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गिरीश मिश्रबिहार का आगामी विधानसभाई चुनाव क्या जातियों का पारंपारिक व्यूहचक्र तोड़ रहा है? चुनावी शतरंज पर जातियों की बिसात क्या नई शक्ल अख्तियार कर रही है? क्या जातियों का नया गठजोड़ अब सिर्फ जातीय संदर्भ में न होकर सुशासन, विकास और शांति-व्यवस्था के नए पैमाने पर भी निर्मित होगा, जिसकी संरचना कुछ-कुछ वर्गीय होगी? क्या ऐसे अनेक सवाल बिहार को एक नए खांचे में वाकई बांट रहे हैं या फिर एक तबके द्वारा इसे एक नए चश्मे से देखने-दिखाने का प्रयास भर है?

गिरीश मिश्रबिहार का आगामी विधानसभाई चुनाव क्या जातियों का पारंपारिक व्यूहचक्र तोड़ रहा है? चुनावी शतरंज पर जातियों की बिसात क्या नई शक्ल अख्तियार कर रही है? क्या जातियों का नया गठजोड़ अब सिर्फ जातीय संदर्भ में न होकर सुशासन, विकास और शांति-व्यवस्था के नए पैमाने पर भी निर्मित होगा, जिसकी संरचना कुछ-कुछ वर्गीय होगी? क्या ऐसे अनेक सवाल बिहार को एक नए खांचे में वाकई बांट रहे हैं या फिर एक तबके द्वारा इसे एक नए चश्मे से देखने-दिखाने का प्रयास भर है?

दिलचस्प ये है कि ऐसे सवाल चुनावी हवा में तैरते हुए अपनी जगह हैं, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री पद के दो दावेदारों-लालू यादव और नीतीश कुमार की सीधी जंग है. लोगों ने दोनों के काम को देखा और परखा है, इसलिए किसी को इनके काम, शैली, सोच, अंदाज और पृष्ठभूमि को लेकर कुछ खास नया कहने को नहीं रह जाता. फिर भी कुछ नए पक्ष चुनाव को लेकर जरूर उभर रहे हैं- जो संकेत करते हैं कि सब कुछ वैसा ही नहीं होने जा रहा, जैसा कि पिछले कई दशकों से चल रहा था या फिर बस चलता जा रहा था.

लालू की राजद और रामविलास पासवान की लोजपा एकसाथ खड़ी हैं नीतीश की अगुवाई वाली राजग के सामने. राजद-लोजपा गठबंधन ने मुख्यमंत्री पद के लिए लालू और उपमुख्यमंत्री पद के लिए लोजपा के रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस के नाम घोषित किए हैं. दरअसल  ऐसा करके राजद के पारंपारिक वोट बैंक यादव-मुस्लिम और लोजपा के दलितों को एकजुट करने की कोशिश की गई है. नीतीश सरकार के बटाईदारी और भू-सुधार कार्यक्रमों से नाराज सवर्णों खासकर राजपूतों को जोड़ने की कोशिश भी लालू-पासवान ने की है. इनकी बांछें पिछले साल विधानसभाई उपचुनावों के नतीजों को लेकर भी खिली हैं, जब राजग 18 सीटों में से 13 पर चुनाव हार गई थी, तब बटाईदारी और भू-सुधार को लेकर न केवल भारी तनाव था, बल्कि सवर्ण तबके में रोष भी था.

उधर, राजग नीतीश कुमार की अगुवाई में ‘55 साल बनाम पांच साल’ का नारा उछाल कर ये संदेश दे रही है कि नीतीश के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि जातीयता से ग्रसित बिहार में कोई भी जातीय या सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए. अपहरण की घटनाएं बहुत कम हो गईं, अपराधियों को हजारों की संख्या में जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया गया. जाहिर है राजग शांति-व्यवस्था, सुशासन और विकास के नाम पर वोट मांग रहा है. वैसे जातीय धरातल पर नीतीश के साथ कुर्मी-कोइरी, पसमांदा मुसलमान, अति पिछड़े और महादलित तबकों की एकजुटता दिखती है.

