: 31 अक्तूबर पर विशेष : इंदिराजी, लौह पुरुष और आचार्यजी : आज 31 अक्तूबर है. भारतीय इतिहास के तीन सितारों को याद करने का दिन. आज इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि है तो वल्लभभाई पटेल और आचार्य नरेंद्र देव की जयंती. दिलचस्प है कि तीनों की धाराएं भले ही अलग हों, पर वे अपने क्षेत्र के शिखर व्यक्तित्व हैं. शक्तिपुंज हैं. अतुलनीय और अविस्मरणीय भी.
कितना अजीब है ये सोचना भी कि पटेल न होते तो शायद ये भारत भौगोलिक दृष्टि से कुछ और होता. लेकिन इस सच्चाई के साथ दूसरे सच भी जुडे हैं. तब शायद नेहरू प्रधानमंत्री भी न होते और पटेल न होते तो शायद राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्टन्पति भी न होते. इसी तरह इंदिराजी न होतीं तो शायद आज का ये हिंदुस्तान इस आधुनिक रूप में न होता, जिसमें हम रह रहे हैं. दुनिया में आज हमारी जो साख है, शायद वो भी इस रूप में न होती. परमाणु शक्ति से संपन्न एक शिक्षित साक्षर भारत, अंतरिक्ष में छलांग लगाता, विज्ञान से कदमताल करता और खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होता भारत आखिर इंदिरा की ही देन है. आखिर ये इंदिरा की ही कूटनीति थी, जब 1971 में दुनिया ने भारत का लोहा माना- पाकिस्तान की पराजय, विघटन और बंगलादेश का बनना तथा पर्दे के पीछे के असली खिलाड़ी अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर की शिकस्त कोई मामूली बात नहीं थी.
आचार्य नरेंद्र देव न होते तो शायद भारतीय समाजवादी धारा बिना किसी भीष्म पितामह के रह जाती, जो मार्क्सवादी थे, लेकिन गांधी के नैतिक तौर तरीकों में यकीन करते थे. उन्होंने छात्रों-
युवाओं को राष्ट्रवाद, समाजवाद, लोकतंत्र के संस्कार दिए. उन्होंने स्टालिन के रेजीमेंटेशन के दौर को देखा था और 1940 के दशक में ही कहा था कि आने वाले वक्त में सोवियत संघ का विघटन हो जाएगा. उन्होंने बुद्ध और मार्क्स को क्रांतिकारी नैतिक आदर्श से जोडा. अहमदनगर में जवाहरलाल नेहरू के साथ जेल में थे. दोनों के मित्रवत रिश्ते थे. डिस्कवरी ऑफ इंडिया में नेहरू ने खास तौर पर मौलाना आजाद और नरेंद्र देव का जिक्र किया है, उनकी काबिलियत से वे बेइंतिहा प्रभावित थे. नरेंद्र देव जिंदगी भर पढ़ने पढ़ाने के पेशे में रहे. कुलपति रहे, लेकिन आग्रह के बाद भी कभी नेहरू कैबिनेट में नहीं गए.
तो तीनों ही व्यक्तित्व खुद में इतिहास के ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिनकी कोई तुलना नहीं है. फिर भी करने वाले तो तुलना करते ही हैं. तभी तो जर्मनी के एकीकरण में जो काम उन्नीसवीं शताब्दी में ओटो वॉन बिस्मार्क ने किया, कमोबेश वैसा ही पटेल ने भारत में किया, ऐसा भी कहा जाता है. लेकिन ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि बिस्मार्क ने जहां एकीकरण ’आयरन एंड ब्लड पॉलिसीञ के तहत किया, वहीं पटेल ने 565 स्वतंत्र रियासतों को बहुत कम या न के बराबर खून-खराबे से एकजुट किया.
दरअसल, पटेल ने एक ओर जहां राजे-रजवाड़ों से संपर्क साधा, तो साथ ही ज्यादा जोर रहा रियासतों की जनता से सीधे संवाद पर, यहां गांधी का असर साफ दिखता है. लेकिन जूनागढ, हैदराबाद और कश्मीर जैसी रियासतें भी रहीं, जो एकीकरण में बाधक ही नहीं रहीं, बल्कि कई तो संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर अपनी स्वतंत्र हैसियत के लिए कोशिश में रहीं. यहां पटेल की कुशल प्रशासक की कूटनीति काम आई. कुछ जगहों पर उन्होंने वार्ता की कूटनीति और इनकार पर सेना के प्रयोग को साथ-साथ भी रखा. वैसे ज्यादातर रियासतें तो खुद ही देशभक्ति में एकीकरण के साथ थीं. लेकिन गौरतलब ये है कि पटेल की जिस कुशल प्रशासक की भूमिका की अनेक स्तरों पर तारीफ होती है, वे ही उनके नेहरू से मतभेद की वजहें भी बनीं. नेहरू जिस लोकतांत्रिक आदर्श ‘आत्म निर्णय’ पर जोर देते थे, पटेल उसे व्यावहारिक धरातल पर तालमेल के साथ स्वीकारते थे.
