डीएनए ने हिम्मत दिखाई

: मुझे चिन्ता इस बात की है कि मीडिया के कारोबार में घुस आए लोग इसे बौद्धिक कर्म से दूर करने की कोशिश में लगे रहते है : डीएनए ने हिम्मत दिखाई और घोषणा करके एडिट पेज बन्द कर दिया। साथ में यह कहा कि इसे बहुत कम लोग पढ़ते हैं, बोरिंग होता है, अपनी ज़रूरत खो चुका है, सिर्फ जगह भरने का काम हो रहा था। आदित्य सिन्हा उत्साही और प्रखर पत्रकार हैं। पर उन्होंने सम्पादकीय पेज हटाने के बारे में जो बातें लिखीं हैं, वे नई नहीं हैं।

राष्‍ट्रीय क्षितिज पर बेअसर हैं हिंदी अखबार

प्रमोद जोशी1983 में राजेन्द्र माथुर ने टाइम्स ऑफ इंडिया में हिन्दी के दैनिक अखबारों की पत्रकारिता पर तीन लेखों की सीरीज़ में इस बात पर ज़ोर दिया था कि हिन्दी के पत्रकार को हिन्दी के शिखर राजनेता की संगत उस तरह नहीं मिली थी, जिस तरह की वैचारिक संगत बंगाल के या दूसरी अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों-पत्रकारों को मिली थी। आज़ादी से पहले या उसके बाद प्रेमचंद, गणेश शंकर विद्यार्थी या राहुल बारपुते को नेहरू जी की संगत नहीं मिली।

एक साथ दो चैनलों में लाइव मणिशंकर

प्रमोदजीयह पोस्ट मैने मीडिया से जुड़े रोचक ब्लाग चुरुमुरी से सीधे ली है। यह ब्लाग कर्नाटक के पत्रकारों से जुड़ा लगता है। अक्सर इसमें बड़ी रोचक बातें पढ़ने को मिलतीं हैं। इसमें एक दर्शक ने दो चैनलों में एक ही वक्त पर लाइव कार्यक्रमों में मणिशंकर अय्यर की उपस्थिति पर आश्चर्य व्यक्त किया गया है। टीवी चैनलों के लिए यह बात आश्चर्य का विषय नहीं है। वे लाइव कार्यक्रम के बीच जब रिकार्डेड सामग्री दिखाते हैं तो उसे भी लाइव दिखाते हैं।

पुराने स्‍टाइल का मीडिया क्‍या परास्‍त हो गया है?

प्रमोद जोशीआईबीएन-सीएनएन ने राडिया लीक्स और विकी लीक्स के बाद अपने दर्शकों से सवाल किया कि क्या पुराने स्टाइल के जर्नलिज्म को नए स्टाइल के मीडिया ने हरा दिया हैं? क्या है नए स्टाइल का जर्नलिज्म? सागरिका घोष की बात से लगता है कि नया मीडिया यानी सोशल मीडिया, ट्विटर वगैरह। नया मीडिया और उसकी तकनीक समझ में आती है, पर नई स्टाइल क्या? नई स्टाइल में दो बातें एक साथ हो रहीं हैं। एक ओर पता लग रहा है कि पत्रकार और स्वार्थी तत्वों की दोस्ती चल रही है, दूसरी ओर ह्विसिल ब्लोवर हैं, नेट पर गम्भीर सवाल उठाने वाले हैं।

सुभाष राय होंगे जनसंदेश टाइम्स के एडिटर?

लखनऊ से प्रकाशित होने जा रहे जनसंदेश टाइम्स का संपादक कौन होगा, इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म है. तीन नाम जबर्दस्त चर्चा में हैं. प्रमोद जोशी, सुभाष राय और सुनील दुबे. सूत्रों का कहना है कि तीनों ही लोगों को जनसंदेश प्रबंधन से बातचीत हुई है. किसका नाम फाइनल हुआ है, यह पता नहीं चल सका है. कुछ लोगों का कहना है कि सुभाष राय को संपादक पद की जिम्मेदारी देने का फैसला प्रबंधन ले चुका है. उधर, प्रबंधन से जुड़े सूत्र कह रहे हैं कि अभी कई नामों पर विचार चल रहा है, किसी को फाइनल नहीं किया गया है.

राजेंद्र कभी नहीं रहे शशि के आदमी!