राजग उत्साहित है 2009 के पिछले लोकसभा चुनाव नतीजों को लेकर, जब उसे 40 में से 32 सीटें मिली थीं. वो इनकी पुनरावृत्ति विधानसभाई चुनावों में भी चाहती है- और इसीलिए वो ‘लालू के जंगलराज से मुक्ति’ के पुराने नारे को फिर से उछाल भी रही है. इनके अलावा वामपंथी पार्टियां-भाकपा माकपा और भाकपा (माले)-एकजुट होकर मैदान में हैं. कांग्रेस को भरोसा महासचिव राहुल गांधी के करिश्मे पर है. उसे उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश की तरह राहुल बिहार में भी अपने करिश्माई व्यक्तित्व और दौरों से खोए जनाधार को फिर से कांग्रेस की ओर मोड़ सकते हैं.

मजे की बात है कि बिहार के इस चुनावी परिदृश्य के बीच राममनोहर लोहिया का कथन याद आता है-‘जातियां भारतीय समाज की सबसे सुरक्षित बीमा पालिसी हैं और वो चुनावी संदर्भों में सबसे ज्यादा लाभकारी पालिसी भी रही हैं.’ इसी पालिसी के बूते आज भी विभिन्न पार्टियां अपने समीकरण बैठा रही हैं.अभी पिछले दिनों लालू ने कहा था कि नीतीश को तो हमारा अहसानमंद होना चाहिए कि अब बिहार में कोई सवर्ण मुख्यमंत्री होने को सोच भी नहीं सकता.

दरअसल मंडल आयोग की पृष्ठभूमि में बिहार में 1990 के लगभग लालू का एक मजबूत पिछड़ी जातियों का वोट बैंक तैयार हुआ था, और लंबे  समय तक उसी के असर में चुनाव होते रहे. इसमें अल्पसंख्यकों की सहानुभूति भी इसलिए शामिल हो गई कि जब मंदिर के नाम पर हो रही रथयात्रा को कोई छूने की भी नहीं सोच रहा था, तो लालू ने इस पर बाकायदा विराम लगा दिया. जाहिर है कि कांग्रेस की कमजोरी का फायदा भी लालू ने उठाया, लेकिन लालू ने इसके पहले इंदिरा गांधी के वोट बैंक को तोड़ने की शुरुआत कर दी थी. बिहार में कांग्रेस का वोट बैंक था-ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक.

गौर से देखें तो इंदिरा गांधी के इसी वोट बैंक के असर में 1969 से 1990 तक चुनाव हुए या कह लें कि इनके निर्णायक प्रभाव का फायदा कांग्रेस  को मिला. हां, 1977 जरूर इसमें अपवाद रहा. लेकिन अब लालू-पासवान अपने नए गठबंधन के जरिए जिस दरकते हुए वोट बैंक को संभालना चाह रहे हैं- सारी निगाहें उन्हीं पर लगी हुई हैं. नीतीश ने बहुत चतुराई से सरकार संभालते ही पिछड़ों और दलितों के जातीय वोट बैंक में सेंध लगा दी थी. पिछड़ों में यादवों की लाठी और उनके वर्चस्व के समानान्तर एक और रेखा अति पिछड़ों की खड़ी करके नीतीश ने कुशल दांव खेला.

