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मीडिया का अंडरवर्ल्ड : लाबीइंग, दलाली, ब्लैकमेलिंग

आनंद प्रधाननीरा राडिया टेप्स ने न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड से पर्दा उठा दिया है. अभी तक यह अंडरवर्ल्ड अख़बारों और चैनलों के समाचार कक्षों और प्रेस क्लबों में व्यक्तिगत बातचीत, कानाफूसियों और गासिप तक सीमित था. कई वेबसाइटों पत्रिकाओं को धन्यवाद देना जरूरी है जिनकी हिम्मत के कारण न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड के एक हिस्से की कारगुजारियां सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा बन गई हैं. इन टेप्स से समाचार माध्यमों और उनके उंचे पदों पर बैठे पत्रकारों के सत्ता और कारपोरेट समूहों के दलालों के साथ निरंतर घनिष्ठ होते संबंधों और उनके लेखन और रिपोर्टिंग पर पीआर और लाबीइंग के बढ़ते प्रभावों की निर्णायक रूप से पुष्टि होती है.

आनंद प्रधाननीरा राडिया टेप्स ने न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड से पर्दा उठा दिया है. अभी तक यह अंडरवर्ल्ड अख़बारों और चैनलों के समाचार कक्षों और प्रेस क्लबों में व्यक्तिगत बातचीत, कानाफूसियों और गासिप तक सीमित था. कई वेबसाइटों पत्रिकाओं को धन्यवाद देना जरूरी है जिनकी हिम्मत के कारण न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड के एक हिस्से की कारगुजारियां सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा बन गई हैं. इन टेप्स से समाचार माध्यमों और उनके उंचे पदों पर बैठे पत्रकारों के सत्ता और कारपोरेट समूहों के दलालों के साथ निरंतर घनिष्ठ होते संबंधों और उनके लेखन और रिपोर्टिंग पर पीआर और लाबीइंग के बढ़ते प्रभावों की निर्णायक रूप से पुष्टि होती है.

यह कई कारणों से चिंताजनक है. असल में, इन टेप्स में कई बड़े कारपोरेट समूहों के लिए सत्ता के गलियारों में लाबीइंग करनेवाली नीरा राडिया अंग्रेजी मीडिया के कई जाने-माने चेहरों और वरिष्ठ पत्रकारों से जिस अंतरंगता और अधिकार के साथ बातें करती हुई सुनाई देती हैं, उसके कंटेंट में ऐसा बहुत कुछ है जो एक पत्रकार और उसके समाचार स्रोत के बीच की बातचीत के दायरे से बाहर चला जाता है. निश्चय ही, एक पत्रकार को समाचार संग्रह और रिपोर्टिंग के लिए बहुत तरह के स्रोतों से बातचीत करनी पड़ती है और करनी चाहिए. उनमें पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के अधिकारी भी हो सकते हैं लेकिन ऐसी किसी भी बातचीत की कुछ सीमाएं भी हैं.

अफसोस की बात है कि नीरा राडिया के साथ बातचीत में कई पत्रकार, एक पत्रकार की स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका छोड़कर लाबीइंग कंपनी के एजेंट की तरह व्यवहार करते हुए दिखाई देते हैं. बातचीत से ऐसे संकेत मिलते हैं कि इनमें से कुछ पत्रकार सत्ता की दलाली में शामिल हैं. साफ है कि ऐसा करते हुए वे अपनी भूमिकाओं से समझौता करते हुए दिखाई देते हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि उनकी रिपोर्टिंग और लेखन भी इस सबसे परोक्ष –अपरोक्ष जरूर प्रभावित होती होगी.

असल में, हाल के वर्षों में न सिर्फ खबरों की खरीद-फरोख्त यानी पेड न्यूज के रूप में बल्कि बड़े देशी-विदेशी कारपोरेट समूहों, पार्टियों, मंत्रियों-नेताओं और सरकार के लिए पी.आर और लाबीइंग करनेवाली कंपनियों की घुसपैठ समाचार कक्षों में बहुत ज्यादा बढ़ गई है. यह चिंता की बात इसलिए है कि पी.आर और लाबीइंग कंपनियों के प्रभाव से न सिर्फ खबरों की स्वतंत्रता, तथ्यात्मकता और निष्पक्षता प्रभावित होती है बल्कि खबरों का पूरा एजेंडा बदल जाता है. पी.आर और लाबीइंग कंपनियों को खबरों में अपने क्लाइंट के हितों के मुताबिक तोड़-मरोड़ करने, मनमाफिक खबरें प्लांट करने और नकारात्मक खबरों को रुकवाने के लिए जाना जाता है. यही कारण है कि समाचार मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संपादकों की एक जिम्मेदारी पी.आर और लाबीइंग कंपनियों और उनके मैनेजरों को समाचार कक्ष से दूर रखने की भी रही है.

लेकिन जब संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ही पी.आर और लाबीइंग कंपनियों से प्रभावित और उनके लिए काम करने लगें तो अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि इन कंपनियों ने किस हद तक समाचार कक्षों का टेकओवर कर लिया है. नीरा राडिया प्रकरण इसी टेकओवर का सबूत है. लेकिन यह केवल अंग्रेजी मीडिया और कुछ जाने-पहचाने पत्रकारों तक सीमित नहीं हैं. हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओँ का मीडिया भी दूध का धुला नहीं है. सच यह है कि हिंदी न्यूज मीडिया में भी सत्ता और बड़ी पूंजी की दलाली पर खड़े मीडिया के अंडरवर्ल्ड का पिछले तीन दशकों खासकर उदारीकरण के बाद काफी तेजी से विस्तार हुआ है. हिंदी मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड में चुनिन्दा संपादकों, वरिष्ठ पत्रकारों और रिपोर्टरों के अलावा उनके मालिकान भी शामिल हैं.

