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भोपाल त्रासदी, पत्र, फंड और टाटा

शशि शेखररतन टाटा टेप मामले में सुप्रीम कोर्ट चले गए हैं. नीरा राडिया फोन-टैप लीक मामले में. अब तक देश की जनता इन्हें ईमानदार मानती रही है. लेकिन इनकी एक कहानी और भी है जिससे इनकी ईमानदारी, नीयत पर शक होता है. हम भारतीयों की आदत है. पैसे वालों का लाख गुनाह हमें दिखता नहीं. और गुनहगार रतन टाटा जैसा आदमी हो तो बिल्कुल भी नहीं.

शशि शेखररतन टाटा टेप मामले में सुप्रीम कोर्ट चले गए हैं. नीरा राडिया फोन-टैप लीक मामले में. अब तक देश की जनता इन्हें ईमानदार मानती रही है. लेकिन इनकी एक कहानी और भी है जिससे इनकी ईमानदारी, नीयत पर शक होता है. हम भारतीयों की आदत है. पैसे वालों का लाख गुनाह हमें दिखता नहीं. और गुनहगार रतन टाटा जैसा आदमी हो तो बिल्कुल भी नहीं.

टेप कांड में फंसे टाटा की एक और कहानी आप सुनिए. मीडिया में इसकी चर्चा जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं हुई है. ये कहानी है टाटा के उन पत्रों की जो उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखे थे. भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े डाओ के मामले में. रतन टाटा आज से 4 साल पहले एक पत्र मनमोहन सिंह, तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को भेजते है. इस सुझाव के साथ कि भोपाल गैस कांड से प्रभावित स्थल के साफ-सफाई के लिए 100 करोड रूपये का एक फंड या ट्रस्ट टाटा कंपनी और अन्य भारतीय उद्योगपति मिल-जुल कर तैयार कर सकते है.

टाटा का तर्क था कि चूंकि डाओ केमिकल्स एक बहुत बडी कंपनी है और वह भारत में बहुत बड़े पैमाने पर निवेश करना चाहती है इसलिए डाओ को 100 करोड रूपये जमा कराने की जवाबदेयता से मुक्त किया जाना चाहिए. गौरतलब है कि रतन टाटा के द्वारा उक्त पत्र लिखे जाने तक भी डाओ के 100 करोड रुपये देने का मामला अदालत में विचाराधीन था. अदालत में इस बात का तय होना बाकी था कि रुपया जमा कराने के लिए डाओ बाध्य है या नहीं. जाहिर है, रतन टाटा के इस प्रस्ताव के पीछे डाओ को 100 करोड रूपया जमा कराने की जवाबदेही से मुक्त कर देने की मंशा ही काम कर रही थी.

ध्यान देने की बात है कि जब रतन टाटा ने उक्त पत्र लिखे थे तब वो इंडो-यूएस सीईओ फोरम के को चेयर मैन भी थे. मतलब साफ़ है की वो यह काम कहीं न कहीं अमरीकी दबाव में भी कर रहे थे. टाटा के उक्त सुझाव के पीछे जो तर्क दिया है, उससे भी यह साबित होता है कि इन उद्योगपतियों के दिलो दिमाग पर पैसा किस कदर हावी है. जाहिर है, अभी का टेप कांड भी अपने-आप में कई कहानी को छुपाए हुए है जिसका सार्वजनिक होना नितांत आवश्यक है. ताकि मुखौटे पर मुखौटा चढ़ाए रतन टाटा जैसे लोगो की कहानी आम आदमी को पता लग सकें. उस आम आदमी को जो नैनो खरीद कर टाटा जैसों का बैंक बैलेंस बढाता है.

लेखक शशि शेखर पत्रकार एवं ब्‍लागर हैं. फिलहाल वे साप्‍ताहिक चौथी दुनिया में सीनियर करस्‍पांडेंट हैं. यह लेख उनके ब्‍लाग चायदुकान से साभार लिया गया है.

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