दस लाख दूँगा मगर बदले में शराब पर दस ग़ज़लें चाहिए

मुझे लगता है कि एक अच्छा रचनाकार या कलाकार एक साथ तीन काल खंडों में जीता है। उसके फ़न और हुनर में गुज़रे हुए ज़माने की अनुगूँज होती है। मौजूदा दौर की धड़कन होती है और आने वाले वक़्त के क़दमों की आहट होती है। ये क़ाबिलियत जगजीत सिंह के फ़न और शख़्सियत में बख़ूबी नज़र आती थी।

‘हिंदी को ऐसे कई केशव राय चाहिए’

: विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले कई युवा व प्रतिभाशाली हस्तियों को विश्व हिंदी सेवा सम्मान से विभूषित किया गया : अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद और विश्व हिंदी सेवा सम्मान अलंकरण समारोह उज्जैन में सम्पन्न :

महिला दिवस और कुरार गांव की औरतें

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) का ज़िक्र होते ही मुझे कुरार गाँव की औरतों का ध्यान आता है। मुम्बई के उपनगर मालाड (पूर्व) में ईस्टर्न हायवे से सटी हुई विशाल बस्ती का नाम है ‘कुरार गाँव’। दूर तक इस बस्ती के सिर पर बस सीमेंट की छतें नज़र आती हैं। बीस साल पहले जब मैंने वहाँ एक चाल में अपना रैन बसेरा बनाया था तो यहाँ छ: पार्षद थे यानी लगभग 6 लाख की आबादी थी। बहुत कुछ बदला मगर न तो ‘कुरार गाँव की औरतें’ बदलीं और न ही उनकी ज़िंदगी बदली। उनका सोच-विचार और व्यवहार आज भी वैसा ही है। मुझे उस समय किंचित आश्चर्य हुआ था कि मेरे पड़ोसी टिम्बर मर्चेंट कासिम की बीवी ही नहीं जवान बेटी भी अनपढ़ है। सर पर डिब्बा लादकर इडली बेचने वाले अन्ना की पत्नी अनपढ़ है तो सिक्योरिटी गार्ड तिवारी की पत्नी भी अनपढ़ है। कुल मिलाकर उस गांव में अनपढ़ औरतों की संख्या काफी थी।

”…शायरी ख़ुदकशी का धंधा है…”

[caption id="attachment_15556" align="alignnone"]लोकार्पण समारोहलोकार्पण समारोह : बाएं से दाएं- श्रीमती ख़ुशनुम राव, श्रीमती राजश्री बिरला, ललित डागा, डॉ.कर्ण सिंह, प्रो.नंदलाल पाठक और श्री विश्वनाथ सचदेव[/caption]

संगीत कला केंद्र द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में मुम्बई के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. नंदलाल पाठक के काव्य संकलन ‘फिर हरी होगी धरा’ का लोकार्पण डॉ. कर्ण सिंह ने किया।

स्वतंत्रता दिवस पर देवमणि के तीन गीत

15 अगस्त के बारे में सोचते हुए सबसे पहले स्व.कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की पंक्तियाँ याद आती हैं। उन्होंने लिखा था – ‘क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है / जिन्हें एक पहिया ढोता है / या इसका कोई ख़ास मतलब होता है’। क्या आज भी धूमिल की पंक्तियाँ प्रासंगिक नहीं लगती हैं? स्व. दुष्यंत कुमार भी कह गए हैं- ‘कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए / कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए’। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उ.प्र. के गोण्डा ज़िले के किसान शायर रामनाथ सिंह उर्फ़ अदम गोण्डवी ने लिखा- ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है / दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है‘। मुम्बई के विश्वस्तर के सी-लिंक पर हम गर्व कर सकते हैं मगर महाराष्ट्र के किसानों की दशा किसी से छुपी नहीं है।

…कचौड़ी गली सून कइले बलमू…

13 जुलाई को सावन माह का पहला सोमवार था। सावन में तीज का त्योहार मनाया जाता है। राजस्थान में इसे हरियाली तीज और उत्तर प्रदेश में कजरी तीज या माधुरी तीज कहा जाता है। हरापन समृद्धि का प्रतीक है। स्त्रियाँ हरे परिधान और हरी चूड़ियाँ पहनती हैं। हरे पत्तों और लताओं से झूलों को सजाया जाता है। झूले और कजरी के बिना सावन की कल्पना नहीं की जा सकती। हमारे यहाँ हर त्योहार के पीछे कोई न कोई सामाजिक या वैज्ञानिक कारण होता है। कुछ लोगों का कहना है कि बरसात में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। झूला झूलने से हमें अधिक ऑक्सीजन मिलती है। कजरी में प्रेम के दोनों पक्ष यानी संयोग और वियोग दिखाई देते हैं। कभी-कभी इसके पीछे बड़ी मार्मिक दास्तान भी होती है। आज़ादी के आंदोलन का दौर था। शहर में कर्फ़्यू लगा हुआ था।

मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो

[caption id="attachment_15053" align="alignnone"]लोकार्पणविश्वनाथ सचदेव, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, रामनारायण सराफ, डॉ.रामजी तिवारी, देवी प्रसाद त्रिपाठी, सागर सरहदी, अशोक सिंह और धीरेन्द्र अस्थाना[/caption]

धीरेन्द्र अस्थाना का उपन्यास ‘देश निकाला’ मुम्बई के फिल्मी जीवन का आईना है। इसमें वर्तमान यथार्थ से आगे जाकर एक नए यथार्थ को स्थापित करने की सराहनीय कोशिश की गई है। ये विचार जाने माने कथाकार जगदम्बा प्रसाद दीक्षित ने शनिवार 13 जून को लोकमंगल द्वारा मुम्बई के दुर्गादेवी सराफ सभागृह में आयोजित लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए। पहली बार शायद ऐसा हुआ कि दीक्षित जी वामपंथी चिंतन और साम्राज्यवादी चिंता से मुक्त होकर मुक्तभाव से बोले। उन्होंने आगे कहा कि फ़िल्म जगत में मां बनने के बाद अभिनेत्री का कैरियर खत्म हो जाता है। मगर इस उपन्यास की नायिका मल्लिका को मां बनने के बाद भी प्रमुख भूमिकाओं के प्रस्ताव मिलते हैं।

‘संस्कृति संगम’ का लोकार्पण पंकज उधास ने किया

लोकार्पणमुम्बई महानगर में दो ही जहान सक्रिय हैं- बॉलीवुड और क्रिकेट। इससे आगे भी कोई जहान है, इस बारे में कोई सोचता ही नहीं। देवमणि पाण्डेय ने साहित्यकारों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, सुगम-शास्त्रीय गायकों आदि के जरिए एक और जहान को प्रस्तुत करके साबित कर दिया है कि ‘सितारों से आगे जहां और भी हैं।’ ये विचार जाने माने ग़ज़ल गायक पंकज उधास ने कवि देवमणि पाण्डेय द्वारा सम्पादित मुम्बई की सांस्कृतिक निर्देशिका ‘संस्कृति संगम‘ के चौथे संस्करण के विमोचन के अवसर पर व्यक्त किए।