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धर्मांधता के खिलाफ सिनेमाई हस्‍तक्षेप

इफीपणजी। सुप्रसिद्ध भारतीय फिल्‍मकार गौतम घोष की नई फिल्‍म मोनेर मानुष (द क्‍वेस्‍ट) धर्मांधता के खिलाफ एक सशक्‍त सिनेमाई हस्‍तक्षेप है। भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के प्रतियोगिता खंड में इसे प्रदर्शित किया गया है। यह फिल्‍म भारतीय पैनोरमा खंड की भी एक विशिष्‍ट कृति है। भारत और बांगलादेश में एक साथ 3 दिसम्‍बर 2010 को रिलीज किया जा रहा है। इसमें दोनों देशों के कलाकारों ने काम किया है। 1952 के बाद पहली बार ऐसा होने जा रहा है।

इफीपणजी। सुप्रसिद्ध भारतीय फिल्‍मकार गौतम घोष की नई फिल्‍म मोनेर मानुष (द क्‍वेस्‍ट) धर्मांधता के खिलाफ एक सशक्‍त सिनेमाई हस्‍तक्षेप है। भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के प्रतियोगिता खंड में इसे प्रदर्शित किया गया है। यह फिल्‍म भारतीय पैनोरमा खंड की भी एक विशिष्‍ट कृति है। भारत और बांगलादेश में एक साथ 3 दिसम्‍बर 2010 को रिलीज किया जा रहा है। इसमें दोनों देशों के कलाकारों ने काम किया है। 1952 के बाद पहली बार ऐसा होने जा रहा है।

ज्ञानपीठ पुरस्‍कार विजेता बांगला लेखक और साहित्‍य अकादमी के अध्‍यक्ष सुनील गंगोपाध्‍याय की कहानी पर आधारित यह फिल्‍म उस सूफी संत लालन फकीर के बारे में है, जिन्‍होंने हिन्‍दुओं और मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता का जवाब प्रेम और करूणा की एक नयी मानवीय परंपरा को बनाकर दिया। फिल्‍म में पहले से बनी बनायी कोई कहानी नहीं है। 19वीं सदी में घटित बंगाल

गौतम घोष

गौतम घोष

के नव जागरण की पृष्‍ठभूमि में फिल्‍म शहरी बौद्धिकता और देशज ज्ञान की बहस का सिनेमाई आख्‍यान रचती है। गुरूदेव रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई और अपने जमाने के चर्चित चित्रकार ज्‍योतिन्‍द्र नाथ ठाकुर लालन फकीर को अपने घर आमंत्रित करते हैं, यह 1889 का अविभाजित बंगाल है और जीवन एवं जगत के बारे में कई सवालों पर बातचीत करते हैं। लालन फकीर के जीवन को फ्लैश बैक में देखते हुये हम एक विस्‍मयकारी देशकाल की यात्रा करते हैं। जीवन के अधिकतर जटिल सवालों के जवाब फिल्‍म में विलक्षण संगीत के माध्‍यम से दिए गए हैं। इस प्रकार फिल्‍म का गीत संगीत, फिल्‍म की पटकथा और संवादों के अंग हैं। यह फिल्‍म जीवन और समय के बारे में एक अद्भुत संगीतमय आख्‍यान है। खास बात यह है कि 19वीं सदी के अंतिम दिनों के बंगाल का देशकाल जिस जीवंतता के साथ प्रस्‍तुत होता है, उसे देखना एक दुर्लभ अनुभव है।

