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एक बीहड़ जीव और उसका जीवन दर्शन

[caption id="attachment_18501" align="alignleft" width="151"]आशीष बाबूआशीष बाबू[/caption]: सीएमएस और चुटिया : लगता है कुछ लोग नौकरी के लिए बने ही नहीं होते हैं, ये लोग तो राजा होते हैं, अपने मन के राजा, अपनी दुनिया के बादशाह, अपनी मर्जी के मालिक. खुदा ने सामान्य लोगों को बनाया है सामान्य से कार्य करने के लिए, घर-दुआर देखने के लिए, लोगों के आगे-पीछे घूम कर अपने छोटे-बड़े काम निकलवाने के लिए और इन्ही बातों के उधेड़-बुन में अपने आप को रमाये रखने के लिए.

आशीष बाबू

आशीष बाबू

: सीएमएस और चुटिया : लगता है कुछ लोग नौकरी के लिए बने ही नहीं होते हैं, ये लोग तो राजा होते हैं, अपने मन के राजा, अपनी दुनिया के बादशाह, अपनी मर्जी के मालिक. खुदा ने सामान्य लोगों को बनाया है सामान्य से कार्य करने के लिए, घर-दुआर देखने के लिए, लोगों के आगे-पीछे घूम कर अपने छोटे-बड़े काम निकलवाने के लिए और इन्ही बातों के उधेड़-बुन में अपने आप को रमाये रखने के लिए.

अगर आशीष बाबू भी यही सब काम करने लगेंगे जो लखनऊ के बाकी सारे लोग कर ही रहे हैं तो फिर कार्ल मार्क्स की आत्मा का क्या होगा, लेनिन और ट्रोट्स्की कहाँ जायेंगे, मेंशेविक और बोल्शेविक का नामलेवा कौन होगा, माओ की बन्दूक की आवाज कौन सुनेगा और क्रान्ति के हसीन सपने कौन बुनेगा. ये कोई जरूरी नहीं कि जेब में पैसे भी हों, इस बात से भला क्या मतलब कि खाना-पीना कहां से मिलेगा, हां ये बात कभी नहीं भूलने वाले कि कल कौन सा वामपंथी आंदोलन है, कल किस मुद्दे पर धरना-प्रदर्शन करना है और कल किस बड़े सामजिक विचारक के साथ किस संगोष्ठी में जाना है. इस आदमी का दिल तो वहीं रमता है और वहीं रमेगा, चाहे उसे दुनिया की सारी आरामदेह चीज़ें दे दी जाएं. अब इनका सुख वही है तो आप भला क्या कर लेंगे- नौकरी नहीं करने, कोई काम-धंधा नहीं करने, रोजी-रोटी नहीं कमाने के बदले सजा-ए-मौत तो नही ना दे देंगे.

अब आपका सवाल ये कि आशीष बाबू कौन? तो बताते हैं. आशीष बाबू सीएमएस लखनऊ के छात्र रहे हैं. सीएमएस यानि सिटी मोंटेसरी स्कूल. जगदीश गांधी का सपना. गिनीज बुक ऑफ रेकॉर्ड्स तक में अपना नाम एक शहर में सबसे अधिक छात्र-छात्राओं वाले स्कूल के रूप दर्ज करा चुका संस्थान. सीएमएस लखनऊ के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित स्कूलों में है. इस स्कूल में एडमिशन के लिए बड़े लोग प्रिंसिपल और दूसरे लोगों के आगे-पीछे घूमते हैं. किसी एडमिशन हो जाने पर गर्व मिश्रित हर्ष और संतोष का अनुभव करते है. यानि कि एक ऐसी जगह जहां से पढ़ा छात्र किसी इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, ऊंची सेवाओं में देखा जाना सामान्य तौर पर अपेक्षित है. ऐसे में यदि सीएमएस का कोई छात्र किसी रिक्शा-चालक यूनियन या झुग्गी-झोपड़ी संघ का पदाधिकारी बना यहां-वहां घूम रहा हो और शहर के सारे उत्पाती और बवाली किस्म के लोगों का मित्र और सहचर बना हुआ हो तो स्वाभाविक रूप से यह घोर आश्चर्य का विषय तो बन ही जाता है. कुछ ऐसे ही हैं आशीष बाबू. “क्या सोचा और क्या पाया?” और “कैसे-कैसे सपने देखे थे!” जैसे सवालात तो निश्चित रूप से घर-परिवार वालों को मथते ही होंगे. और तमाम-यार दोस्तों को परेशान भी करते होंगे. पर आशीष बाबू इन बातों के ऊपर हैं. उनकी तो अपनी ही डफली है और अपना ही राग है. इस बात से कोई खास प्रभावित हुए नहीं दीखते कि घर-समाज के लोग या पारंपरिक सोच वाले साथी क्या कहते-सुनते होंगे. नौकरी चाकरी कभी की नहीं और ना ही कर पाते.