संभवतः यही कारण था कि पटेल ने 1950 में तिब्बत में चीनी सेना के दखल पर और गोवा के मामले में भी सैन्य पहल का आग्रह किया था, लेकिन नेहरू की रजामंदी न होने पर बात तब रह गई. लेकिन बाद में व्यावहारिक संदर्भ में पटेल सही साबित हुए जब तिब्बत के हालात खराब हुए, दलाई लामा को भागना पड़ा और गोवा में दखल की जरूरत पड़ी. बाद में तो कश्मीर के मुद्दे और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर भी पटेल की तात्कालिक सोच ज्यादा व्यावहारिक साबित हुई.
ठीक है इतिहासकारों के एक तबके, मौलाना आजाद, जेपी, अशोक मेहता जैसे समाजवादियों, सुभाषचंद्र बोस के समर्थकों और वामपंथी धारा से जुड़े लोगों ने पटेल की आलोचना की है कि वो कांग्रेस के दक्षिणपंथी तबके, कुछ बडे पूंजीपतियों तथा राजे-रजवाड़ों के साथ थे और उन्होंने ‘आत्म निर्णय’ के सिद्धांत को भी नहीं माना, लेकिन सच यही है कि गांधी की रहनुमाई में खेडा सत्याग्रह और बारडोली के सरदार ने जो यात्रा शुरू की थी, वो 1947 से 1950 के बीच निर्णायक मुकाम और शिखर पर थी जब उन्होंने तीन-चार साल में ही इतना कुछ कर दिया, जो लोग कई जिंदगियों में नहीं कर पाते हैं या फिर उन्होंने खुद पिछले चार दशकों में उतना नहीं किया था. और जब उन्हें ‘लौहपुरुष’ के रूप में सारे देश ने सिर-माथे पर भी बिठा लिया था.
ये भी दिलचस्प है कि नेहरू-पटेल मतभेदों का जिक्र करने वाले ये भूल जाते हैं कि 1946 में नेहरू के पक्ष में कांग्रेस अध्यक्ष पद की उम्मीदवारी से पटेल ने अपना नाम ये जानते हुए भी वापस लिया था कि जो अध्यक्ष होगा, वही प्रधानमंत्री भी. ठीक है कि ऐसा गांधी के असर के चलते हुआ, लेकिन पटेल को ये स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं थी कि नेहरू देश के ही नहीं, उनके भी नेता हैं. वैसे दोनों के बीच मतभेद तब भी उजागर हुए, जब नेहरू के चाहने पर भी राज गोपालाचारी को नहीं, राजेंद्र प्रसाद को प्रथम राष्ट्रपति बनाया गया.
पटेल का असर तब भी दिखा, जब 1950 में ही कृपलानी नहीं पुरुषोत्तमदास टंडन को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया, जबकि नेहरू कृपलानी को चाहते थे और पटेल टंडन को. लेकिन दोनों के बीच बड़प्पन का भी रिश्ता था. तभी तो महात्मा गांधी की हत्या को लेकर जब पटेल पर लापरवाही के आरोप लगे और भावनात्मक रूप से आहत पटेल के इस्तीफे की बात उठी तो नेहरू और राजगोपालाचारी ने उनका पक्ष ही नहीं लिया, हर कदम पर उनके साथ भी खडे हुए. दुःखद पक्ष ये है कि आज दक्षिणपंथी और दकियानूसी ताकतें जहां पटेल को ‘हाइजैक’ कर अपने पाले में खींचना चाहती हैं, वहीं वामपंथी और प्रगतिशील उन्हें हाशिये पर डालना चाहते हैं.
निश्चित रूप से ये उस ‘लौहपुरुष’ के साथ सरासर अन्याय है, जिसकी कूटनीति और कुशल प्रशासक की अनेक खूबियां भिन्न मत रखने वाले नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी में भी दिखती हैं, जिन्होंने भारत को भारत बनाया. सच है कि पिता नेहरू से समाजवादी रुझान, अंदर की मजबूती, दृढता और जनता के प्यार पर भरोसा विरासत में पुत्री को मिला, लेकिन लोहिया की नजर वाली ‘गूंगी गुडि़या’ देखते-देखते चंद साल में कैसे ’शक्तिपुंज दुर्गा का अवतार’ बन गई ये किसी से छुपा नहीं रहा.