बंगाल के एक निर्धन हिन्‍दू परिवार में जन्‍मे लालन फकीर को दूसरा जीवन मु‍स्लिम परिवार में मिलता है। बाउल संगीत की परंपरा उन्‍हें सूफी दर्शन से जोड़ती है। उन्‍होंने तब के अविभाजित बंगाल में हिन्‍दू और मुस्लिम धर्मांधता के खिलाफ शांति, करूणा एवं सह-अस्तित्‍व की नई परंपरा शुरू की। जिसकी जरूरत आज पहले से कहीं अधिक है। नदी, जंगल, खेत, आसमान, हवा, आग, पानी यानी प्रकृति मनुष्‍य के इतने करीब सिनेमा में बहुत कम देखी गई है। गौतम घोष का कैमरा एक तिनके से लेकर पानी की बूंद और हवा की सरसराहट को भी बड़े सलीके से दृश्‍यों में बदलता है। उन्‍होंने लगभग लुप्‍त हो चुके लालन फकीर के गीतों और धुनों को पहली बार इतनी मेहनत से पुनर्जीवित किया है। बांगला देश के सूफी गायक फरीदा परवीन और लतीफ शाह ने अपनी गैर-व्‍यावसायिक आवाजों से वास्‍तविक प्रभाव पैदा किया है। गौतम घोष को बांगलादेश के कुश्तिया में 85 वर्षीय फकीर अब्‍दुल करीम खान ने लालन के संगीत के खजाने के बारे बताया था।

फिल्‍म में हम साधारण लोगों की करिश्‍माई छवियां देखते हैं। जहां जीवन अपनी सहजता में अद्भुत कलात्‍मक और दार्शनिक ऊंचाई पर पहुंचता है। एक स्‍त्री जिसका प्रेमी नपुंसक हो चुका है, मानेरअपनी शारीरिक कामना के आवेग में लालन फकीर के पास जाती है और निराश होकर लौट जाती है। आश्‍चर्य है कि अपने एक सहयोगी की उत्‍कट देहाकांक्षा को पूरा करने के लिए लालन उसी स्‍त्री से अनुरोध करते हैं। फिल्‍म स्‍त्री पुरूष संबंधों में प्रेम, सेक्‍स, समर्पण और शरीर से जुड़े जटिल सवालों का आसान जवाब गानों के रूप में सामने रखती है। धर्म, समाज, परिवार और रिश्‍तों की दुनिया में लालन फकीर का संगीत किसी आध्‍यात्मिक ऊंचाई के बदले दिल की धड़कन की तरह मौजूद है। गौतम घोष की करिश्‍माई सिनेमाटोग्राफी प्रकृति और मनुष्‍य के रिश्‍तों को दिन रात के बदलते काल चक्र के पर्दे पर खूबसूरती से उकेरती है। लालन फकीर की भूमिका में बांगला फिल्‍मों के सुपर स्‍टार प्रसेनजीत चटर्जी का अभिनय जादुई असर पैदा करता है। उनकी आंखें और उनका चेहरा बिना संवाद के दृश्‍यों में बहुत कुछ कहता रहता है।

अजित राय अखबारों, चैनलों, थिएटर, सिनेमा, साहित्य, संस्कृति आदि से विविध रूपों में जुड़े हुए हैं. जनसत्‍ता के लिए वे फिल्म व थिएटर समीक्षक के रूप में लंबे समय तक लिखते रहे हैं. इंडिया टुडे और आउटलुक मैग्जीनों में भी लगातार लिखते रहते हैं. कई मशहूर शिक्षण संस्थानों में पत्रकारिता व थिएटर के अजीत रायछात्रों को पढ़ाने का काम भी समय-समय पर करते हैं. हरियाणा के यमुनानगर में डीएवी गर्ल्‍स कॉलेज के साथ मिल कर पिछले कुछ सालों से एक अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह आयोजित कर रहे हैं. इन दिनों वे फिल्म समारोह में शिरकत करने गोवा गए हुए हैं. इनका ई मेल पता [email protected] है.

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0 Comments

  1. DEVENDRA PATEL

    November 27, 2010 at 5:03 am

    ajeet bhai,

    der sahi magar filmkakon ne bhi bharateey saskriti ka punarsthapit karane jo kadam uthaya hai.vah prasashaneey hai.thanks

  2. Hn Pandey -DAUSA (RAJ.)

    November 27, 2010 at 11:27 am

    धरम संकट दूर हुआ मै दौसा के रिपोर्टर भाईयो का, अब ईमानदारी तो दिखावो …………….. ?