इस बीहड़ जीव से मेरी मुलाक़ात एक ऐसे ही दूसरे कलाकार आदमी के ऑफिस में हुई. उत्कर्ष कुमार सिन्हा हैं इनका पूरा नाम और बहुधंधी है इनका काम. बहुधंधी का कोई गलत मतलब मत निकाल लीजिए, प्रभु- अब तक चोरी, डकैती, लूट-खसोट, हेरा-फेरी में नहीं पकड़े गए हैं. हाँ, ये है कि ये आदमी एक ही बार में सामजिक कार्यकर्ता, चिन्तक, विचारक, पत्रकार, स्तंभकार और राजनितिक व्यक्ति है. और साथ ही जौहरी भी- सोने चांदी के नहीं, विशिष्ट प्रकार के लोगों के. उसी दरबार में एक दिन जब मैं सिर झुकाने गया था तो मुझे नज़र आये एक पतले, लंबे से प्राणी जो किसी दूसरे ग्रह से आये प्रतीत होते थे. क्यूंकि जहां उनका हाड़-हाड़ हिलता दिख रहा था वहीं उनकी करीने से सजी हुई और पीछे बाँधी हुई लंबी सी चुटिया उन्हें किसी छोटे-मोटे विदेशी पर्यटक का रूप दे रही थी. परिचय का आदान-प्रदान हुआ. ना उन्होंने ज्यादा ध्यान दिया और ना मैंने. बस औपचारिकताओं का निर्वाह हुआ. लेकिन उस आदमी के हुलिया और हरकत का प्रभाव मुझ पर जरूर पड़ा था. ये लग गया था कि ये लीक से हट कर ही है. बातचीत में कुछ मजेदार और अलमस्त किस्म का. कुछ-कुछ बेलौस और बे-अंदाज़ भी. अपने आप में ही रमा. जो कहना है सो कहना है और बस. मालूम हो गया कि भाई साहेब एक सामजिक कार्यकर्ता हैं.

फिर अगली मुलाक़ात और उसके बाद फिर कुछ मुलाकातें और जल्दी ही मुझे लगने लगा कि हम लोग तो मित्र बन गए हैं- यानि एक दूसरे को तो कुछ हद तक जानने-समझने लगे हैं. कम से कम मुझे तो ऐसा ही महसूस होने लगा और साथ ही ऐसा भी दिखने लगा कि उम्र की वरिष्ठता के नाते आशीष बाबू मुझे कुछ-कुछ बड़े भाई का सत्कार भी देने लगे हैं. वैसे मैं इस मामले में निरंतर सजग रहता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि वैचारिक रूप से ऐसे क्रान्तिकारी और अराजकतावादी न जाने कब, किसकी, कहाँ, किस बात पर और कैसे मिटटी पलीद कर दें. जो मार्क्स का चेला होगा, जिसे दुनिया को आमूलचूल बदल देने का सपना होगा, जो सारे जमाने से लड़ता चला आ रहा होगा वह तो समाज के इन नियमों का पालन तब तक ही करेगा जब तक उसका मूड है. “मानो तो देव नहीं तो पत्थर” और आशीष बाबू सदृश अराजकता के पुजारी का तो कहना ही क्या?

