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नौनिहाल बोले- हमें बसंती ही चाहिए

नौनिहाल शर्मा: भाग 36 : नौनिहाल के साथ की गयी खुराफातों की मेरी जितनी यादें हैं, उनमें एक घटना सबसे रोमांचक और आज भी सिहरा देने वाली है। वो जनवरी की एक सर्द सुबह थी, जब नौनिहाल शॉल ओढ़कर और बंदर टोपी पहनकर मेरे घर आये। मुझे आश्चर्य हुआ। किसी अनहोनी की आशंका भी हुई। वरना इतनी सर्दी में सुबह-सुबह आने का भला क्या मकसद हो सकता था? शाम को तो हम दफ्तर में मिलते ही थे रोज। मैंने पूछा, ‘क्या गुरू! सब खैरियत?’

नौनिहाल शर्मा: भाग 36 : नौनिहाल के साथ की गयी खुराफातों की मेरी जितनी यादें हैं, उनमें एक घटना सबसे रोमांचक और आज भी सिहरा देने वाली है। वो जनवरी की एक सर्द सुबह थी, जब नौनिहाल शॉल ओढ़कर और बंदर टोपी पहनकर मेरे घर आये। मुझे आश्चर्य हुआ। किसी अनहोनी की आशंका भी हुई। वरना इतनी सर्दी में सुबह-सुबह आने का भला क्या मकसद हो सकता था? शाम को तो हम दफ्तर में मिलते ही थे रोज। मैंने पूछा, ‘क्या गुरू! सब खैरियत?’

‘हां सब खैरियत है। आज एक बहुत जरूरी काम से आया हूं। दफ्तर से जरा जल्दी निकलेंगे। एक जगह जाना है।’

‘रात को? पता है, कितनी ठंड होगी?’

‘काम बहुत जरूरी है। तू दस्ताने-टोपी वगैरह से लैस होकर आना। देर हो सकती है।’

‘पर जाना कहां है?’

‘वो मैं दफ्तर में ही बताऊंगा।’

‘तो फिर वहीं बता देते। इतनी ठंड में इतनी दूर साइकिल चलाकर आने की क्या जरूरत थी?’

‘तू अपने घर कैसे बताता कि आज देर होगी आने में।’

‘मैं फोन कर देता।’

‘इतनी रात को तू बताता, तो तेरे घर वाले चिंतित नहीं हो जाते कि ïऐसा क्या काम आ गया। मैं बस इसलिए कहने के लिए आया कि तू घर पर देर से आने को कहकर दफ्तर आये।’

‘पर जाना कहां है? ये भी तो बताना पड़ेगा…’

‘वो जगह घर पर नहीं बतायी जा सकती। चाहे तो ये कह देना कि आज पहले पेज पर नाइट शिफ्ट भी करनी पड़ेगी।’

‘मतलब इतनी देर हो जायेगी?’

‘हां। आधी रात भी हो सकती है।’

चाय पीकर नौनिहाल तो चले गये, पर मैं अगले कई घंटे तक अजीब कशमकश में रहा। नौनिहाल ने पहली बार घर से कुछ छिपाने को कहा था। जरूर कोई बहुत गंभीर और संवेदनशील बात है। शायद निषिद्ध भी। पर ऐसा भला क्या हो सकता है? मेरे मन में ये सवाल घूमते रहे। इनका जवाब मिला दफ्तर पहुंचकर। मैं रोज की तरह साढ़े तीन बजे अपनी सीट पर पहुंच गया। एजेंसी की खेल की खबरों को छांटकर संपादित करने लगा। पर मन लोकल डेस्क की ओर लगा रहा। आखिर चार बजे नौनिहाल आये। दुआ-सलाम हुई। उन्होंने संकेत किया कि छह बजे चाय पीने गोल मार्केट जायेंगे, तब चर्चा की जायेगी। आखिर इंतजार खत्म हुआ। ठंड बहुत थी। दफ्तर में हीटर लगा हुआ था। इसलिए और कोई नहीं आया। चाय सुड़कते हुए नौनिहाल ने रहस्य खोला।

‘बात ये है कि आज कबाड़ी बाजार चलना है…’

‘पर दिन में चलते। कुछ सामान लेना हो, लकड़ी वगैरह का तो हमारे मोहल्ले के कई लोगों की वहां दुकानें हैं। उनसे खरीदा जा सकता था।’

‘सामान-वामान कुछ नहीं चाहिए।’

‘तो फिर वहां सर्दी में सिकुडऩे के लिए जाना है?’

