: एडिटर्स गिल्ड अध्यक्ष पर लगा आरोपी पत्रकारों के खिलाफ नरम रूख अपनाने का आरोप : एडिटर्स गिल्ड की बैठक में अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई उस समय मुश्किल में आ गए जब उन्होंने पत्रकारिता के सिद्धांतों की बात की. इसके बाद प्रेस क्लब का माहौल गरम हो गया. दोनों तरफ से तर्क-वितर्क किए गए. कई सवाल उठाए गए. इसके बाद पत्रकारिता की आचार संहिता पर बहस छिड़ गई. प्रेस क्लब के खचाखच भरे हाल में राजदीप में कहा कि भारत की दो पत्रिकाएं नीरा राडिया तथा पत्रकारों के बातचीत को प्रकाशित करके पत्रकारीय मानक का उल्लंघन किया है, सिद्धांतों को तोड़ा है.
राजदीप ने कहा कि नीरा राडिया कांड में फंसे पत्रकारों से पेशेवर भूल हुई है और उन्होंने कोई पेशेवर गलती नहीं की है. इस मामले में दोनों पत्रिकाओं द्वारा उनका पक्ष न लिया जाना बेहद खराब पत्रकारिता की निशानी है. इससे उन्हें सदमा पहुंचा है. राजदीप के इतना कहने के साथ ही पत्रकार भड़क उठे. उनसे सवाल जवाब किए जाने लगे. मेल टुडे की पूर्णिमा जोशी ने सरदेसाई का ब्यान सुनने के बाद कहा, “मुझे यह जानकर बहुत दुख हो रहा है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष उन पत्रकारों का बचाव कर रहे हैं, उनको सही ठहरा रहे हैं, जो एक व्यापारिक घराने का संदेश दूसरे व्यापारिक घराने तक पहुँचा रहे हैं. बल्कि अध्यक्ष कॉरपोरेट कंपनियों के संदेश कांग्रेस तक पहुंचाने वालों का साथ दे रहे हैं. आप को राजनैतिक जानकारी के लिए नीरा राडिया से खबर लेने की ज़रूरत है, आप करुणानिधि से सीधे क्यों नहीं पूछते हैं.”
इसके बाद राजदीप सरदेसाई ने फौरन सफाई दी कि उनके कहने का यह मतलब नहीं था. वहां मौजूद कई पत्रकारों ने राजदीप पर इस मामले में नरम रुख़ अपनाने का आरोप लगाया. इस पर उन्होंने कहा कि वो किसी भी तरह उन पत्रकारों का बचाव नहीं कर रहे हैं. तब कई पत्रकारों ने सवाल किया कि अगर किसी नेता के ख़िलाफ़ ख़बर छापते समय उनका पक्ष रखने की परवाह नहीं की जाती, तो पत्रकारों के लिए एसी उम्मीद क्यों की जा रही है.
आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने सरदेसाई को सीधा जवाब देते हुए कहा कि बोफोर्स और वाटरगेट जैसे मुद्दों पर भी लोगों की प्रतिक्रिया नहीं ली गई क्योंकि बुनियादी जानकारी में ही पक्के सबूत मिल गए. उन्होंने कहा कि पत्रकारों को भी इस बात की जानकारी होनी चाहिए और यह तर्क देना कि वह अपने सूत्रों से बात कर रहे थे, बिलकुल बकवास है. मेहता ने कहा, “अगर नीरा राडिया जानती थी कि उसके निर्देशों का पालन नहीं किया जाएगा, तो वह आखिर जानकारी क्यों दे रही थी.”
राज़दीप ने जब कहा कि पत्रकारों की हो रही आलोचना के बीच क्या आप गंभीरता से मानते हैं कि पत्रकारों के बीच हुई बातचीत से मनमोहन सिंह और करुणानिधि कैबिनेट निर्धारित करेंगे? तो पत्रिका में लेख लिखते वक़्त ये शक ज़ाहिर क्यों नहीं किया गया. विनोद मेहता ने इस आरोप से इनकार करते हुए कहा कि पत्रिका का अगला अंक पत्रकारों के जवाब पर आधारित है, जिनमें उनके पक्ष को रखा गया है.
राजदीप ने कहा कि कुछ पत्रकार ख़ासकर संपादक ख़ुद को पाक-साफ़ बताते हुए टीवी और अख़बार में जो आलोचना कर रहे हैं, वो मुझे सबसे ज़्यादा चौंकाती है जबकि उनमें से ज़्यादातर के पिछले काम को हम जानते हैं. ये सड़न पिछले 20 साल में आई है. फाइनेंसशियल टाइम्स के सुनील जैन ने कहा कि आचार संहिता और सिद्धांतों की बात करने की जगह ऐसे पत्रकारों को बेनकाब किया जाना चाहिए और उनकी खिल्ली उड़ाई जानी चाहिए, ना कि उनका बचाव किया जाना चाहिए. कुछ पत्रकारों ने मीडिया हाउसों के मालिक बन चुके पत्रकारों को संपत्ति घोषित कराने की भी मांग की. उनका कहना था आखिर ये पत्रकार किस आय से मीडिया हाउसों के मालिक बन गए.