शुरू के कई मुलाकातों में मुझे ये तो लग गया था कि ये आदमी मजेदार हैं- बोलते खूब हैं, और किस्से-कहानियों का खजाना है. छात्र जीवन से ही कामरेड-कामरेड करते करते तमाम बड़े-बड़े नामों के नजदीक रहे हैं और उनके बारे में जीवंत और कई बार हैरत-अंगेज कहानियाँ सुनाने में महारत रखते हैं. मुद्राराक्षस- हिंदी साहित्य का एक जाना-पहचाना नाम, केपी सक्सेना- सुप्रसिद्ध लेखक, रूपरेखा वर्मा – सामजिक चिन्तक, संदीप पांडे- मेगासेसे पुरस्कार विजेता और दुसरे तमाम लोग. आशीष भाई इन सबों के अंतरंग रहे है और जब बताने लगते हैं तो बस सुनते ही जाईये. लिख इसीलिए नहीं रहा हूँ क्योंकि मेरा मत है कि दोस्ती-यारी में कही गयी बात सार्वजनिक स्तर पर नहीं आनी चाहिए.

लेकिन आशीष बाबू खुद भी विद्वान हैं, एक अच्छे स्कूल से पढ़े-लिखे हैं और हिंदी-अंगेजी पर सामान अधिकार रखते हैं, ये सब राज बाद में खुला. मैं तो इस चुटिया वाले जीव को एक हंसमुख संगी मात्र समझता था पर एक बार जब प्रेस क्लब में मानवाधिकार संबधित एक छोटी सी गोष्ठी के शिरकत कर रहा था जिसमे दो लोगों के सीमित हिंदी ज्ञान के कारण बोलचाल अंग्रेजी में हो रही थी तो अचानक देखा कि चुटिया से अंग्रजी शब्दावलियां ऐसे फूट रही हैं मानों वह जनाब की मातृभाषा हो. और तभी यह मालूम भी हुआ कि भाई तो आम सामाजिक बोलचाल की भाषा के “स्प्वाल्ड जीनिअस” हैं- यानि अपने पाँव पर कुल्हाड़ी ले कर चलने वाले आज के एक और कालिदासी मार्क्स.

इस आदमी की संगत अपने आप में एक आनंद है जिसका मेरी निगाह में कोई और मोल नहीं हो सकता. उन्हें ना तो अपनी तथाकथिक क्षमताओं का नाश करने के एवज में मेरी सहानुभूतियों की जरूरत है और ना ही मैं इन सहानुभूतियों का इस्तेमाल करूँगा क्योंकि मेरा मिश्चित मानना है कि जीवन के तमाम उबड-खाबरों से गुजरने के बाद आदमी एक दिन अमिताभ ठाकुरशायद इस नतीजे पर ही पहुँचता है कि आशीष भाई सही थे और मैं और मेरी ये तमाम दौलत और सामजिक प्रतिष्ठा कितनी सतही और मामूली है. हाँ ये जरूर चाहता हूँ कि आशीष बाबू की यारी ता-उम्र बनी रहे.

लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं.

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0 Comments

  1. utkarsh sinha

    November 10, 2010 at 11:36 am

    अमिताभ जी आप अद्भुत हैं ..आशीष का पूरा पोस्टमार्टम कर दिया और साथ में मेरा भी … खैर मैं तो बहुत खुश हूँ की हम भी एक आश्रम के महंत होने की दिशा में हैं … नाम रख दें फक्कड आश्रम … ताज़ा समाचार ये है की आशीष को एक मीडिया फेलो शिप मिली है मानवाधिकार के मुद्दे पर काम करने के लिए .. देखिये कब तक कर पाते हैं ?..

  2. devashish

    November 12, 2010 at 5:08 pm

    ashish babu jo bhi hon is lekh ke liye aap ka dhanyavd aur sorry ki main hindi mein likh nahin paa rahan hoon……

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