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दुख-दर्द

शिवशंकर गोस्वामी की कथित पिटाई के झूठे सच

डा. नूतन ठाकुर: लखनऊ के कई पत्रकार कह रहे कि शिवशंकर पीटे गए, खुद गोस्वामी कह रहे कि नहीं हुई पिटाई : 22  सितम्बर को यहीं भड़ास पर एक जानकारी मिली कि “दैनिक जागरण, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार शिवशंकर गोस्वामी के बारे में सूचना है कि कल उनकी पिटाई निर्वाचन आयोग के कार्यालय के सामने हो गई.” सूचना यह थी कि उन्हें निर्वाचन आयोग आफिस के सामने तैनात सुरक्षा गार्डों ने पीट दिया. जानकारी यह थी विवाद की वजह आफिस के सामने स्कूटर खड़ा करना था.

डा. नूतन ठाकुर: लखनऊ के कई पत्रकार कह रहे कि शिवशंकर पीटे गए, खुद गोस्वामी कह रहे कि नहीं हुई पिटाई : 22  सितम्बर को यहीं भड़ास पर एक जानकारी मिली कि “दैनिक जागरण, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार शिवशंकर गोस्वामी के बारे में सूचना है कि कल उनकी पिटाई निर्वाचन आयोग के कार्यालय के सामने हो गई.” सूचना यह थी कि उन्हें निर्वाचन आयोग आफिस के सामने तैनात सुरक्षा गार्डों ने पीट दिया. जानकारी यह थी विवाद की वजह आफिस के सामने स्कूटर खड़ा करना था.

इस सूचना को सुनकर मैं सन्न रह गयी थी. शिव शंकर जी से मेरी कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं है. पर मैं यह भली-भांति जानती थी कि वे दैनिक जागरण के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, बुजुर्ग हैं. इस रूप में एक पत्रकार होने के नाते मुझे यह बात काफी नागवार लगी थी. मुझे ऐसा लग रहा था कि यह उनकी पिटाई नहीं है, पूरे पत्रकार संवर्ग की पिटाई है. साथ ही यह भी लग रहा था कि लखनऊ राजधानी में घटी इस घटना पर पत्रकार साथी काफी उद्वेलित होंगे और जिस किसी ने भी यह गन्दी हरकत की है, उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही करा के ही हम लोग दम लेंगे. मैंने भी अपने कई साथियों से इस सम्बन्ध में चर्चा की और हम सबों का यही मत था कि जो भी हुआ यह बड़ा गलत हुआ और यह काफी निंदनीय घटना है.

लेकिन मुझे इस बात से बहुत गहरा झटका लगा जब इस बारे में कहीं से कोई एक आवाज़ तक नहीं आई. मैंने सोचा कि क्या हम पत्रकार बंधु इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि हमारे ही एक बुजुर्ग साथी की सरेआम पिटाई हो जाए, भड़ास जैसे मीडिया से जुड़े महत्वपूर्ण पोर्टल पर खबर आ जाये और हमारे पत्रकार साथी चुप-चाप हाथों पर हाथ धरे बैठे रहें. सचमुच यह बड़ा ही कष्ट का विषय था. मुझे यह भी लगने लगा कि जब जागरण में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ ऐसा हो सकता है तो हम जैसे साधारण पत्रकारों के साथ तो और भी ना जाने कब क्या हो सकता है. दिल में अन्दर तक एक गहरी कचोट थी.

मैं धैर्य धारण किये बैठी रही कि शायद अब पत्रकार बंधु इस बात की गंभीरता को समझते हुए आगे आयें लेकिन अब जब तीन दिन बीत चुके हैं तो मुझे ही लगा कि मैं इस बारे में अपना विरोध सार्वजनिक रूप से प्रकट करूँ. अपनी बात कहने के पहले मैंने उचित समझा कि कुछ पत्रकार साथियों से भी घटना के ऊपर उनकी राय ले लूँ और उन्हें भी उस बारे में आगे बढ़ कर विरोध करने की गुजारिश करूँ. सबसे पहले मैंने दैनिक जागरण लखनऊ के ही क्राइम देखने वाले वरिष्ठ लोगों से संपर्क किया पर उन्होंने इस घटना के बारे में विशेष जानकारी होने से अनभिज्ञता दिखाई. यह जरूर कहा कि यदि ऐसा है तो यह बहुत ही गलत हुआ है.

