‘पत्रकार भी कभी मरता है. जो मर गया समझो डर गया’… इस तरह के डॉयलाग सुनने में तो बहुत अच्छे लगते हैं पर असल जीवन में शायद इनका कोई मतलब नहीं है. असल जीवन बहुत अधिक सामान्य किस्म का होता है, जिसमें आदमी जिन्दा है तो जिन्दा है, मर गया तो बस मर गया और इसी के साथ उसकी कहानी खतम हो गयी.
ये बातें मैंने एक बार फिर उस समय महसूस किया जब मैं उन्नाव के जिला अस्पताल से लगे पोस्टमार्टम हाउस पर ऋतुराज शुक्ला के शव के पास खड़ा था. सामने पड़ी थी एक लाश, जो चारों ओर से कपड़ों से लिपटी हुई थी और उस गठ्ठर के भीतर उस आदमी का शव नीरिव शान्ति के साथ पड़ा था, जो मात्र कुछ घंटों पहले तक एक बहुत ही खूबसूरत, हंसमुख, मजाकिया, ऊर्जावान नौजवान के रूप में हर ओर अपनी छंटा बिखेरा करता था. उसी ऋतुराज की, जिसकी आवाज में थोड़ा सा अभिमान, बहुत सारा आत्म-विश्वास और भारी तेजी दिखती थी, अब ना तो कोई आवाज निकल रही थी और न ही भविष्य में कोई आवाज निकलनी थी. अब तो वह शांत हो चुका था हमेशा के लिए और न तो उसे भविष्य में कोई हरकत करनी थी, न कुछ कहना-सुनना था, न कोई सपने बुनना था और न किसी हानि-लाभ के विषय में सोचना-विचारना था. अब वह इन सारी बातों से बहुत ऊपर हो चुका था.
ऋतुराज शुक्ला मीडिया जगत से जुड़ा हुआ था और मुझसे उसका संपर्क इसी रूप में हुआ था, पर बाद में मीडिया पीछे रह गयी थी और व्यक्तिगत तालुकात महत्वपूर्ण रह गए थे. अब ऋतुराज इस दुनिया में नहीं है. तीन दिन पहले अचानक एक कार दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी. अब सिर्फ उसकी यादें ही बची हैं और साथ में रह गया है इस घटना का कष्ट, शोक, अवसाद और भय. लेकिन इसके साथ ही इस घटना ने एक ही बार में मेरे मन में जीवन और उसके कई आयामों से जुड़े कई प्रश्न सामने ला कर रख दिए हैं.
पहली और सबसे बड़ी बात तो जाहिर तौर पर जीवन की अनिश्चितता से जुड़ी है. हम सभी यह बात जानते हैं और बार-बार इस बात से रू-ब-रू भी होते रहते हैं, पर जैसी कि इंसानी फितरत होती है, हम सारे लोग इस बात को उतनी ही तेजी से भूल जाते हैं, जितनी गहराई से यह बात हमारे जेहन में जाती है- कुछ-कुछ रात गयी, बात गयी के तर्ज़ पर. ऋतुराज के असामयिक मृत्यु से मात्र तीन-चार दिन पहले उससे मेरी बात हुई थी. पृष्ठभूमि थी उसके छोटे भाई प्रसून शुक्ला का प्रस्तावित विवाह समारोह. चौदह नवम्बर को प्रसून का विवाह नियत था और ऋतुराज मुझे इसी बारे में समय से आने के लिए डांट रहा था. उसका पूरा हक था, वो घर का लड़का था और उसकी डांट में भी पूरा प्यार और अपनापन छिपा था. मैंने आने का वादा कर दिया था और मन ही मन सोच रहा था कि उसमे जाऊँगा या नहीं, क्योंकि मुझे शादियों में जाना कत्तई अच्छा नहीं लगता. लेकिन ऋतुराज ऐसे लोगों में थोड़े ही है, जो किसी खेल में हारने वाला हो. यदि उसने मुझे बुलाया तो मुझे आना ही था, बस्ती नहीं तो उन्नाव, शादी में नहीं तो मृत्यु के अवसर पर. तभी तो कार-ड्राइविंग का यह एक्सपर्ट अचानक एक ट्रक के सामने आ गया और उन्नाव जिला अस्पताल पहुँचते-पहुँचते उसकी मौत हो गयी.
