ये कैसी पत्रकारिता है मेरे भाई : भोपाल से पिछले दिनों एक खबर उड़ी कि स्वाइन फ्लू का एक संधिग्ध मरीज़ सामने आया है. उसे आगे चेकअप के लिए मेडिकल कालेज भेजा गया. बताया गया कि वो सउदी अरब से आया है. उसके कई सारे टेस्ट हुए और बाद में वो कथित रोगी गायब हो गया. आनन-फानन में ये खबर आग की तरह फैल गई. तुरंत सभी रीजनल चैनलों ने खबरें फ्लैश कर दी, फोनो होने लगे. इस बारे में नेशनल चैनलों ने संयम रखा और मामला संदिग्ध दिखने के कारण किसी ने भी अपने ऑफिस में इसकी सूचना तक नहीं दी. दरअसल ये एक नेशनल चैनल के रिपोर्टर का स्टिंग आपरेशन था जो यह तय करने के लिए किया गया था कि अस्पताल में इस बीमारी से निपटने की कितनी तैयारी है.
शाम को वो खबर की शक्ल में स्टिंग आपरेशन चैनल पर चला भी. उसके अगले दिन जब भोपाल के अखबार छपे तो पूरे अखबारों में प्रमुखता से इस खबर को छापा गया. कुछ ने तो अस्पताल की खिंचाई कर डाली इस हेडिंग के साथ कि ‘स्वाइन फ्लू के मरीज को बैरंग लौटाया अस्पताल ने’. जितने भी लोगों ने नामचीन अखबारों को पढ़ा होगा, उनके मन में दहशत होगी कि स्वाइन फ्लू का मरीज़ कहां है, कौन था? एक तरह से पैनिक फैलाने वाले इस पत्रकारिता को क्या कहें? यदि दायित्व निर्धारण करने बैठे तो कई सवाल इस पत्रकारिता पर उठते हैं. सबसे पहले सवाल इस स्टिंग पर… यदि आप सनसनी फैलाने वाली पत्रकारिता टीआरपी के लिए करते हैं तो भी आप जैसे ‘सयाने’ को कुछ देर के बाद अस्पताल को बता देना चाहिए था कि इस खबर को अखबारों के नुमाइंदों को ब्रीफ नहीं करिएगा, दरअसल हम इन्तजामों को परख रहे थे. लेकिन उन महानुभाव ने ऐसा नहीं किया, लिहाजा अस्पताल उनके बारे में और उनसे मिली फाइंडिंग्स को पत्रकारों को बताते रहे और इस अफवाह को दिन भर पैर मिलते रहे. उनको मज़ा आ रहा था कि उनकी छोड़ी गई पुड़िया से पूरा भोपाल हलाकान हो रहा है.
अब बात अखबारों के उन “काबिल पत्रकारों” की जो हमेशा से खुद को इलेक्ट्रानिक मीडिया से बेहतर बताने में तुले रहते हैं. किस तरह भोपाल में डेस्क रिपोर्टिंग होती है, ये खबर इसका जीवंत उदाहरण है. सभी ने फोन पर खबर सुनी और अखबार में छाप दिया. हेल्थ बीट कवर करने वाला किसी रिपोर्टर ने अस्पताल जाकर ये देखने की ज़हमत नहीं उठाई कि कथित रोगी किस नाम से अस्पताल में दाखिल हुआ है, उसका पता क्या है? यदि इतनी-सी मेहनत प्रिंट के रिपोर्टर करते तो उन्हें तुरंत पता चल जाता क्योंकि वो स्टिंग करने वाला पत्रकार अपने ही नाम और पते से अस्पताल में दाखिल हुआ था और कम से कम भोपाल की पूरी पत्रकारिता की जमात उसे पहचानती है और नाम पता-समान होने पर लोग कम से कम उससे ये तो पूछ सकते थे कि………. “भाई तू तो भोपाल में रहता है, तेरा सउदी अरब से क्या नाता है?” ये नमूना है उस पत्रकारिता का जिसने अकारण पूरे भोपाल में एक शंका फैला दी. आज तक किसी ने इस बात को सार्वजानिक नहीं किया कि वो कथित मरीज़ कौन है. दूसरी बात ये कि अखबारों के दफ्तर में भी टीवी रखा होता है. इस खबर को किसी न किसी ने सिर्फ इस कारण तो देखा होगा कि मसला अपने शहर से जुड़ा हुआ है लेकिन कोई सावधानी रखे बिना इसे ऐसे छाप दिया जैसे स्वाइन फ्लू भोपाल तक आ गया हो. किसी की नज़र में ये स्टिंग आपरेशन नहीं आया. ऐसी पत्रकारिता सरकार और समाज दोनों को परेशान करने वाली है. मेरी सलाह (बिना मांगे) प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों के लिए है कि अपने गिरेबान में कुछ तो झांको भाई…………
लेखिका जाग्रति पाठक भोपाल की रहने वाली हैं और पत्रकारिता पर करीब से नजर रखती हैं। उनसे संपर्क करने के लिए [email protected] का सहारा ले सकते हैं।












Anurag pathak
September 4, 2010 at 8:42 am
Are ye to whi bat ho gyi ki kisi n kha k vo tumhra kan le gya or sab uske piche bhag liye kisi n kan ko dekhne ki kosis nhi ki
dharmendra singh thakur
September 4, 2010 at 11:50 am
jagrati ji kam se kam aap hi us patrakar ka nam bata deti.