हिन्दुस्तान अखबार के क्राइम मामलों से जुड़े कुछ पत्रकारों ने भी इसे बहुत ही गंभीर घटना बताई. फिर कुछ टीवी चैनल के साथियों से वार्ता की तो उन लोगों ने इस बात को बिलकुल सच बताया और कहा कि जब पिटने वाला ही चुप्पी मार कर बैठ गया है तो हम भला इसमें क्या कर सकते हैं. उनके अन्दर गहरा आक्रोश साफ़ देखा जा सकता था और वे मन से चाहते थे कि ऐसी गंभीर घटना पर तो कम से कम पत्रकार साथी अपना अपना व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़ कर एकजुट हों नहीं तो आये दिन ऐसी घटनाएं होती रहेंगी.

किन्तु इन सबसे अधिक जानकारी मुझे एक साथी पत्रकार ने दी लेकिन जो बात उन्होंने बताई वह काफी चौंकाने वाली थी. उन्होंने कहा कि ज्यादातर पत्रकारों की पिटाई ही इसीलिए होती है क्योंकि वे अपने पत्रकार होने के रौब और अकड़ को भूल नहीं पाते. साधारण लोगों के साथ भी ऐसी हरकत कर जाते हैं कि उनकी भद्द पिटनी ही होती है क्योंकि ये लोग पत्रकार के जलवे को समझ नहीं पाते और उनके पास खोने को भी कुछ ख़ास नहीं होता.

इन सबके बाद मैंने जब शिव शंकर गोस्वामी से इस बारे में वार्ता की तब और भी हतप्रभ रह गयी. उन्होंने धीर गंभीर स्वर में कहा कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी. इसके बाद मैंने भड़ास पर इस लेख से जुड़े कमेन्ट पढ़े.  श्रवण शुक्ल नाम के सज्जन की बात देखें- “..या फिर इनकी आदत ही पड़ चुकी हो बार-बार पिटने की.  अरे भाई प्रॉब्लम तो यही होती है न कि तुम जब हमारे साथ नहीं खड़े  थे तो हम क्यों तुम्हारे साथ आयें”.

पीड़ित पत्रकार के बारे में छद्म नाम से किन्ही पत्रकार साथी का कहना है – “यह पिटाई बड़े पत्रकारों की भी हुई है और शिवशंकर गोस्वामी की भी हुई है. पिटाई उस अहंकार की हुई है जो पत्रकार बनने पर खुद को रावण की तरह व्यवहार करते हैं जैसे सर्वशक्तिसम्पन्न हों. बात तो यह है कि यह पत्रकार इसलिए पिटे क्योंकि ऐसे बडे पत्रकार हमेशा यह साबित करना चाहते हैं कि सूबे के आला अफसर उनकी उंगलियों पर नाचते हैं.” उन्होंने तो यहाँ तक लिख दिया- “सरकारी विज्ञप्ति के बल पर पाठकों को लग्गी से पानी पिलाने वाले गोस्वामी इसके पहले भी कई बार पिट चुके हैं. इससे बडी शर्म की बात और क्या होगी कि इन्हीं गोस्वामी की इस सरेआम पिटाई के मामले में, जिसमें गार्डों ने उन्हें जमीन पर गिराकर जूतों और लातों से पीटा, उन्हीं के संस्थान यानी दैनिक जागरण के लोग उनके पक्ष में अब तक चुप्पी साधे हुए बैठे हुए हैं।”

नूपुर नाम की किसी साथी पत्रकार ने तो यह आरोप तक लगा डाला – ” जिस समिति में गोस्वामी है उसमे नये सदस्य नहीं बनाए जाते हैं क्योंकि फंड का अपने खास लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. चर्चा है कि समिति के फंड से ही गोस्वामी जी अपने तीन पेंशन पालसी का प्रीमियम भरते हैं.”

इस बात के अलावा कि ये घटना सही है या गलत,  इन सारे तथ्यों से कई सारे अन्य महत्वपूर्ण सवाल भी उठ खड़े होते हैं-

  1. क्या हम पत्रकारों के साथ जो बदसलूकी की घटनाएं घटती हैं उनके जिम्मेदार हम खुद ही हैं? वैसे मेरा मानना है कि इस बारे में एक राय और एक मत नहीं बनाया जा सकता है

  2. पत्रकारों में एकजुटता क्यूँ नहीं बनती दिख रही है? इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? कहीं बड़े पत्रकारों द्वारा छोटे और नए पत्रकारों के साथ किया जाने वाला व्यवहार तो इसका कारण नहीं है?

  3. हम ऐसे गंभीर मामलों में भी पिटे हुए पत्रकार साथी के साथ खड़े नहीं हो कर उसकी ही बुराई में लग जा रहे हैं. क्या यह चिंता का विषय नहीं है?

