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जागरण के इंचार्ज को कुछ ज्‍यादा ही बड़ा ‘डग्‍गा’ मिल गया क्‍या!

दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में नये साल के पहले दिन यानी 01 जनवरी, 2011 के अंक के पृष्ठ संख्या चार के पहले कालम ‘एक नजर’ के अन्तर्गत प्रकाशित संक्षिप्त खबरों में ‘प्रतियोगिता’ व ‘पुरस्कार’ शीर्षक से प्रकाशित दोनों खबरें एक ही हैं। यह खबर दो बार क्यों लगायी गयी, क्या जागरण के पास खबरों का अकाल हो गया है अथवा इस पेज के इंचार्ज को कुछ ज्यादा ही बड़ा ‘डग्गा’ मिल गया है।

दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में नये साल के पहले दिन यानी 01 जनवरी, 2011 के अंक के पृष्ठ संख्या चार के पहले कालम ‘एक नजर’ के अन्तर्गत प्रकाशित संक्षिप्त खबरों में ‘प्रतियोगिता’ व ‘पुरस्कार’ शीर्षक से प्रकाशित दोनों खबरें एक ही हैं। यह खबर दो बार क्यों लगायी गयी, क्या जागरण के पास खबरों का अकाल हो गया है अथवा इस पेज के इंचार्ज को कुछ ज्यादा ही बड़ा ‘डग्गा’ मिल गया है।

बताते चलें कि जिस स्कूल ने प्रथम पुरस्कार जीता है, उसके प्रबंधकों द्वारा नये वर्ष के शुभारम्भ के मौके पर तथा साल में अन्य अवसरों पर प्रिंट व इलेट्रॉनिक मीडिया के संपादकों, संपादकीय विभाग के लोकल डेस्क इंचार्जों व संबंधित रिपोर्टरों आदि को ‘गिफ्ट’ व अन्य कई प्रकार की सुविधाएं आदि देकर ‘उपकृत’ किया जाता है। लखनऊ के कई संपादकों की पत्नियां इस स्कूल में नौकरी कर रही हैं तथा कई संपादकों व पत्रकारों के बच्चे इस स्कूल में निशुल्क शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लखनऊ के मीडिया क्षेत्र में मिलने वाले किसी भी ‘उपहार’ को ‘डग्गा’ के नाम से जाना जाता है।

तो मैं बात कर रहा था उक्त खबर के रिपीट होने की, वह भी एक ही पेज पर आस ही पास। तो वही मुझे लगा कि कहीं इस पेज के इंचार्ज को अथवा लोकल डेस्क इंचार्ज को अथवा संपादक को इस बार नये साल में कोई बहुत बड़ा ‘डग्गा’ तो नहीं मिल गया है, जो उन्होंने यह खबर दो-दो बार लगवा दी। इतना ही नहीं बेवकूफी की हद तो तब हो गयी जब इस पांच लाइन की खबर में भी कई गल्तियां व विरोधाभास है। देखें:-

‘प्रतियोगिता’ शीर्षक वाली खबर में ‘सटी’ लिखा है जबकि ‘पुरस्कार’ शीर्षक वाली खबर में इसी शब्द को ‘सिटी’ लिखा गया है। ‘प्रतियोगिता’ वाली खबर में ‘मांटेसरी’ लिखा गया है जबकि ‘पुरस्कार’ शीर्षक वाली खबर में इसी शब्द को ‘मॉण्टेसरी’ लिखा गया है। ‘प्रतियोगिता’ में ‘जापलिंग’ और ‘पुरस्कार’ में ‘जॉपलिंग’, प्रतियोगिता में ‘रोड़’ और पुरस्कार में ‘रोड’ लिखा गया है। इतनी ही गल्तियां होतीं तब तो गनीमत थी, हद तो तब हो गयी जब जागरण ने ‘प्रतियोगिता’ शीर्षक वाली खबर में विजेता को ‘छात्रा’ तथा ‘पुरस्कार’ शीर्षक वाली खबर में ‘छात्र’ बता दिया।

हमारे कक्षा पांच में पढ़ने वाले बेटे ने मुझसे पूछा कि पापा इतने बड़े अखबार में इतनी बड़ी-बड़ी गल्तियां कैसे हो जाती हैं, क्या वहां कोई देखता नहीं है। अब हम उसे क्या बतायें कि ये ‘बनियों’ के अखबार हैं। ‘बनिया’ वह शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘बनिये’ सिर्फ और सिर्फ बनिये, दुनिया कहीं जाए अर्थात लाभ कमाइये और लाभ कमाने के लिये चाहे कुछ भी गलत-सलत करना पड़े उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इन अखबारों का उद्देश्य ‘व्यावसायिक’ है न कि ‘मिशनरी’।

मोहम्‍मद रेहान खान

[email protected]

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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0 Comments

  1. raj

    January 4, 2011 at 4:06 am

    wah. kya likha hai……………………………………………………

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