: न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा : पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैर-लोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी मानती है कि बिनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।
जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकीलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है। पिछले साल नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा था। पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम जैसे बड़े घोटाले क्या देशद्रोह नहीं थे, जो उनसे जुड़े सफेदपोशों को बचाने की हर संभव मदद सरकार कर रही है।
बिनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है, जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य, जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था, को खंडित किया जा रहा है, यह पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को फासीवादी व्यवस्था में तब्दील करने की साजिश है।
छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून, जिसके तहत बिनायक सेन को देशद्रोही कहा गया, वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। बिनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे, बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा. सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’ पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।
हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि देश में हो रही आतंकी घटनाओं के लिए न्यायालय भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जिनसे न्याय न मिलने की हताशा से कुछ लोग आतंकवाद के प्रति अग्रसर हो रहे हैं। क्या न्यायपालिका बार-बार आंतकी संगठनों की इस बात, कि वह बाबरी विध्वंस, 2002 गुजरात दंगा या फिर अयोध्या फैसले से आहत होकर ऐसा कर रहे हैं, के सवाल को हल करने की कोशिश की। क्योंकि यह सवाल उसके न्याय के समीकरण से जुड़ा है, जो फासीवादी ताकतों को मजबूत कर रहा है। तो वहीं नक्सलवाद जो खुद को एक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन कहता है, को जनता लोकतंत्र में न्याय न मिलने की वजह से एक नई व्यवस्था के रुप में अपना रही है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिम्मेदार न्यायपालिका ही है। जो अपने नागरिकों को उनके जीवन से जुडे़ मौलिक अधिकारों को भी नहीं दिलवा पा रही है।
ऐसे में हम इस बात को कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं, उनकी अवमानना करने का पूरा अधिकार लोकतांत्रिक जनता को है। क्योंकि विनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे।
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी की तरफ से राजीव यादव द्वारा जारी.












विनीत
December 27, 2010 at 11:08 am
अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता और मानवाधिकारों कि आड़ में देश में अघोषित गृह युद्ध छेड़ने वाले मओवादियो कि वकालत कौन सी समाज या देशसेवा है. माओवादियों के हमलों में शहीद हुए लोग आपकी नज़र में शायद मानव नहीं ,या देश के बाकी वंचितों तबके और प्रदेशो के लोगो को भी हथियार उठा लेने चाहिए अपने अधिकारों के लिए.
रही बात न्याय् पालिका या लोकतंत्र के दोष की तो यकी जानिए सभी भारत विरोधी तत्वों कि चहेती और खबरों में अपने को बनाये रखने के लिए तडपती अरुंधती समेत उन सब लोगो को माओ के देश चीन भेज देना चाहिए ,जहाँ ऐसी बे-अंदाज़ जुबां को उसकी औकात बताने के लिए ऐसे सख्त कानून है कि उनको अपना लुंज पुंज कानून-व्यवस्था वाला लोकतंत्र सारे जहाँ से अच्छा लगने लगता..
भ्रष्टाचार और अव्यवस्था की मार का असर सभी देशवासी झेलते है,, व्यवस्था को बदलने के सकारात्मक प्रयास करे तो बेहतर होगा…और माओवादियों को मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें पटरी पर लाने का प्रयास कर उनके प्रति देशवासियो में भर रही नफरत को कम करने का प्रयास करे तो ज्यादा रचनात्मक होगा
विनीत
लखनऊ
turbasu
December 27, 2010 at 11:28 am
judiciri bhi to esi tathakathit loktantra ka ang hen….
ram kumar
December 28, 2010 at 2:46 am
lekh tathya heen hai aur nyayalay ki awmanana kar raha hai.. shahbano ke liye aawaj kyon nai utthate..