गौर करने की बात ये है कि कुल आबादी के ३२ फीसदी अति पिछड़ों को विकास से जोड़ कर, भले ही धीमी प्रक्रिया के तहत, नीतीश ने एक तीर से कई निशाने साधे. इसी तरह दलित तबके के बीच जो ज्यादा कमजोर थे, उन्हें महादलित के रूप में चिन्हित करके जोड़ने के प्रयास किए गए. अति पिछड़ों की तरह महादलित भी दलितों की आबादी के 31 फीसदी हैं. ऐसा करके नीतीश ने बिहार की सियासत में लालू और पासवान जैसे दोनों मजबूत प्रतिद्वंद्वी स्तंभों को सीमित करने का ही काम किया है. सर्वेक्षणों में यह बात भी प्रमुखता से उठी है कि महादलितों में से कोई भी आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर नहीं हैं. इस सच्चाई को भावनात्मक रूप से भी नीतीश ने भुनाने की कोशिश की और पासवान के दलित वोट बैंक को कमजोर करने के लिए कई और दलित जातियों को भी महादलितों की श्रेणी में डालकर उन्हें भी अति पिछड़ों की तरह आरक्षण की सुविधा और सरकारी मदद मुहैया कराई.

वैसे इन सारे चुनावी द्वंद्व-अंतरद्वंद्व के बीच जहां नए जातीय गठजोड़ आकार लेते दिख रहे हैं, वहीं जातीय संदर्भों के हाशिए पर जाने और मुद्दों के आधार पर वर्गीय गोलबंदी की संभावना भी प्रभावी होती दिख रही है. वैसे नीतीश को जितनी चुनौती लालू-पासवान खेमे से है, उससे कहीं ज्यादा खतरा खुद राजग के अंदर जदयू-भाजपा द्वंद्व से है. इस खतरे की आशंका ज्यादा इसलिए भी है क्योंकि अगले हफ्तों में अयोध्या विवाद को लेकर आने वाले फैसलों का असर बिहार चुनाव पर पड़ना लाजिमी है. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी के ‘उद्गारों’ को लेकर नीतीश पहले भी अपने सख्त रुख से मुसलमानों के बीच अपनी छवि को संवारने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन नीतीश की थोड़ी भी असावधानी लालू के इस कथन को सच साबित कर सकती है कि ‘नीतीश सांप्रदायिक तत्वों की गोद में बैठे हुए हैं’, तब शायद मुसलमानों खासकर पसमांदा मुसलमानों के लिए किए गए उनके काम भी असरहीन साबित हों.

वैसे भी लालू की तरह ही पासवान का अल्पसंख्यक प्रेम भी किसी से छिपा नहीं है, जब 2005 में मुस्लिम मुख्यमंत्री की पासवान की मांग के चलते कोई समझौता नहीं हो पाया था. नीतीश के लिए एक और खतरा माओवादियों से भी है. भले ही उनकी सरकार ये दावा करे कि नीतीश के राज में माओवादी हमले पहले ही तुलना में कम हुए हैं, लेकिन लोग भूले नहीं हैं कि हाल में चार पुलिसकर्मियों के अगवा होने पर नीतीश किस तरह टीवी पर दुनिया के सामने लाचार और अक्षम मुख्यमंत्री के रूप में पेश हुए थे. उन्हें समझना चाहिए कि लोग कुर्सी पर सक्षम, कर्मठ और उनकी हर हाल में रक्षा करने वाला व्यक्ति चाहते हैं, किसी हारे हुए अक्षम-बेचारे को नहीं. बहरहाल, इन सारी चुनौतियों-कयासों के बीच अच्छी बात यही है कि पारंपरिक जातीय जड़ता टूट रही है और सामाजिक-आर्थिक मुद्दे सुर्खियां पा रहे हैं- ऐसे में बिहार का ये चुनाव क्या नया गुल खिलाता है, देखना है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीशजी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. kant sharan

    September 12, 2010 at 8:46 am

    Nitish sarakar se sawrno ka mohbhang kahi na kahi jarur hua…….

  2. Ajay shukla

    September 13, 2010 at 7:44 am

    sir bahut sahi likha hai…

  3. alok nigam

    September 14, 2010 at 1:06 pm

    sir kaafi dino baad aapka likha hua read kiya. bahut achcha laga.

  4. alok nigam

    September 14, 2010 at 1:07 pm

    sir bahut dino baad aapka likha hua para, kaafi achcha likha hai. baat sateek hai.

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