इंदिरा गांधी ने जब 1966 में सत्ता संभाली तो कुछ ही समय पहले भारत-पाक समझौता हुआ था. समय संकटपूर्ण था. दो साल से सूखा पड़ा हुआ था. देश खाद्यान्न संकट, बेरोजगारी, महंगाई से परेशान था. लेकिन हर संकट के बीच 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस जीत तो गई, पर आधे राज्यों की विधान सभाओं के चुनाव हार गई. यह 20 साल के एकछत्र राज के बाद बडा सियासी संकट था. लेकिन सामाजिक-आर्थिक संदर्भ में प्रगतिशील नीतियों के चलते जैसे बैंक राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार, मूल्य नियंत्रण, खाद्यान्न उत्पादन के जरिए आगे बढने की कोशिश हुई, वहीं कांग्रेस में नए-पुराने की खाई भी बढ़ने लगी.
इंदिरा के समर्थन से वी.वी. गिरी ने पार्टी प्रत्याशी को राष्ट्रपति चुनाव में हराया. फिर प्रीविपर्स और पूर्व राजाओं को मिल रही सुविधाओं को खत्म करने का मुद्दा गर्म हुआ. तभी संसद भंग करवाकर 1971 के मध्यावधि चुनाव में भारी जनादेश के साथ इंदिरा सत्ता में लौटीं. फिर 1972 में राज्यों के चुनाव में भी कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली. लेकिन इसी दरम्यान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा के करिश्मे से दुनिया हतप्रभ रह गई. तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की समस्या गहराई और एक करोड़ शरणार्थी भारत आ गए. लेकिन नवंबर 1971 में भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान में दाखिल हुई और बंगलादेश का निर्माण हुआ. इस एक घटना ने इंदिरा का कद विश्व स्तर पर बहुत ऊंचा कर दिया, क्योंकि जिस अमेरिका और चीन के भरोसे पाकिस्तान भारत को हल्के में ले रहा था, उसके लगभग एक लाख सैनिकों को पूर्वी पाकिस्तान में समर्पण करना पडा.
यहां ध्यान देने की बात है कि पटेल ने जहां राष्ट्रीय एकीकरण में कूटनीति और कौशल का अद्भुत प्रदर्शन किया था, वहीं इंदिरा ने 1971 में अपने अपूर्व कूटनीतिक कौशल से दुनिया को नए सिरे से सोचने को मजबूर कर दिया. शीत युद्ध के उस जमाने में संभावित अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ सोवियत संघ को खड़ा किया और अमेरिका के सातवें बेड़े के खौफ को दरकिनार करते हुए बंगला देश का निर्माण भी सारी दुनिया ने कौतुहल से देखा. जो राष्ट्रपति निक्सन और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर अपनी कूटनीति पर इतराते फिरते थे, उन्हें इंदिरा ने उन्हीं की भाषा में जवाब भी दे दिया था. तभी तो जब सातवें बेड़े के बंगाल की खाड़ी में भेजे जाने की खबर इंदिरा को मिली तो उन्होंने तुरंत अमेरिका स्थित भारतीय राजदूत से आधिकारिक जानकारी मांगी.
अमेरिकी विदेश विभाग ने न इसका खंडन किया और न ही इस पर सहमति दी. इस पर भारतीय राजदूत ने अमेरिका में ही प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि अमेरिका सातवें बेड़े को हिन्द महासागर
भेजने से इनकार नहीं करता है. इस पर वियतनाम में चोट खाए अमेरिकी और वहां के मीडिया का एक बड़ा तबका इसलिए भड़क गए कि वो अब भारत-पाक युद्ध में फंसना नहीं चाहते थे. तो इस तरह इंदिरा ने कौशल से अमेरिका को जवाब ही नहीं दिया, आगे भी अमेरिकियों की और उनके खेमे की मंशा पर विराम लगाने के लिए मास्को से तालमेल भी बिठाया.
