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पुराने स्‍टाइल का मीडिया क्‍या परास्‍त हो गया है?

प्रमोद जोशीआईबीएन-सीएनएन ने राडिया लीक्स और विकी लीक्स के बाद अपने दर्शकों से सवाल किया कि क्या पुराने स्टाइल के जर्नलिज्म को नए स्टाइल के मीडिया ने हरा दिया हैं? क्या है नए स्टाइल का जर्नलिज्म? सागरिका घोष की बात से लगता है कि नया मीडिया यानी सोशल मीडिया, ट्विटर वगैरह। नया मीडिया और उसकी तकनीक समझ में आती है, पर नई स्टाइल क्या? नई स्टाइल में दो बातें एक साथ हो रहीं हैं। एक ओर पता लग रहा है कि पत्रकार और स्वार्थी तत्वों की दोस्ती चल रही है, दूसरी ओर ह्विसिल ब्लोवर हैं, नेट पर गम्भीर सवाल उठाने वाले हैं।

प्रमोद जोशीआईबीएन-सीएनएन ने राडिया लीक्स और विकी लीक्स के बाद अपने दर्शकों से सवाल किया कि क्या पुराने स्टाइल के जर्नलिज्म को नए स्टाइल के मीडिया ने हरा दिया हैं? क्या है नए स्टाइल का जर्नलिज्म? सागरिका घोष की बात से लगता है कि नया मीडिया यानी सोशल मीडिया, ट्विटर वगैरह। नया मीडिया और उसकी तकनीक समझ में आती है, पर नई स्टाइल क्या? नई स्टाइल में दो बातें एक साथ हो रहीं हैं। एक ओर पता लग रहा है कि पत्रकार और स्वार्थी तत्वों की दोस्ती चल रही है, दूसरी ओर ह्विसिल ब्लोवर हैं, नेट पर गम्भीर सवाल उठाने वाले हैं।

दोनों में ओल्ड स्टाइल और न्यू स्टाइल क्या है? दोनों बातें अतीत में हो चुकी हैं। हमने बोफोर्स का मामला देखा। हर्षद मेहता और केतन मेहता के मामले देखे। कमला का मामला देखा, भागलपुर आँखफोड़ मामला देखा। यह भारत में हिकीज़ जर्नल से लेकर अब तक पत्रकारिता की भूमिका यही थी। नयापन यह आया कि मुख्यधारा का मीडिया यह सब भूल गया। कम से कम नए मीडिया ने यह बात उठाई। ओल्ड स्टाइल जर्नलिज्म को न्यू मीडिया ने सहारा दिया है।

सागरिका का एक सवाल यह भी है कि सिटिज़न जर्नलिज्म के सामने आने के बाद क्या मुख्यधारा के जर्नलिज्म की ज़रूरत खत्म हो गई। टीएन नायनन की बात ठीक है कि विकीलीक्स के लाखों दस्तावेज पढ़ने और उन्हें समझने के लिए पाठक न्यूयार्क टाइम्स पढ़ेगा। बेशक जर्नलिज्म के लिए एक जिम्मेदारी और प्रशिक्षण की दरकार है। इसकी ज़रूरत आने वाले वक्त में और ज्यादा होगी।

हिन्दी पत्रकार के रूप में मेरी परेशानी यह है कि यह मसला अभी हिन्दी मीडिया में चर्चा का विषय नहीं बना। क्यों नहीं बना? कोई बताएगा। जर्नलिज्म नहीं मरेगा। लोकतंत्र नई शक्ल लेगा। इट इज़ ओल्ड इन ए न्यू फार्म।

लेखक प्रमोद जोशी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. करीब चार दशक से हिंदी मीडिया से जुड़े हुए हैं. हिन्‍दुस्‍तान में स्‍थानीय संपादक भी रह चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र लेखन कर रहे हैं. यह लेख उनके ब्‍लाग जिज्ञासा से साभार लिया गया है.

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0 Comments

  1. santosh

    December 2, 2010 at 4:06 am

    sir, i fully agree with you, now a days hindi news channels are only for repeat telecast of tv searials and only for entertainment

    is this fault of journalists or platform on which they are working

  2. santosh

    December 2, 2010 at 4:14 am

    sir agree with you, now a days Hindi news channels are only for entertainment

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