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पत्रकारिता के महाबलियों की नैतिकता!

आलोक तोमरप्रणय रॉय बरखा के लिए और वीर सांघवी अपने लिए कह रहे हैं कि उन्होंने तो पत्रकारिता के उस धर्म का पालन किया था जिसमें सूत्रों से जानकारी लेना कोई गुनाह नहीं होता और बातचीत में अपने पास जो जानकारी है वह भी बतानी पड़ती है। यह बात अलग है कि छैल छबीली बरखा दत्त और रसिया वीर सांघवी की जो बातचीत हमारे पास हैं वह दलाली और शुद्व दलाली का है। सुहेल सेठ की बातचीत का वर्णन अभी तक इसलिए नहीं किया क्योंकि सुहेल दलाल है और उन्हें अपने आपको फिक्सर कहने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती।

आलोक तोमरप्रणय रॉय बरखा के लिए और वीर सांघवी अपने लिए कह रहे हैं कि उन्होंने तो पत्रकारिता के उस धर्म का पालन किया था जिसमें सूत्रों से जानकारी लेना कोई गुनाह नहीं होता और बातचीत में अपने पास जो जानकारी है वह भी बतानी पड़ती है। यह बात अलग है कि छैल छबीली बरखा दत्त और रसिया वीर सांघवी की जो बातचीत हमारे पास हैं वह दलाली और शुद्व दलाली का है। सुहेल सेठ की बातचीत का वर्णन अभी तक इसलिए नहीं किया क्योंकि सुहेल दलाल है और उन्हें अपने आपको फिक्सर कहने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती।

वीर सांघवी लिखते हैं कि दूसरी बातचीत में अंबानी बंधुओं के बीच झगड़े पर मैंने नीरा राडिया से उनके क्लाइंट मुकेश अंबानी की स्थिति के बारे में पूछा था। मैंने तो अनिल अंबानी के बारे में भी बात की थी। मैंने यह भी लिखा था कि अनिल के प्रतिनिधि मेरे दोस्त टोनी जेसुदासन मुझे लंच पर ले गए थे और अनिल के बारे में बताया था। मेरी दोस्त नीरा राडिया मुकेश के बारे में बता रही थी और मेरा ज्ञान बढ़ रहा था। अब अगर प्रभु चावला सुप्रीम कोर्ट के फैसले फिक्स कराने की बात करे, बरखा दत्त दयानिधि मारन को मंत्रिमंडल को शामिल नहीं होने देने के लिए रेसकोर्स रोड से दलाली करें या वीर सांघवी अनिल और मुकेश अंबानियों के एजेंटों से ज्ञान पा कर लेख लिखे तो इससे वे देवदूत साबित नहीं हो जाते। वीर सांघवी ने नीरा से जो समझा था वह जैसा का तैसा अपने कॉलम में उतार दिया।

हंसी इस बात पर आती है कि इसी कॉलम में वीर सांघवी लिखते हैं कि मुझे कानून कतई नहीं आता और न्यायपालिका का मैं आदर करता हूं मगर इतना तो कह ही सकता हूं कि हाईकोर्ट के जज ने दोनों अंबानियों के बीच हुए एमओयू को सबसे ज्यादा महत्व दिया जैसे दो लड़ते हुए बच्चे मम्मी के पास जाते हैं और अपने खिलौना का झगड़ा सुलझाते हैं। लेकिन मेरा सवाल ये है कि देश के प्राकृतिक संसाधनों की कीमत कोई एक निजी समझौता कैसे तय कर सकता है और यह मामला कैसे राष्ट्रीय महत्व से ज्यादा का बन गया?

आप पढ़ चुके हैं कि नीरा राडिया ने वीर सांघवी से अपनी बातचीत में यही कहा था कि अदालत का फैसला देश के हित में नहीं है। टाटा के बारे में कहा था कि वे पहले लोगों का भला सोचते हैं, फिर अपना। अब पढ़िए वीर ने क्या लिखा था- ”टाटा जैसे ईमानदार उद्योगपति अपनी परियोजनाओं के लिए लड़ते ही रह जाते हैं जबकि चालू लोग काम निकाल लेते हैं। पिछले सप्ताह मैंने लक्ष्मी नारायण मित्तल का इंटरव्यू किया था जो भारत में अरबों लगाने को तैयार हैं लेकिन बाधाओं से परेशान हैं। भ्रष्टाचार से हम सब परेशान हैं लेकिन अपने संसाधनों के बारे में नहीं सोचते। अपनी फैक्टरी चलाने के लिए नेता को रिश्वत देने की बात तो समझ में आती है मगर प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना तो अपराध है।”

एक एक शब्द वही लिखा गया है जो नीरा राडिया और वीर सांघवी के बीच बातचीत में कहा गया है। 20 जून 2009 का एक टेप और है जिसमें नीरा राडिया वीर सांघवी के छपे हुए लेख से बहुत प्रसन्न है और उनका एक खास कर्मचारी उस लेख को डाउनलोड कर रहा है। यह कर्मचारी मनोज यह भी कह रहा है कि मैं सिर्फ डाउनलोड नहीं कर रहा, कटिंग पेस्टिंग भी कर रहा हूं क्योंकि मुझे इसमें कुछ तिकड़मबाजी भी करनी है। नीरा राडिया जवाब देती हैं कि वीर सांघवी ने वही लिखा है जो उन्हें लिखना चाहिए था। कोयले, स्पेक्ट्रम और लोहे को एक साथ जोड़ दिया। मनोज नाम का आदमी कहता है कि ये तो सब लोग समझ ही जाएंगे कि इसके पीछे कौन है? नीरा राडिया पूछती है कि वाकई और मनोज कहता है कि जिन जिन से आपने बात की है, उनको तो समझ में आ ही जाएगा।