चीन के संभावित असर पर विराम और खुद की ताकत के विस्तार के लिए पोखरण परमाणु परीक्षण भी किया. इस तरह भारत दुनिया के सामने एक नई ताकत के रूप में सामने आया और आज वो जिस रूप में है, उसका बड़ा श्रेय इंदिरा को ही जाता है. यह सही है कि इंदिराजी में भी हर राजनेता की तरह खूबियां रहीं तो कुछ कमियां रहीं. और इन्हीं संदर्भों में आपातकाल और ब्लू स्टार ऑपरेशन का भी जिक्र होता है. लेकिन सच यही है कि इंदिरा भारत की पुरुष प्रधान मानसिकता के बीच पहली महिला प्रधानमंत्री ही नहीं रहीं, उन्हें दुनिया में स्त्रीशक्ति का प्रतीक भी माना गया. जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो 65 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे थे. लेकिन 1984 में यह प्रतिशत सिर्फ 45 रह गया. उनके समय में खाद्यान्न उत्पादन ढाई गुना बढ़ा और साक्षरता बढ़ी 30 फीसदी. उनका ‘गरीबी हटाओ’ संदेश उनकी प्रगतिशील और जन सापेक्ष सोच का ही प्रतिबिंब था.
तो ऐसी थीं इंदिरा, और अनेक संदर्भों में पटेल भी, जो सियासत को कूटनीतिक कौशल, जमीनी हकीकत और सक्षम प्रशासन से सीधे-सीधे जोड़ते थे लेकिन इनके विपरीत आचार्य नरेंद्र देव राजनीति में रहते हुए भी प्राचीन ऋषियों-संतों-फकीरों की परंपरा के वाहक थे, इसीलिए तो नेहरू के आग्रह पर भी कभी समाजवादी पार्टी छोड कांग्रेस मंत्रिपरिषद में शामिल होना मंजूर नहीं किया. उनकी मान्यता थी कि लोकतंत्र और समाजवाद एक दूसरे के पूरक हैं विपरीत नहीं. इसलिए उन्होंने समाजवादी देशों के रेजीमेंटेशन और तानाशाही तौर-तरीकों को कभी कबूल नहीं किया. गौर करने की बात है कि समाजवादी देशों के अंत की जो आशंका उन्होंने 60-70 साल पहले जताई थी, वो सच साबित हुई है.
जाहिर है इन्हीं संदर्भों में आज लोकतंत्र और जनाकांक्षाओं को नए तरीके से समझने-समझाने की जरूरत है. बुद्ध और मार्क्स को महान क्रांतिकारी ही नहीं माना वर्ग संघर्ष को नैतिक आयाम से भी जोडा. उनकी सोच थी कि नया निजाम बिना नैतिक सोच के संभव नहीं. इसलिए तो लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए जब छात्रों को रहने की दिक्कत हुई तो उन्होंने छात्रों के लिए अपना विशाल कुलपति निवास कुछ घंटों में ही खाली कर दिया और दो कमरे के एक छोटे से मकान में रहने चले गए. तो ये था उनका नैतिक धरातल. आज देश के कथित समाजवादियों को उनसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है. और, संभवतः यही वो बिंदु था, जो उन्हें गांधी के नजदीक ले जाता था. तभी तो सत्ता उन्हें कभी आकर्षित न कर सकी और विचार तथा सिद्धांत वे कभी छोड न सके.
संक्षेप में कहें तो महात्मा गांधी ने राजनीति को सैद्धांतिक बहस के विषय से जमीनी मुद्दा बनाया. विचार को आम आदमी से जोडा. उसे नैतिक आयाम दिया. लेकिन बागडोर नेहरू के हाथ रही. वो समाजवाद, औद्योगिकीकरण, वैज्ञानिकता, योजनाबद्ध विकास और शांति के ऐतिहासिक स्वप्नदृष्टा अशोक-अकबर से ज्यादा प्रभावित थे. लेकिन पटेल ने जहां गांधी के असर में शुद्ध जमीनी हकीकत से जुडने की सियासत सीखी थी, वहीं इंदिरा पिता नेहरू की प्रगतिशीलता और कूटनीतिक कौशल का प्रतिनिधित्व करती थीं. परंतु नरेंद्र देव मार्क्सगांधी के समन्वय थे. विचारशीलता उन्हें नेहरू के पास ले तो जाती थी, लेकिन वहीं उसी विचार का नैतिक पक्ष सत्ता से बहुत दूर भी. इन शक्तिपुंजों को मेरा प्रणाम.
लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. गिरीशजी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.












Ajay Shukla Chandigarh
November 1, 2010 at 4:02 am
Aadarneey Girish ji ne bilkul theek likha hai ki teeno alag alag dhara ke lekin shirsh stambh the. teeno ne desh ko diya, unko naman hai…