राजेंद्र तिवारीकहानी दिलचस्प होती जा रही है. जिस राजेंद्र तिवारी को शशि शेखर ने संस्थान के साथ दगाबाजी व विश्वासघात का आरोप लगाकर अचानक झारखंड के स्टेट हेड पद से हटाकर चंडीगढ़ पटक दिया, उस राजेंद्र तिवारी के बारे में सबको यही मालूम है कि उन्हें हिंदुस्तान में लेकर शशि शेखर आए थे. शशि शेखर के ज्वाइन करने के बाद राजेंद्र तिवारी ने हिंदुस्तान ज्वाइन किया, यह तो सही है लेकिन यह सही नहीं है कि राजेंद्र तिवारी को शशि शेखर हिंदुस्तान लेकर आए. हिंदुस्तान, दिल्ली में उच्च पदस्थ और शशि शेखर के बेहद करीब एक सीनियर जर्नलिस्ट ने भड़ास4मीडिया को नाम न छापने की शर्त पर कई जानकारियां दीं. इस सूत्र ने भड़ास4मीडिया को फोन अपने मोबाइल से नहीं बल्कि पीसीओ से किया क्योंकि उसे भी डर है कि कहीं फोन काल डिटेल निकलवा कर और विश्वासघात का आरोप लगाकर उसे भी न चलता कर दिया जाए.

मृणाल-प्रमोद की कहानी से सबक लेंगे संपादक?

[caption id="attachment_16678" align="alignleft"]विनोद वार्ष्णेयविनोद वार्ष्णेय[/caption]एक साल भी न हुआ कि नौकरी लेने वाले खुद नौकरी गंवा बैठे : बीस जनवरी को एक साल हो जायेगा. हिंदुस्तान के कुछ लोग इस दिन को “मुक्ति दिवस” के रूप में मनाने जा रहे हैं. ये वे लोग हैं जिन्हें दो साल के कांट्रेक्ट रिनूअल के दो महीने बाद अचानक आर्थिक मंदी के नाम पर कह दिया गया कि “जाओ, एचटी बिल्डिंग छोड़कर जाओ, मन लगाकर मेहनत करना और ईमानदारी क्या होती है, यह हम नहीं जानते; बस, घंटे भर में जाओ तीस-पच्चीस-छत्तीस साल की तुम्हारी मेहनत क्या होती है, हमें नहीं पता, बस निकल जाओ.” सब जानते थे कि यह मंदी से अधिक सम्पादक की कुटिल और स्वार्थी मानसिकता का नतीजा थी. यह भी सब जानते थे कि मंदी सिर्फ बहाना है, मृणाल पान्डे को कुछ लोगों से छुट्टी पाना है; मैनेजमेंट के सामने कमाल कर दिखाने का खिताब पाना है. और जो चाटुकार नहीं, केवल पत्रकार थे, उन्हें अपने स्वाभिमान की कीमत चुकाना है. यह नया नैतिक शास्त्र था जिसमें संपादक संपादक न रहे, वे मैनेजमेंट की जीभ से निकले शब्दों से हिलने वाली उसकी पूंछ हो गए.

शशि शेखर, जवानी आपकी भी जाएगी

हिंदुस्तान से प्रमोद जोशी, सुषमा वर्मा, शास्त्रीजी, प्रकाश मनु, विजय किशोर मानव हो रहे हैं विदा : ‘इस्तीफा नहीं दिया है’ जैसी बात कहते हुए भी हिंदुस्तान, दिल्ली के सीनियर रेजीडेंट एडिटर प्रमोद जोशी चले जाने की मुद्रा में आ गए हैं। एकाध-दो दिन आफिस वे आएंगे और जाएंगे लेकिन इस आने-जाने का सच यही है कि वे फाइनली जाने के लिए आएंगे-जाएंगे। दरअसल, एचटी मीडिया से हिंदुस्तान अखबार को अलग कर जो नई कंपनी हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (एचएमवीएल) की स्थापना की गई है, उसमें रिटायरमेंट की उम्र 60 की बजाय 58 साल रखी गई है। रिटायर होने की उम्र पहले 58 ही हुआ करती थी लेकिन केंद्र सरकार ने इसमें दो साल की वृद्धि की तो नियमतः सभी निजी-सरकारी संस्थानों ने भी अपने यहां 60 साल कर लिया। पर इस लोकतंत्र में नियम केवल नियम हुआ करते हैं, पालन करने योग्य नहीं हुआ करते। कई निजी कंपनियों में तो लोग 44 या 55 की उम्र में ही रिटायर कर दिए जाते हैं। ऐसा ही एक मुकदमा बनारस में चल रहा है।