और अंत में मैं इतना जरूर अपनी ओर से कहना चाहूंगी कि न सिर्फ गोस्वामी जी की कथित घटना बल्कि उसके बाद उत्पन्न स्थिति से मैं भी व्यक्तिगत तौर पर अत्यंत आहत हूँ क्योंकि ऐसी दशा हम सबों के लिए परेशानी का सबब है क्यूंकि पीटने वाला भी एक व्यक्ति विशेष को नहीं मार रहा होता है बल्कि यह सोच कर उसकी धुनाई कर रहा होता है मानो वह पूरे पत्रकार बिरादरी की धुनाई कर रहा हो. ऐसे में यदि हम इस पर विचार नहीं करेंगे तो यह हम लोगों के लिए ही हानिकारक होगा.

लेखिका डॉ. नूतन ठाकुर पीपुल्स फोरम पत्रिका, लखनऊ की संपादक हैं.

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0 Comments

  1. kranti

    September 25, 2010 at 5:11 pm

    Genuine concern and obvious question mark on so called elite class

    kranti kishore mishra

  2. gulshan saifi

    September 25, 2010 at 2:02 pm

    nisandeh chinta ka vishay hai…………

  3. deepakgautam

    September 25, 2010 at 4:56 pm

    बिलकुल ठीक कहा आपने नूतन . पर क्या करे लोगो की सोच ही ऐसी हो गयी है की जब तक हमला खुद पर न हो तब तक वे सिर्फ यही सोचते है की ये अमुक पत्रकार की समस्या है . पर वो भूल जाते है को जब जानवर के मुह खून लग जाए तो अगला नंबर उनका भी हो सकता है .

  4. kranti

    September 25, 2010 at 5:06 pm

    Dear Nutan ji,

    I am not vetran of journalism but what i have studied and realized about our community is that we are always engaged in leg pulling of each other.we have become like those priests who never allow his pupil to grow up to his stage .I think I should not use word WE here because some may object but seriously your concern is very much genuine and there must be some issues where wee must draw a line of action.

    Kranti
    (always a learner from every on)

  5. Shravan Shukla

    September 25, 2010 at 8:01 pm

    NOOTAn ji..mujhe jo sach laga maine kaha…kaafi had tak dekha jaaye to sach bhi hai yah…JABTAK khud patrakaar hi ek doosre ke samarthan me nahi khade honge..tab tak yahi hota bhi rahega….ab aapke 3 mukhya sawaalo par dekhe to–

    1-Kuch patrakaaro me khud ka dambh bhar gaya hai ki wo is saamaz se alag hai or saare aam log unki patrakaarita ke raub se darte hai.isiliye wo pitne se pahle apna dabdaba banane ki koshis karte hai.
    2- Doosra bindu aapka 90% sahi hai…AKSAR mukhya wajah yahi hoti hai..ho sakta hai GOSWAMI ji apne adhinastho ko itna sata chuke honge..ek wakya isi lekh se–जिस समिति में गोस्वामी है उसमे नये सदस्य नहीं बनाए जाते हैं क्योंकि फंड का अपने खास लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. चर्चा है कि समिति के फंड से ही गोस्वामी जी अपने तीन पेंशन पालसी का प्रीमियम भरते हैं.”.
    3-Aisa Sirf kuch log apni paramparik dushmani nikalne ya apna ghatiyapana dikhaane ke liye karte hai..yaha pahle bindu wali baat laagu hoti hai..because isse pahle yah VARISTHA patrakaar MAHARAZ agar doosro ke saath khade hote to har koi inke saath khada….

    ab ek udaharn dekhiye…GOSWAMI ji ke pitne par koi AWAZ nahi uthaya..KAARAN- GOSWAMI ji khud abhi tak kisi ke saath nahi khade huye..aisa mai dave se kahta hu..KOI YASHWANT ji par AANKH uthakar dekhne ki himmat bhi kare to uski AANKHE chhodiye aankhe jaha hoti hai uska DHANCHA bhi chehre par nahi bachega..KYUKI yashwant JI sabke saath hamesha khade rahe hai….EK SACHCHAI YAH BHI JAANE–एक पत्रकार साथी को मदद की दरकार http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/6564-journalist-help.html is link me mere madad ke liye YASHWANT ji ne khabar chhapee thi..sabhi ki tarah paise lekar nahi balki FREE me or SIRF SIRF meri madad karne ke liye..yaha tak ki unhone khud ki gaadi ke papar lagaye jabki usse pahle mai unse mila bhi nahi tha…AAJ jo 40% meri problem SOLV hui hai wo YASHWANT ji ki kripa se hai…agar aisa kaam kabhi GOSWAMI ji kiye hote to yah katai na hota ki aawaaz na uthti..