‘कोठे पर जाना है…’

‘मत… मतलब… मतलब…’

‘हां। कोठे पर। किसी वेश्या के पास।’

इतनी सर्दी में भी मुझे पसीना आ गया। मैं घबरा गया। मैं तब 19 साल का था। किसी ने देख लिया और घर पर बता दिया, तो क्या होगा?

मेरी घबराहट भांपकर नौनिहाल ने असली बात बतायी।

‘वहां जाने में कुछ गलत नहीं है। हम उस काम से नहीं जायेंगे, जिस काम से सब लोग जाते हैं। दरअसल, मुझे एक वेश्या पर कहानी लिखनी है। इसका प्लॉट बुहत दिन से मेरे मन में था। हाल में कमलेश्वरजी को पत्र लिखा, तो इसकी चर्चा कर दी। उनका जवाब आया कि कहानी तुरंत भेज दो। मेरे पास महज रफ ड्राफ्ट है। मैं उसमें विश्वसनीयता लाने के लिए किसी वेश्या से मिलना चाहता हूं। मैं बोल-सुन नहीं सकता। इसलिए तुझे साथ ले जाना है।’

‘पर गुरू, ये तो बहुत खतरे वाली बात है।’

‘इसीलिए मैंने तुझे सुबह नहीं बताया था। इस काम के लिए तो तेरे मम्मी-पापा तुझे मेरे पास नहीं भेजते।’

‘कुछ गड़बड़ तो नहीं होगी?’

‘गड़बड़ क्या होगी? हमारा इरादा नेक है।’

दूसरा कप चाय पीकर और मुंह से भाप उड़ाते हम दफ्तर लौटे। मेरे मन में डर भी था… कुछ नया करने का अहसास भी।’

खैर। हमने अपना काम खत्म किया। मैंने साढ़े आठ बजे खेल पेज छोड़ दिया। नौनिहाल ने भी मंगलजी से यह कहकर जाने की अनुमति ले ली कि बीवी बीमार है, उन्हें घर जाकर खाना बनाना पड़ेगा।

हम अपनी साइकिलों पर निकले, सड़कें खाली थीं। कोई 20 मिनट में हम गुजरी बाजार पहुंचे। वहां दुकानें बढ़ायी (बंद की) जा रही थीं। हमने एक दुकान से 200 ग्राम रेवड़ी लीं। वहीं खड़े होकर खायीं। फिर आगे बढ़े। करीब सवा नौ बजे हम कबाड़ी बाजार पहुंच गये। कबाड़ी बाजार में नीचे दुकानें थीं। उनके ऊपर कोठे। उनमें वेश्याएं रहती थीं। दिन में वे कोठे सुनसान रहते थे। शायद वे सोती रहती होंगी। लेकिन शाम होते ही उनमें चहल-पहल शुरू हो जाती थी। कई बार वहां से गुजरते हुए मेरी नजर उधर पड़ी, तो झुरझुरी सी हुई। एकदम फिल्मी माहौल लगता था। शाम होते ही नीचे खाने-पीने के सामान और पान व फूलों वगैरह के ठेले लग जाते थे।

