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घर के बंटवारे सरीखा नहीं है अयोध्या विवाद

सलीम अख्‍तर बाबरी मस्जिद बनाम राममंदिर के मालिकाना हक पर 24 सितम्बर को आने  वाले  फैसले को रोकने के लिए दायर रिट याचिकाएं हाईकोर्ट ने रद्द करके सही किया है। अदालत से बाहर इस मसले का निपटारा असम्भव हो चला है। जब फैसला आने में महज एक सप्ताह ही रह गया है तो इस पर यह कहना कि अदालत से बाहर हल निकालने का समय दिया जाना चाहिए, बेमानी ही नहीं बल्कि मसले को लटकाए का रखने का प्रयास भी था।

सलीम अख्‍तर बाबरी मस्जिद बनाम राममंदिर के मालिकाना हक पर 24 सितम्बर को आने  वाले  फैसले को रोकने के लिए दायर रिट याचिकाएं हाईकोर्ट ने रद्द करके सही किया है। अदालत से बाहर इस मसले का निपटारा असम्भव हो चला है। जब फैसला आने में महज एक सप्ताह ही रह गया है तो इस पर यह कहना कि अदालत से बाहर हल निकालने का समय दिया जाना चाहिए, बेमानी ही नहीं बल्कि मसले को लटकाए का रखने का प्रयास भी था।

सवाल यह है कि फैसले की तारीख की घोषणा होते ही फैसला रुकवाने की कवायद क्यों की गयी? यह अगस्त में ही तय हो गया था कि फैसला सितम्बर में कभी आ सकता है, तभी से वे लोग हरकत में क्यों नहीं आए, जो चार दिन पहले हरकत में आए हैं? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मसले का हल साठ साल में नहीं हुआ, उसका हल एक-दो सप्ताह में कैसे हो सकता है? क्या यह घर के बंटवारे जैसा मसला है, जिसे कुछ लोग कुछ दिन में हल कर सकते हैं?

सही बात तो यह है कि घर के बंटवारे के फैसले भी आजकल दो-चार दिन में नहीं हुआ करते। फैसला करेंगे कौन लोग? सच यह है कि जो लोग इस मुकदमे में पैरोकार हैं, वे भी इस स्थिति में नहीं हैं कि कुछ कर सकें। ऐसा कोई मुस्लिम नेतृत्व नहीं है, जिसके फैसले पर सभी मुसलमान लब्बैक कह सकें। मुस्लिम नेतृत्व बंटा हुआ है। सभी राजनैतिक पार्टियों में मुसलमान हैं, वे अपनी पार्टी की पालिसी के अनुसार ही कोई स्टैण्ड लेंगे। इसी तरह संघ परिवार भले ही भारत के हिन्दुओं का नेतृत्व करने का दावा करे, लेकिन ऐसा है नहीं। वैसे भी संघ परिवार आस्था को कानून से परे मानता आया है।

इस मसले का इतना राजनीतिकरण कर दिया है कि इसका हल सिर्फ और सिर्फ अदालत कर सकती है। अदालत जो भी फैसला दे, उसे सब लोग सहजता से स्वीकार करके बातचीत से भी मसले का हल ढूंढ सकते हैं। मत भूलिए कि 24 सितम्बर को आने वाला फैसला अन्तिम नहीं है। यह तय है कि जो पक्ष हारेगा, वह सुप्रीम कोर्ट की शरण लेगा। होना तो यह चाहिए कि फैसला आने के तुरन्त बाद मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में जाए। सुप्रीम कोर्ट भी अपना फैसला सुनाने में साल दो साल का समय लेगा। इस बीच अदालत से बाहर मसले का हल तलाशने की संजीदा कोशिशें होनी चाहिए।

