंद्र मेहता और जगजीत सिंह को बहुत पसंद आया। इन दोनों ने हमेशा सही जगह पर पॉज देकर ग़ज़लों को उसी तरह कम्पोज़ किया जैसे वे पढ़ीं जाती हैं। आपने देखा होगा कि जगजीत सिंह ने कभी भी ग़ज़ल गायिकी में रागदारी का कमाल दिखाने की कोशिश नहीं की। उनकी ग़ज़ल गायिकी बेग़म अख़्तर, कुंदनलाल सहगल और तलत महमूद की रिवायती गायिकी से अलग रंग-रूप लेकर सामने आई। उन्होंने वायलिन, गिटार और की-बोर्ड जैसे आधुनिक वाद्य यंत्रों के ज़रिए ग़ज़ल गायिकी के हुस्न को निखारा और देखते-ही देखते संगीत के आकाश पर सितारे की तरह जगमगाने लगे। उनकी इस कामयाबी ने ग़ज़ल के सामयीन में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा किया।

जगजीत के जीवन के आखिरी समारोह की कुछ तस्वीरें

चित्रा और जगजीत सिंह : शुरुआती दौर में जगजीत सिंह दाढ़ी-मूँछ रखते थे। ये बात काफ़ी दूर तक फैल गई थी कि चित्रा सिंह की मुहब्बत में जगजीत सिंह ने अपनी दाढ़ी-मूँछ साफ़ करा दी। सचाई ये है कि ग़ज़ल सिंगर बनने के जुनून में जगजीत सिंह मिस्टर क्लीन बने। मुम्बई में शास्त्रीय संगीत की एक बहुत प्रतिष्ठित संस्था है सुर सिंगार संसद। इसके मंच को पूरे देश के कलाकार संगीत के एक तीर्थ की तरह सम्मान देते हैं। सन 1967 में पहली बार इस मंच पर ग़ज़लें पेश करने के लिए राजेंद्र-नीना मेहता की जोड़ी को आमंत्रित किया गया। ग़ज़ल की इस पहली जोड़ी को ग़ज़ल प्रेमियों ने बहुत पसंद किया। जगजीत सिंह ने संस्था के अध्यक्ष पं. बृजनारायण से मुलाक़ात की। उन्होंने कहा- सरदार से ग़ज़ल कौन सुनेगा। बेहतर होगा कि तुम अपनी दाढ़ी-मूँछ साफ़ करा दो। जगजीत सिंह ने उनकी बात मान ली। ग़ज़ल का कार्यक्रम पेश किया और छा गए। 1969 में चित्रा सिंह से प्रेम विवाह के बाद जगजीत सिंह ने उनके साथ जोड़ी बनाई जो ग़ज़ल की दुनिया की बेमिसाल जोड़ी साबित हुई।

जगजीत सिंह और सुदर्शन फ़ाक़िर : मेरे दोस्त शायर सुदर्शन फ़ाक़िर अक्सर जगजीत सिंह का ज़िक्र छेड़ देते थे। दोनों की पढ़ाई-लिखाई जालंधर में हुई थी और मुम्बई में उनकी दोस्ती परवान चढ़ी। फ़ाक़िर साहब की शायरी को जगजीत सिंह इतना अधिक पसंद करते थे उन्होंने अपने एक अलबम ‘दि लेटेस्ट’ में सारे कलाम फ़ाक़िर साहब से लिखाए। सन 1982 में रिलीज़ इस अलबम ने कामयाबी का कीर्तिमान रच दिया। इसका एक नग़्मा जगजीत सिंह की स्थायी पहचान बन गया-

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

उस समय शायरों को एक ग़ज़ल के लिए प्रायः हज़ार-दो हज़ार मेहनताना मिलता था। जगजीत सिंह ने फ़ाक़िर साहब से पूछा- ‘आप रॉयल्टी लेना पसंद करेंगे या नकद चाहिए?’ फ़ाक़िर साहब ने फ़ौरन कहा- ‘मुझे एक लाख नकद चाहिए’। उस समय यह काफ़ी बड़ी रकम थी मगर जगजीत सिंह ने एचएमवी से उन्हें एक लाख रुपए दिलाए। जब एचएमवी ने फ़ाक़िर साहब के लिखे भक्ति अलबम ‘हे राम’ को दुबारा जारी किया तो जगजीत सिंह ने उन्हें दुबारा भारी-भरकम धनराशि का भुगतान कराया। क़रीब 20 साल पहले फ़ाक़िर साहब ने मुम्बई में मकान ख़रीदने का इरादा किया और जगजीत सिंह से मदद माँगी। जगजीत सिंह ने हँसते हुए कहा- ‘दस लाख दूँगा मगर बदले में शराब पर दस ग़ज़लें चाहिए।’ फ़ाक़िर शाहब ने लिखकर दे दिया और मकान ख़रीद लिया। जगजीत सिंह ने अगले अलबम में उनकी एक ग़ज़ल शामिल की –

शेख़जी थोड़ी सी पीकर आइए
मय है क्या शै फिर हमें समझाइए

ग़ज़ल के गुलशन ने कई रंग बदले। रॉक, पॉप और रैप के चलते कई कलाकार फिसले मगर जगजीत सिंह कभी भी भटकाव का शिकार नहीं हुए। वे हमेशा ग़ज़ल के हमसफ़र बने रहे। दुनिया के हर शायर की ख़्वाहिश रही है कि जगजीत सिंह उन्हें गाएं। पिछली मुलाक़ात यानी 9 सितम्बर को उन्होंने अपनी सेक्रेटरी पारुल चावला को बुलाकर कहा- पांडेय जी को अपना ई-मेल दे दो और इनसे चार-पाँच ग़ज़लें मँगा लो। मैंने ग़ज़लें तो भेज दीं मगर ये ख़्वाब अधूरा रह गया-

आज फिर दिल ने इक तमन्ना की
आज फिर दिल को हमने समझाया

लेखक देवमणि पांडेय कवि और मंच संचालक हैं. केंद्र सरकार के कर्मचारी देवमणि के दो काव्‍य संग्रह “दिल की बातें” और “खुशबू की लकीरें” प्रकाशित हो चुकी हैं. इन्‍होंने कई फिल्‍मों के लिए गीत भी लिखे हैं. इनसे सम्‍पर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. ROHIT KRISHNA NANDAN

    October 12, 2011 at 11:03 am

    bahut khoob……….yaado me jagjeet hmesha rahenge ek dilnashi ehasaas bankar

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