वहां भी दुकानें बढ़ायी जा रही थीं। कुछ पहले ही बंद हो चुकी थीं। हमने पहले एक चक्कर लगाकर मुआयना किया। फिर नौनिहाल ने एक कोठे के नीचे साइकिल रोकी। पसीना मेरी रीढ़ की हड्डी तक चुहचुहा गया… मैं मन ही मन मना रहा था कि कोई जान-पहचान का यहां से ना गुजर रहा हो… कहीं घर तक यह बात न पहुंच जाये… और सबसे अंत में यह कि कोई परिचित ऊपर से ही उतरकर ना आ रहा हो…

हम साइकिलें हाथ में थामे खड़े थे। पहली बार मैंने नौनिहाल को भी पसोपेश में देखा। वे अपनी गरदन खुजलाते हुए सोच रहे थे। जब भी वे कुछ गंभीर बात सोचते, उनकी उंगलियां गरदन को खुजलाने लगती थीं। मैंने इशारे पूछा, ‘क्या गुरू, क्या बात है? अब क्या हो गया?

उन्होंने अपनी हथेली पर उंगलियों से लिखकर बताना शुरू किया। हम आपसे में इसी तरह या फिर हाथों के इशारों से बात किया करते थे।’

‘यहां आ तो गये यार, पर हमें किसी के माध्यम से आना चाहिए था।’

‘क्यों, तुम्हें भी डर लग रहा है क्या?’

‘डर की बात नहीं। यहां तो देह व्यापार होता है। हम जिसके पास भी जायेंगे, वह हमें उसी काम के लिये आया हुआ समझेगी। ऐसे में, उसे यह समझाना मुश्किल हो सकता है कि हम किस काम से आये हैं।’

‘ये बात तो पहले सोचनी चाहिए थी। अब तो हम यहां खड़े हैं। कोठे के नीचे। लोग यहां आ-जा रहे हैं। हमें घूर रहे हैं। इस तरह ज्यादा देर खड़े रहे, तो लगों को बिना मतलब शक हो जायेगा… कहीं पिटने की नौबत ना आ जाये…’

‘खैर, पिटने की नौबत तो नहीं आयेगी, पर मामला जरा गंभीर हो गया है।’

‘अब क्या किया जाये?’

नौनिहाल मेरी बात का जवाब देने ही वाले थे कि दूर से हमें देख रहा एक लड़का हमारे पास आया। वह एक बंद दुकान के पत्थर पर खड़ा था और बीड़ी पी रहा था। मुश्किल से 15-16 साल का रहा होगा। उसने एकदम हमारे नजदीक आकर ठंड से कांपते हुए कहा, ‘नये हो का? पहली बेर आये हो? सरमा रहे हो?’

‘……..’

‘यहां सरमाने सै काम नाय चलै। जे तो तड़-तड़ करकै उप्पर चढ़ जाओ सीड्डी पै, नाय तौ बेभाव की पड़ैगी।’

‘क्यों पड़ेगी बेभाव की? हम क्या यहां कोई चोरी करने आये हैं?’, मुझे गुस्सा आ गया।

‘गुस्सा तै दिखाओ ना। जे तो पड़ेगी, नाय तै सीद्दे उप्पर चले जाओ। सरम आ री हो तै मैं पहोंचा दू। दो रुपय्ये मेरे लगेंगे।’

‘और ऊपर कितने लगेंगे?’

‘रूपा का रेट दस रुपय्ये है। पर बसंती पंदरै सै कम पै पास बी आने दे…’

‘क्यों?’

‘मरजी की मालकिन ठहरी। 5 सै जादा ना लेत्ती एक रात मैं।’

‘हमें बसंती ही चाहिए।’,  नौनिहाल बोले। उस लड़के को उनकी बात समझ में नहीं आयी। मैंने उसे समझाया। वह फटाक से बोला, ‘दो मेरे, पंदरै-पंदरै तुमारे, बत्तिस लगैंगे।’

भुवेंद्र त्यागीनौनिहाल ने उसके हाथ पर फटाक से दो रुपये रख दिये। बाकी सीधे बसंती को ही देने को कहकर हम उस लड़के के पीछे-पीछे कोठे की सीढिय़ां चढ़ गये…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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