यक्ष प्रश्न यह है कि वे लोग जो इस विवाद से अपनी राजनैतिक रोटियों सेंकना चाहते हैं, क्या वे लोग इस मसले का हल ईमानदारी तलाशने की कोशिशों को पलीता लगाने से बाज रहेंगे? आज की तारीख में बहुत सारे नेता ऐसे हैं, जो बाबरी मस्जिद-राममंदिर की देन हैं। इनमें से बहुत सारे नेता आज की तारीख में हाशिए पर हैं। वे राजनीति की मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं। ये सभी नेता  अभी तक चुप हैं, लेकिन फैसला आने की बाद उनकी क्या उलट-बांसियों होंगी, कोई नहीं जानता। सबसे बड़ा खतरा संघ परिवार से है। संघ के नेता आज भले ही शांति बनाए रखने और फैसले को स्वीकार करने सरीखी बातें कर रहे हों, फैसला आने के बाद उनका क्या रुख रहेगा, इसे वे ही जानते होंगे। इस बात को याद रखा जाना चाहिए कि 1992 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद को सुरक्षा प्रदान करने का हलफनामा दिया था। उस हलफनामे की कितनी लाज रखी गयी, इसे सब जानते हैं।

अपने आप को मुसलमानों का हितैषी और सैक्यूलर होने का दावा करने वाले राजनैतिक दल भी कम खतरनाक नहीं हैं। यह साबित हो चुका है कि ऐसे राजनैतिक दलों ने मुसलमानों पर ‘इमोशनल अत्याचार’ के सिवा कुछ नहीं किया है। 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में कार सेवा के नाम पर जमा हुए तथाकथित राम भक्तों पर गोली चलवाकर मुलायम सिंह रातों-राम मुसलमानों के के सबसे बड़े हितैषी बनकर उभरे थे तो 1991 में बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की रथ-यात्रा को रोक कर लालू प्रसाद यादव बिहार के मुसलमानों के मसीहा बन गए थे। इन दोनों की ‘मसीहाई’ ने मुसलमानों को गुरबत के अलावा और कुछ नहीं दिया। इन दोनों की ‘मसीहाई’ केवल अपने परिवार को सत्ता तक लाने में खर्च हुई। इसी तरह संघ परिवार ने हिन्दुओं की भावनाओं का ‘हिन्दुत्व’ के नाम जमकर दोहन करके भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया। लेकिन भाजपा ने भी हिन्दुओं को क्या दिया ? सत्ता में आने के बाद भाजपा ने राममंदिर मुद्दे को ‘डस्टबिन’ के हवाले कर दिया था।

24 सितम्बर इस देश के हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए परीक्षा की घड़ी है। उन्हें तय करना है कि वे देश को उन्नति की राह पर ले जाने के लिए अदालत के फैसले को सहजता से स्वीकार करते हैं या हिन्दुत्व और सैक्यूलरइज्म के नाम पर हिन्दुओं और मुसलमानों को ठगने वाले ‘गिरोहबाजों’ के जाल में फंसकर देश की तरक्की को बाधित करने का जरिया बनते हैं। याद रखिए एक इंसान की जान कीमत किसी भी मंदिर या मस्जिद से ज्यादा होती है। इंसानों की लाशों पर बनी कोई भी इबादतगाह,  इबादत के लायक नहीं होती।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीक़ी हिंदी के सक्रिय ब्लागर, सिटिजन जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उदयन शर्मा से बेहद प्रभावित सलीम मेरठ में निवास करते हैं. विभिन्न विषयों पर वे लगातार लेखन करते रहते हैं.

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0 Comments

  1. Neeraj Shukla

    September 23, 2010 at 3:29 pm

    Aapne Jo Bhi Likha hai hum aapse behad khush hain ..aap ne hamari dil ki baat kahi hai. Hum bhi aisa hi khayaal rakhte hain ki ye Neta Log Kisi Ke nahin hain.agar Apne desh ko bachana hai aur Mandir Masjid Ki bachana hai to Siksha Ka Prasaar Karna Hoga aur Sabhi Ko Miljulkar rehna hoga na ki Kisi Ki baaton me aake ek doosre Ko Marna….DhanyaVaad………………..

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