इस अवसर पर मुझे याद आता है वह पल जब पहली बार ऋतुराज मुझसे मिला था, उस समय मैं बस्ती में एसपी था. वह एक अनुरोध के साथ आया था. वह एक नया स्थानीय चैनल शुरू कर रहा था- कपिल गंगा टीवी के नाम से. वह चाहता था मैं और तत्कालीन डीएम रामेन्द्र त्रिपाठी उसके चैनल का विधिवत उद्घाटन करें. हम लोगों ने ऐसा किया और जल्दी ही हम लोगों के चेहरे अक्सर उस कपिल गंगा चैनल पर दिखने लगे थे. कोई भी छोटी-बड़ी बात होती ऋतुराज के लोग हमारी बात रिकॉर्ड करने पहुँच जाते. हम लोग भी काफी खुश होते अपना चेहरा देख कर. स्थानीय लोग भी अपने आस-पास के समाचारों को देख कर काफी खुश थे और बहुत जल्दी ही कपिल गंगा चैनल बस्ती के जनजीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया था.
इसी बीच ऋतुराज और हम लोगों के संबंध मीडिया और अधिकारी से बढ़ कर व्यक्तिगत स्तर पर बहुत तेजी से बढ़ रहे थे. उसमें कुछ ऐसा अपनापन था कि वो घर का एक प्यारा सदस्य हो गया था. मेरे साथ मेरी पत्नी नूतन को भी यह नया देवर अच्छा लगता और उसके आते ही भैया-भाभी खुश हो जाते. मेरे चक्कर में उसने बस्ती के एक प्रभावशाली नेता तक से अपने पुराने संबंध तोड़ लिए जब नेताजी और मुझमें कुछ बिंदुओं पर खट-पट हो गयी थी.
मैं बस्ती से ट्रांसफर हो गया और फिर कई जगह घूमता रहा. लेकिन इन सारे ट्रान्सफरों के बीच ऋतुराज लगातार हमारे घर का सदस्य बना रहा. बल्कि समय के साथ हमारे संबंध और अधिक प्रगाढ़ ही होते गए. चौदह नवम्बर को शायद मैं प्रसून की शादी में इससे मिलता. प्रसून खुद भी मीडिया के क्षेत्र में है और वर्तमान में सहारा टीवी में अच्छे पद पर है. लेकिन उस रोज मैंने एक बार फिर जाना कि जीवन में ज्यादातर बातें अकस्मात होती हैं और उनके बारें में किसी को गुमान तक नहीं होता है.
तभी तो ऋतुराज मुझे उन्नाव में अपने भयानक रूप से सिसकते बड़े भाई अशोक शुक्ला की कार में उनके बगल में निश्चेष्ट लेटा दिखा, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा तक नहीं था. चाहे पत्रकार हों या पुलिस वाले या कोई और, जिंदगी सबों को इसी तरह तब तक घुमाती और हैरान करती रहती है जब तक यह तमाशा चलता है. फिर एक बार डोर खींच गयी और सब कुछ शांत. हमेशा के लिए शांत.
लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं.












मदन कुमार तिवारी
November 13, 2010 at 7:21 am
अमिताभ जी आप सचमुच पुलिस वाले हो।? अगर हो तो जल्दी से दुसरी नौकरी तलाश लो । पहला पुलिसवाला मिला जो संवेदनाओं को समझता और जिता है। वरना अपराधी को गाली देते और मारते हुये अपनी आत्मा को भी मार डालता है।
dhirendra pratap singh
November 13, 2010 at 12:39 pm
amitabh ji madan ji ki baat bilkul sahi h m unase puri tarah sahmat hu
a ram
November 13, 2010 at 2:17 pm
काश आपकी की तरह हर पुलिस अधिकारी होता… सतत नमन आपको
rakesh singh
November 14, 2010 at 7:00 am
bhagwan mritak rituraj ji ki aatma ko shanti pradan kare aur sabhi shokakul pariwar ko shakti de… aur amitabh ji aap jaise ache admi ko ache log hi milte hain.. apki bhawana ko pranam
EKHLAQU KHAN
November 15, 2010 at 10:58 am
Amitabh Sir – Vastav me aap police ke adhikari rahe hai? yakeen nahi hota. meri jahan tak soch hai kisi ko dekhna hai to uski bhasha per mat jao. uski lekhni me dil ki baat rahti hai. kaash sare police walon ke sene me aap jaisa dil hota to aaj hamara des kis bulandi per hota. aap ke patra ne vastav me dil ko chhoo liya.
08004192800
dhanish sharma
November 17, 2010 at 7:40 am
sir.apki punch line ka jawab nai.dil sa likhi hai apna kya.mind blowing.