इस अंडरवर्ल्ड की बढ़ती ताकत और प्रभाव का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उसकी सीधी पहुंच हिंदी क्षेत्रों के केन्द्रीय मंत्रियों, अन्य प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, बड़े अफसरों और नेताओं के अन्तःकक्षों तक है. हिंदी भाषी किसी भी राज्य में चले जाइये, मुख्यमंत्रियों के किचन कैबिनेट में आपको चुनिन्दा मंत्रियों, नेताओं, अफसरों, उद्योगपतियों, पावर ब्रोकर्स के अलावा कुछ संपादक और पत्रकार और भी मिल जाएंगे. हालांकि कुछ हद तक उत्तर प्रदेश में मायावती इसकी अपवाद हैं लेकिन उनकी जगह सत्ता के दूसरे सबसे ताकतवर केन्द्रों- सतीश मिश्र और कैबिनेट सचिव शशांक शेखर की किचन कबिनेट में चुनिन्दा संपादक-पत्रकार मौजूद हैं.

वास्तव में, यही किचन कैबिनेट राज्यों में राजकाज चला रही है. इसी किचन कैबिनेट में बड़े सौदों के लिए डील पक्की होती है. ठेके तय होते हैं. ट्रांसफर-पोस्टिंग का धंधा चलता है. लेकिन यहां तक पहुंच आसान नहीं है. कई मामलों में सौदे या डील पक्की करने के लिए इस किचन कैबिनेट तक पहुंचने के वास्ते उद्योगपति, कारोबारी, ठेकेदार और अफसर इस कैबिनेट के सदस्य संपादक-पत्रकारों को भी जरिया बनाते हैं. वे खुशी-खुशी जरिया बन भी रहे हैं. सौदे करा रहे हैं और उसकी मलाई भी काट रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि ऐसे संपादकों और पत्रकारों का सबसे पहले इस्तेमाल उनके मीडिया समूहों के मालिकान अपने दूसरे उद्योग धंधों और कारोबारों के लिए लाइसेंस, परमिट और कोटा लेने के अलावा अन्य तमाम वैध-अवैध कामों के लिए करते हैं.

हालात इतने खराब हैं कि कई अखबार और चैनल तो अपने संपादकों और रिपोर्टरों को मंत्रियों, अफसरों और व्यापारियों/ठेकेदारों के भयादोहन के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं. यही नहीं, हिंदी के कई बड़े अखबार समूहों और छोटे क्षेत्रीय चैनलों में संपादक या ब्यूरो चीफ या चीफ रिपोर्टर आदि बनने के लिए प्रोफेशनल काबिलियत से अधिक आपकी केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और बड़े अफसरों तक पहुंच और उनसे खबर निकालने की नहीं बल्कि काम करा पाने की आपकी क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण और जरूरी हो गई है. जैसे ही आप हिंदी के कई बड़े अख़बारों में स्थानीय संपादक/ब्यूरो चीफ/चीफ रिपोर्टर के पदों पर बैठे कई लोगों का अतीत और वर्तमान टटोलेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर उनकी दलाली की कहानियां सामने आने लगेंगी.

आश्चर्य नहीं कि अधिकांश हिंदी भाषी राज्यों में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बड़े-छोटे अखबार या क्षेत्रीय चैनल राज्य सरकारों के प्रति बहुत नरम रूख रखते हैं और मुख्यमंत्रियों के गुणगान में लगे रहते हैं. ऐसा लगता है कि जैसे इन राज्यों में रामराज्य आ गया हो. हिंदी मीडिया के इस अंडरवर्ल्ड ने हिंदी न्यूज मीडिया के जनहित के मुद्दों पर तीखे तेवर, भ्रष्टाचार-अनियमितताओं के भंडाफोड और सरकार के प्रति आलोचनात्मक आवाज़ को कमजोर और खामोश कर दिया है.

लेखक आनंद प्रधान इन दिनों देश के प्रतिष्ठित पत्रकारिता शिक्षण संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) में हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम के निदेशक हैं. छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय आनंद बनारस हिंदी विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्रसंघ अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उनका वामपंथी विचारधारा से गहरा अनुराग है. अपने जीवन और करियर में जनपक्षधरता का झंडा हमेशा बुलंद रखने वाले आनंद प्रखर वक्ता और चिंतक भी हैं. देश के सभी बड़े अखबारो-पत्रिकाओं में सामयिक मुद्दों पर गहरी अंतदृष्टि के साथ लगातार लिखने वाले आनंद का यह आलेख उनके शिष्यों के ब्लाग ‘तीसरा रास्ता’ से साभार लिया गया है. उनका यह लिखा सर्वप्रथम आउटलुक मैग्जीन में प्रकाशित हुआ. आनंद प्रधान से संपर्क करने के लिए [email protected] का सहारा ले सकते हैं.

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0 Comments

  1. Tushar

    December 8, 2010 at 3:08 pm

    kripya Banaras Hindu University ki spelling sudhar de….:)

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