    SHRAVAN SHUKLA
    [email protected]

  6. पंकज

    September 26, 2010 at 11:11 am

    चिंता का विषय यह नहीं कि कौन पिट गया, सवाल इस बात का भी है क्यूँ और किससे पिटे?

  7. Ramesh shukla

    September 26, 2010 at 12:22 pm

    नूतन जी, यदि आपको लग रहा है की शिव शंकर जी की पिटाई नही हुई तो राज्य निर्वाचन कमिश्नर राजेंद्र भौनवाल को २१ सितम्बर को गोस्वामी जी ने लिखित शिकायत क्यों की. इसी शिकायत पर पी.सीए.ऍफ़.के सिक्योरिटी गार्ड की सेवा समाप्त कर दी गयी. यही नहीं पी.सीए.ऍफ़ के ऍम.डी.को २२ सेप्टेम्बर बुलाकर भौनवाल ने खूब हडकाया क्यों था?
    रमेश शुक्ल
    लखनऊ.

  8. rajesh kumar

    September 26, 2010 at 3:24 pm

    नूतन जी. आपको पत्रकारों पर होने वाले हमलो पर चर्चा के लिया गोष्ठी का आयोजन करना चाहिए. गोस्वामी पिटे इसमे कोई दो राय नहीं है. घटना के दिन ही एस बारे सबको पता चल गया था. भड़ास पर तो यह बाद में आया. गोस्वामी उन पत्रकारों में है जो अपने पत्रकार साथियों से उलझते चलते है. वो अपने को बहुत बड़ा पत्रकार समझते है. समिति को उन्होंने अपनी जागीर बना रखी है. सचिव दोबारा बन्ने के ल़िया क्या नहीं किया उन्होंने. पूरी पत्रकार बिरादरी उन्हें हेट करती है

  9. mehendra.tripthi

    September 26, 2010 at 6:13 pm

    ye teen sawalo ke jawab kaun janana chahta hai…ips ki patni ya ek dummy reporter

  10. Srawan Shukla

    September 28, 2010 at 8:21 am

    Dear Mr Yashwant,

    I received lot many calls from my colleagues with regards to some comments published in your website with the name of some shravan kumar shukla from e.mail id [email protected] on Mr Goswami’s incident. Let me clarify that these are neither my comments nor i have this e.mail id. Seems a case of mistaken identity. Usually, I don’t react but I am doing so to put the facts before those who called me thinking that I made these comments.

  11. Srawan Shukla

    September 28, 2010 at 8:27 am

    To all,

    I am surprised to receive a few calls from my journalist friends about comments appearing in your website in the name of Mr Shravan Kumar Shukla from [email protected] e.mail id on Mr Goswami’s incident. These comments are not made by me but someone who claims to be known as Shrawan Kumar Shukla.

  12. श्रवण कुमार शुक्ल

    September 28, 2010 at 12:19 pm

    नमस्कार श्रवण शुक्ल जी ..यहाँ नीचे वाला कमेन्ट मेरा लिखा हुआ है साथ ही मैंने अपनी मेल ईद भी दी है . इससे आपके पास काल्स जा रहे यह सुनकर हैरत हुई.मेरा नाम श्रवण शुक्ल है आपका भी श्रवण शुक्ल है ..नाम तो एक हो सकते है लेकिन मेल आईडी एक होना थोरा अजीब लग रहा है ..बहरहाल मै स्पष्ट कर देना चाहता हू कि लिंक के साथ जो कमेन्ट है वो मेरा है ..

    धन्यवाद
    श्रवण कुमार शुक्ल
    shravan.kumar.shukla
    9716687283

  13. Anoop

    October 1, 2010 at 8:59 am

    Are Bhai Goswami Ji bahut oonche kalakar hain. Inki sanstha ko ek crore Rs. ab tak mil chke hain. kahan kharch kiya koi hisab nahi. Aise log to pitenge hi. Ismen Kuch galat nahi.

  14. pranjali

    December 23, 2010 at 9:48 am

    goswami ji kaise insaan hai bahas ispar na ho kar is par honi chahiye ki kaise kisi parakar ko sareaam pitaa gaya vo bhi kuch guards ki itni himmat ho gayi ki vo aisi himaakat kar baithe.this is alarming bell isko bahut gambhirta se lena chahiye.

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