‘वॉच डॉग’ की भूमिका का निर्वाह करने वाला मीडिया भला ‘खतरनाक’ कैसे हो सकता है? निष्ठापूर्वक अपने इन कर्तव्य का पालन-अनुसरण करने वाले मीडिया को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने खतरनाक प्रवृत्ति निरूपित कर वस्तुत: लोकतंत्र के इस चौथे पाये की भूमिका और कर्तव्य निष्ठा को कटघरे में खड़ा किया है। वैसे बिरादरी से त्वरित प्रतिक्रिया यह आई है कि चव्हाण की टिप्पणी ही वस्तुत: लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का आग्रही है। मुख्यमंत्री चव्हाण ने मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटाले के संदर्भ में ऐसी विवादास्पद टिप्पणी की।
चव्हाण के अनुसार ‘मीडिया ट्रायल’ के कारण ही तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण परेशानी में पड़े। यहां तक तो ठीक है। किन्तु इसमें ‘खतरनाक’ क्या है। मीडिया ने आदर्श सोसाइटी घोटाले का पर्दाफाश कर अपने कर्तव्य का ही तो निष्पादन किया। लोकतंत्र में ऐसे ही ‘प्रहरी’ की भूमिका मीडिया से अपेक्षित है। घोटालों-घपलों में अंतर्लिप्तता के कारण अगर कोई मुख्यमंत्री हटता है या हटाया जाता है, तो इसके लिए मीडिया को पुरस्कृत किये जाने की जगह उसे ‘खतरनाक’ बताना अनुचित है। मीडिया ने कोई राजनीति नहीं की बल्कि नियम-कानूनों को धता बता, कारगिल के शहीदों-पीडि़त परिवारों के हक पर सामर्थ्यवानों द्वारा डाका डाले जाने की बात को सार्वजनिक किया। राजनीति तो राजनीतिक कर रहे हैं। अशोक चव्हाण ने एक और पूर्व मंत्री पर आरोप जड़ दिया कि उन्हें हटाने के लिए आदर्श के नाम की सुपारी दी गई थी। राजनीतिक राजनीति करें अपनी बला से, हमारी आपत्ति मीडिया की कर्तव्य-परायणता को खतरनाक निरूपित किये जाने पर है।
मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण सहित सभी राजनीतिक क्या इस बात से इन्कार करेंगे कि यह मीडिया ही है जो सरकार के स्तर पर हो रहे ऐसे बड़े घोटालों का पर्दाफाश कर लोकतंत्र की अपेक्षा की पूर्ति कर रहा है? मामला चाहे 50 के दशक का सिराजुद्दीन कांड हो या 70 के दशक का पांडिचेरी लाइसेंस घोटाला हो, 80 के दशक का बोफोर्स-फेयर फैक्स कांड हो, 90 के दशक का सांसद रिश्वत कांड हो, बिहार का चारा घोटाला कांड हो, या फिर ताजातरीन 2-जी स्पेक्ट्रम का घोटाला हो। इन सभी पापों को अनावृत किया तो मीडिया ने ही।
संसद हो या राज्य विधानसभाएं, सांसदों-विधायकों के लिए मुद्दे मीडिया ही देता आया है- लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी के रूप में। फिर इसे कटघरे में कैसे खड़ा किया गया? जिस संदर्भ में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने ऐसी टिप्पणी की है वह अत्यंत ही गंभीर है। आदर्श सोसाइटी घोटाला कांड के सिलसिलें में केंद्रीय जांच ब्यूरो नेताओं-अधिकारियों के नाम के साथ प्राथमिकी दर्ज कराने की तैयारी में है। जो तथ्य उभर कर सामने आए हैं, उनसे यह स्पष्ट है कि नेताओं-अधिकारियों ने अपनी पूर्ण जानकारी में नियम-कानून की धज्जियां उडऩे दीं। फ्लैटों के वास्तविक हकदार युद्ध पीडि़तों-विधवाओं के हक पर डाका डाला गया है। इस अपराध को सार्वजनिक करने वाले मीडिया को तो पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
लगता है मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण या तो विषय को समझ न पाये या फिर उन्हें गलत तथ्य उपलब्ध करवाये गये। अपनी कुशल प्रशासकीय क्षमता के लिए मशहूर मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण केंद्र में अनेक जटिल शासकीय समस्याओं को सुलझाने में सफल रहे हैं। आदर्श सोसाइटी घोटाला तो हर दृष्टि से शासकीय अकर्मण्यता व साजिश का ज्वलंत उदाहरण है। अपने साथी अशोक चव्हाण का दुख अगर उन्हें साल रहा है तो उसकी भरपाई राजनीतिक स्तर पर हो सकती है- मीडिया ट्रायल को खतरनाक निरूपित कर कदापि नहीं।
लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं. प्रभात खबर अखबार के संस्थापक संपादक रहे हैं. दर्जनों अखबारों-चैनलों में संपादक रहने के बाद इन दिनों खुद का हिंदी विचार दैनिक ‘1857’ का प्रकाशन नागपुर से कर रहे हैं.












vineet kumar (9936809770)
December 14, 2010 at 10:55 am
vastav main media rajnitigyano ka hato ki kathputli ban gayi hai.Is karan nataa hamaa kuch kah de rahi hain.>:(