    दौसा लम्बे समय से चल रहा धरम संकट अब दूर हो गए है .दरसल यहाँ पर लगभग ३ साल से प्रेस क्लब के नाम से केवल दौसा प्रेस ही है जिसके अधयक्स सुरेश कुमावत जी है जिनकी निगरानी मै ये क्लब बहुत अच्छा चल रहा था अचानक प्रेस डे से एक रात पहले कुछ लोगो ने जो दौसा प्रेस क्लब के सदसय भी है उन्होंने रातो रात कोई दूसरा संगठन बना के कार्य करनी बनी डाली अब क्या था प्रेस डे मनाना ही था, एक प्रेस क्लब ने तो विधायक और राजस्थान सरकार के मंत्री एक को अपने प्रेस क्लब मै होने वाले कार्येक्रम मै आमंतरण दिया ,और दौसा प्रेस क्लब ने भी राजस्थान सरकार के ही मंत्री एक और को आमंतरण दिया और सूत्रों के मुताबिक दोनों ही मंत्रियो का दौसा आना तय हुआ था ,पर राजस्थान मै दौसा के नाम से एक कहावत कही जाती है की (और जगह की सो और दौसा के दो ही बोहुत है ) मतलब ये भी है की,, दौसा को राजनीति का वट वृक्ष ,,भी कहा जाता रहा है दरसल हुआ भी यही यही भी राजनीति हो गई और जो रातो रात प्रेस क्लब बना था वहा मुरारी लाल मीना जी आ गए पर दौसा प्रेस क्लब के कार्येक्रम मै उक्त मंत्री जी नहीं आये तो मालूम हुआ की मंत्री जी को किसी रिपोर्टर का फ़ोन गया था की दौसा प्रेस और दूसरा संगठन दो अलग अलग गुट हो गए है ,जिसमे आप क्यों उलझ रहे है ,और ये रिपोर्टर जी ने मंत्री जी को खूब अच्छा समझा दिया .और मंत्री जी दौसा प्रेस क्लब के प्रेस डे वाले दिन कार्येक्रम मै नहीं आये समझाने वाले ने यहाँ तक कहा बताया की ये लड़ाई दो अलग अलग संगठनो की है औ आप को मोहरा बनाया जा रहा है जिसका धरम संकट अब दूर हो गया लेकिन कुछ दोनों ही हाथो मई लड्डू लिए है वे ये समझरहे की दोनों संगठनों को ये ही मालूम है की हम तो उक्त संगठन मतलब एक ही तरफ है लेकिन उनकी हजारी दो ही तरफ हो रही है जिसका किसी को मालूम नहीं है ये उनकी गलत फेमि है सायद ये लोग ये नहीं जानती की विभिक्षण तो रावण का है भाई था ना उसने भी तो रावण को मरने को मूल मंत्र राम जी को बताया था ? देखो जो भी हुआ अच्छा है और जो होगा वो भी अच्छा ही होगा ये गीता जी का सर है और हम लोगो को तो केवल देखना है लेकी इस प्रेस डे ने एक बात तो समझा दी के अब दोगली चल चलने से जल्दी पकड्मै आने का खतरा है तो इसलिए एक ही संगठन का ही हाथ पकड़ो जिससे समाया आने पे साथ दे अब अलग अलग रास्ते बन गए है लिकिन मंजिल आज भी एक ही है लिकिन जिस भी गुट मै आप हो उसके साथ इमाम्दारी से रहो ये नहीं की दोनों गुटों मै हजारी दो उससे कोई फायदा नहीं उलटे एक दुसरे की नज़रो मै गिर जावोगे ना भाई
    संपादक जी .
    प्रकासना के लिए भेज रहा हु
    दौसा 9414334957

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