हालांकि इस शर्मनाक दलाली पर ज्यादातर तो क्या सभी टीवी चैनल और मीडिया घराने खामोश हैं मगर टाइम्स नाउ के अरनब गोस्वामी ने एक आंतरिक मेल निकाल कर इस पूरे चक्कर को शर्मनाक और घटिया कहा है और यह भी कहा कि अगर किसी ने किसी शो का पास भी लिया तो उसे भ्रष्टाचार माना जाएगा। इतनी हिम्मत दिखाने वाले और कहीं क्यों नहीं हैं? अरनब और राजदीप सरदेसाई, उनकी पत्नी सागरिका घोष और कई लोग बरखा के साथ काम कर चुके हैं और आदर्श मित्रों की तरह उन्हें बचाने में लगे हुए हैं। अरनब की तरह हिम्मत कोई नहीं दिखा रहा।

ऐसा नहीं कि दलाली पहले नहीं होती थी और मीडिया कामधेनु की तरह पवित्र था। मगर जब सब कुछ सामने आ गया, बड़े बड़े मीडिया नायक एक्सपोज हो गए तो भी आउटलुक और मेल टुडे को छोड़ कर किसी और ने आवाज उठाने का साहस नहीं किया। ये कायरता है या रणनीति, इसकी सफाई तो करने वाले ही दे सकते हैं लेकिन कायरता को रणनीति में बदलने वाले भी कम नहीं होते। इन लोगों पर भरोसा करना तो दूर इन्हें तो पत्रकारिता के संसार से वर्जित कर देना ज्यादा जरूरी है। अपने आपको बहुत बहादुर बताने वाले हिंदू अखबार ने भी एक निरापद किस्म की टिप्पणी संपादकीय के तौर पर की मगर बरखा और वीर का नाम छापने की हिम्मत उनकी भी नहीं हुई। क्या पता, हमाम में उनके भी कुछ लोग हैं।

मीडिया और राजनीति का रिश्ता क्षणभंगुर नहीं होता। लेकिन वह सात जन्मों वाला भी नहीं होता। जब कोई नेता जरा सी भी चूक करता है तो मीडिया की तरफ से नारे बुलंद होने लगते हैं कि उसे सजा मिले और उसकी कुर्सी छीने। यह भी सही है कि राजनेताओं का दायित्व और कर्तव्य ज्यादा होता है क्योंकि वे जनता के वोट से जीत कर आते हैं। पत्रकार बेचारे तो सिर्फ नौकरी कर रहे होते हैं। लेकिन एनडीटीवी और वीर सांघवी की सफाई अगर यह है कि उन्हें अपने सूत्रों से राजनैतिक बातें करनी पड़ती हैं तो यह अर्धसत्य है। सूत्रों से राजनैतिक जानकारी लेना एक बात है और उनके साथ मिल कर उनके घटिया खेल में हिस्सेदार बनना दूसरी बात है। आखिर सोए को जगाया जा सकता है मगर जो अपनी सुविधा के अनुसार सोने का अभिनय कर रहे हों उन्हें कौन, कैसे जगाए और कब तक जगाए रखे?

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक हैं.

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0 Comments

  1. D K Gupta

    November 26, 2010 at 8:53 am

    Well done Aloke Jee

  2. Nikku

    November 26, 2010 at 9:32 am

    Alok bhai aap to journalism ke real hero hai……Barkha………Veer Sanghvi to Dalal hai……….Chor chori karte hua pakde jaane ke baad bhi ye thodi kahataa hai maine chori ki hai karke

  3. rajesh kumar

    November 26, 2010 at 3:13 pm

    आलोक तोमर जी,
    आप आले दर्जे के चोर हैं। एक तो ओपन पत्रिका से कंटेंट चुरा-चुरा कर उसका हिंदी अनुवाद अपने नाम से छाप रहे हैं। कायदे से आपको अपना नाम लेखक के तौर पर नहीं बल्कि अनुवादक के तौर पर देना चाहिए। दूसरी बात। जिस अर्णव को ओपन पत्रिका और आपने हीरो बनाने की कोशिश की है कॉमनवेल्थ गेम्स की रिपोर्टिंग के दौरान उसी अर्णव और टाइम्स ग्रुप की पोल प्रथम प्रवक्ता ने खोली थी। किस तरह ठेका नहीं मिलने पर उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स की दलाली से पर्दा उठाया। ठेका मिल गया होता तो सब ठीक था। इसलिए सिर्फ अनुवाद मत किया कीजिए, थोड़ा दिमाग भी लगाइए और अपना नजरिया पेश कीजिए। वैसे आपकी और यशवंत की दलाली के किस्से भी मीडिया के बाजार में चर्चित रहे हैं।

  4. ARBAAZ

    November 26, 2010 at 3:27 pm

    dalalon se patrakarita ko mukt karo…kaun uthaega yah jhanda…shayad koi nahin…kyonki asli patrakar naukari mein hain baaki to maalik hain…

  5. Rajeev Ranjan Prasad

    November 27, 2010 at 12:48 am

    दिलचस्प स्टोरी। और कुछ कहने-सुनने और चस्पा करने को शेष न रहा। साधुवाद।
    राजीव रंजन प्रसाद, प्रयोजनमूलक हिन्दी, पत्रकारिता, शोध-छात्र, बीएचयू, वाराणसी

  6. ????

    November 27, 2010 at 6:47 am

    छैल छबीली बरखा दत्त और रसिया वीर सांघवी ko hindi to aati nahi hogi. eshke english translate karwakar unhe bhejini chahiyen.

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