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने हाल के दिनों में मीडिया हाउस के नियमों पर सवाल उठाया और कहा कि कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम की वजह से आज के रिपोर्टर जबरदस्त दबाव में रहते हैं. असल समस्या पत्रकारों की नौकरी को लेकर है. कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम पत्रकारों के लिए बनाए गए वर्किंग जर्नलिस्ट ऐक्ट का उल्लंघन है. प्रसार भारती की अध्यक्ष मृणाल पांडे ने कहा कि असल समस्या मीडिया के मालिकाना हक़ को लेकर है. मीडिया घराने के मालिक ही संपादक बनने लगे है. मालिक जब बाज़ार से पैसा उठाते हैं, तो उनकी जवाबदेही पाठक के प्रति होगी या शेयर धारकों के प्रति?












antra tiwari
December 4, 2010 at 10:01 am
yah jaankar aaschary hua ki patrakarita ki nayi pidhi ke aadarsh rajdeep sardesai ne chand patrakaro ko bachane ke liye aisa kiya. kam se kam unse to aisi ummeed to nahi thi.
madan kumar tiwary
December 4, 2010 at 3:47 pm
राजदीप राज्यसभा कब जा रहो हो। समझ गये न मेरा इशारा । तुम्हारा नाम भी बिहार में मीडिया को नीतीश के पक्ष में मैनेज करने से जुडा है। मैं इंतजार कर रहा हूं । राज्यसभा के लिये उम्मीदवारी दर्ज कि नही की मैं जंग छेड दुंगा । गंभीरता का आवरण और अग्रेंजी का रौब मेरे उपर नही चलता । किसी को नही बख्शता हूं। कभी myspace, facebook पर tiwarygaya के नाम से तलाश कर के पढ लेना । और मेरे ब्लाग http://www.madantiwary.blogspot.com पर देखना गैस विवाद में किस महानुभाव के बारे में लिखा है। एक बात है , निरा को मैं धन्यवाद देता हूं । कम से कम तुमलोग जैसे लोगो का असली चेहरा और तिकडम बाजी से परिचय कराया ।
Rupesh
December 4, 2010 at 4:17 pm
Rajdeep Sardesai ne Radiagate patrakaron ko bachaane ki jurrat to ki hi, usse bhi ghinouni harkat ki, jis waqt Parliament me sansad-sadasyon ko ek crore rupaye cash rishwat dene ki khabar yeh kah kar dabaa diya ki wo use jaanchenge-parkhenge tab dikhayenge. Baad me dikhaya bhi to adhkachre tarike se.
Jis desh me Parliament ki mez par sansad-sadasya ek crore cash laakar rakh den aur phir bhi sarkar koi karvayi na kare, us sarkar se Radiagate ya Tatagate maamle me koi bhi karrwayi ki ummid karna bekaar hai. Hamaam me sab nange hain.
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December 4, 2010 at 5:28 pm
सब दलाल हैं यार, किसे सही माना जाये, जिन्हें हम आदर्श मानते थे वे एसे निकलेंगे हमने तो सोचा भी न था..
vishal
December 4, 2010 at 5:45 pm
Yahi hai asli ”CORPORATE JOURNALISM”…
Gaurav Yadav
December 4, 2010 at 7:12 pm
Et thi Neera………..Jisne na jaane kitnon ko di peera…..Jab hue sab benaqab……Tab chale janta ke teera…!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
To Bhaiya, Ram chand keh gaye Siya se, aisa kalyug aayega…………….Aage mujhe bataane ki zaroorat nahi hai….!!!!!!!!!!!!!
bab
December 5, 2010 at 6:35 am
sab kutte hai anil or tata jese logo k. nera ke hath se khana khate the.
surender singh
December 5, 2010 at 11:46 am
kuldeep nayer ji…………..you are always right sir…….and sardesai ji chor ki dadhi mein tinka dikh raha hein …..kyonki patarkarita ko badnam karne walo ka kad chahe jitna ho………unko har hal mein expose kiya jana chahiye ……….pata nahi aap kyon taras kha rahe he ………waise apka pura group both sided version wali story chalaye……..pahle ye sunishchit kare…………
vinay Kumar
December 9, 2010 at 11:13 am
Those who r framing Barkha, Vir and Chawala in Radia case is victim of inferiority complex… Barkha, Vir and Chawla have proved himself..those who r putting fingers on them have no takers….They known due to their journalistic brilliance…so just bang on positivism.