आइए, ‘विदाई’ के मर्म को समझें

[caption id="attachment_15668" align="alignleft"]हिंदुस्तान के आज के अंक में मृणाल पांडे के स्तंभ के आखिर में प्रकाशित सूचनाहिंदुस्तान के आज के अंक में मृणाल पांडे के स्तंभ के आखिर में प्रकाशित सूचना[/caption]हिंदुस्तान का आज का अंक और ‘विदाई’ के तीन संदेश : हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण का आज का अंक कई मायनों में ऐतिहासिक है। पूरे अखबार को गंभीरता से देखने पर तीन पन्नों पर एक चीज कामन नजर आती है। वह है- विदाई। पहले पन्ने पर लीड खबर की हेडिंग है : ‘आडवाणी-राजनाथ की विदाई तय‘। पेज नंबर तीन देखकर पता चलता है कि एचटी मीडिया और बिड़ला ग्रुप के पुरोधा केके बिड़ला आज के ही दिन इस दुनिया से विदा हो गए थे। एचटी ग्रुप ने उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दी है। एडिट पेज देख पता चलता है कि हिंदुस्तान की प्रमुख संपादक मृणाल पांडे इस अखबार से विदा ले रही हैं।

दिल्ली का एक दिन का स्थानीय संपादक

[caption id="attachment_14749" align="alignleft"]प्रिंटलाइन23 अप्रैल 2009 की दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली की प्रिंटलाइन में स्थानीय संपादक के रूप में दिनेश जुयाल का नाम[/caption]दिल्ली ने बहुतों को बनते-बिगड़ते-उजड़ते-बसते देखा है। ‘कुर्सी मद’ में चूर रहने वालों की कुर्सी खिसकने पर उनके दर-दर भटकने के किस्से और दो जून की रोजी-रोटी के लिए परेशान लोगों द्वारा वक्त बदलने पर दुनिया को रोटी बांटने के चर्चे इसी दिल्ली में असल में घटित होते रहे हैं। दिल्ली के दिल में जो बस जाए, उसे दिल्ली बसा देती है। दिल्ली की नजरों से जो गिर जाए, दिल्ली उसे भगा देती है। दिल्ली में स्थायित्व नहीं है। दिल्ली में राज भोगने के मौके किसी के लिए एक दिन के हैं तो किसी [caption id="attachment_14750" align="alignright"]प्रिंटलाइन24 अप्रैल 2009 की दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली की प्रिंटलाइन में स्थानीय संपादक के रूप में प्रमोद जोशी का नाम[/caption]के लिए सौ बरस तक हैं, बस, दिल्ली को जो सूट कर जाए। पर यहां बात हम राजे-महाराजाओं या नेताओं की नहीं करने जा रहे। बात करने जा रहे हैं हिंदी पत्रकारिता की। क्या ऐसा हो सकता है कि दिल्ली से दूर किसी संस्करण के स्थानीय संपादक का नाम उसी अखबार के राष्ट्रीय राजधानी के एडिशन में बतौर स्थानीय संपादक सिर्फ एक दिन के लिए छप जाए? ऐसा मजेदार वाकया हुआ है और यह हुआ है वाकयों के लिए मशहूर दैनिक हिंदुस्तान में। जी हां, दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली का 23 अप्रैल 2009 का अंक देखिए। इसके अंतिम पेज पर बिलकुल नीचे प्रिंटलाइन पर जाइए। इसमें स्थानीय संपादक का नाम प्रमोद जोशी नहीं लिखा मिलेगा। वहां नाम लिखा मिलेगा दिनेश जुयाल का। दिनेश जुयाल भी दैनिक हिंदुस्तान में हैं और स्थानीय संपादक हैं, लेकिन वे दिल्ली के नहीं बल्कि देहरादून संस्करण के स्थानीय संपादक हैं। 23 अप्रैल को जिन पत्रकारों की निगाह प्रिंटलाइन पर पड़ी, वे सभी चौंके थे।