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डा. सेन की सजा के खिलाफ लखनऊ में कई संगठनों का प्रदर्शन

जसमछत्‍तीसगढ़ की निचली अदालत द्वारा विख्यात मानवाधिकारवादी व जनचिकित्सक डॉ. बिनायक सेन को दिये उम्रकैद की सजा के खिलाफ तथा उनकी रिहाई की माँग को लेकर जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से 2 जनवरी 2011 को लखनऊ के शहीद स्मारक पर विरोध प्रदर्शन व सभा का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, नागरिक अधिकार व जन आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने विनायक सेन की सजा पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह का फैसला हमारे बचे-खुचे जनतंत्र का गला घोटना है। यह नागरिक आजादी और लोकतंत्र पर हमला है। इसलिए बिनायक सेन की रिहाई का आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष है।

जसमछत्‍तीसगढ़ की निचली अदालत द्वारा विख्यात मानवाधिकारवादी व जनचिकित्सक डॉ. बिनायक सेन को दिये उम्रकैद की सजा के खिलाफ तथा उनकी रिहाई की माँग को लेकर जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से 2 जनवरी 2011 को लखनऊ के शहीद स्मारक पर विरोध प्रदर्शन व सभा का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, नागरिक अधिकार व जन आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने विनायक सेन की सजा पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह का फैसला हमारे बचे-खुचे जनतंत्र का गला घोटना है। यह नागरिक आजादी और लोकतंत्र पर हमला है। इसलिए बिनायक सेन की रिहाई का आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष है।

प्रदर्शनकारी लेखकों व कलाकारों के हाथों में प्ले कार्ड्स थे, जिनमें सीखचों में बन्द बिनायक सेन की तस्वारें थीं और उन पर लिखा था ‘कॉरपोरेट पूँजी का खेल, विनायक सेन को भेजे जेल’, ‘विनायक सेन को रिहा करो’ आदि। इस अवसर पर जन कलाकार परिषद के कलाकारों ने शंकर शैलेन्द्र का गीत ‘भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की, देशभ्क्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की’ और दुष्यन्त की गजल ‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए’ गाकर अपना विरोध जताया।

जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन के माध्यम से माँग की गई कि डा. बिनायक सेन को रिहा किया जाय, आपरेशन ग्रीन हंट व सलवा जुडूम को बन्द किया जाय। छत्‍तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून और इसी तरह के अन्य जन विरोधी कानूनों को खत्म किया जाय और इन्हीं कानूनों के तहत उम्रकैद की सजा पाये नारायण सन्याल और पीयूष गुहा को रिहा किया जाय।

इस विरोध प्रदर्शन में जनवादी लेखक संघ, एपवा, पीयूसीएल, इंकलाबी नौजवान सभा, अलग दुनिया, आइसा, दिशा, अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, आवाज आदि के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस मौके पर हुई विरोध सभा को रामजी राय, अजय सिंह, शिवमूर्ति, ताहिरा हसन, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, रमेश दीक्षित, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेश कुमार, केके पाण्डेय, भगवान स्वरूप कटियार, चन्द्रेश्वर, वंदना मिश्र, केके वत्स, कल्पना पाण्डेय, बीएन गौड़, सुरेश पंजम, आदियोग, बालमुकुन्द धूरिया, अनिल मिश्र ‘गुरूजी’, विमला किशोर, जानकी प्रसाद गौड़, केके शुक्ला, महेश आदि ने सम्बोधित किया। सभा का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

वक्ताओं ने कहा कि जिन कानूनों के आधार पर बिनायक सेन को सजा दी गई है, वे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं। इनमें कई कानून अंग्रेजों के बनाये हैं जिनका उद्देश्य ही आजादी जसमके आंदोलन को कुचलना था। आज उन्हीं कानूनों तथा छत्‍तीसगढ़ में लागू दमनकारी कानूनों का सहारा लेकर बिनायक सेन पर राजद्रोह व राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश का आरोप लगाया गया है और इसके आधार पर उन्हें सजा दी गई है। गौरतलब है कि अपने आरोपों के पक्ष में पुलिस द्वारा जो साक्ष्य पेश किये गये, वे गढ़े हुए थे और अपने आरोपों को सिद्ध कर पाने वह असफल रही है। अगर इन आरोपों को आधार बना दिया जाय तो लोकतांत्रिक विरोध की हर आवाज पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जा सकता है।

वक्ताओं ने इस बात पर गहरी चिन्ता व्यक्त की कि न्यायालयों के फैसले भी राजनीतिक होने लगे हैं। भोपाल गैस कांड और अयोध्या के सम्बन्ध में आये कोर्ट के फैसले ने न्यायपालिका के चेहरे का पर्दाफाश कर दिया है। बिनायक सेन के सम्बन्ध में आया फैसला नजीर बन सकता है, जिसके आधार पर विरोध की आवाज को दबाया जायेगा। अरूंधति राय पर भी इसी तरह की धाराएं लगाकर मुकदमा दर्ज किया गया है। इस प्रदेश में भी सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद को एक साल से जेल में बन्द रखा गया है।

वक्ताओं का कहना था कि जब भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज, माफिया व अपराधी सत्‍ता को सुशोभित कर रहे हों, वहाँ आदिवासियों, जनजातियों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने तथा सलवा जुडूम से लेकर सरकार के जनविरोधी कार्यों का विरोध करने वाले डॉ. सेन पर दमनकारी कानून का सहारा लेकर आजीवन कारावास की सजा देने का एकमात्र मकसद जनता के प्रतिरोध की आवाज को कुचल देना है। इसीलिए आज बिनायक सेन प्रतिरोध की संस्कृति और इंसाफ व लोकतंत्र की लड़ाई के प्रतीक बन गये हैं।

जसम के इस प्रदर्शन के माध्यम से यह घोषणा भी की गई कि डा. बिनायक सेन की रिहाई के लिए विभिन्न संगठनो को लेकर रिहाई समिति बनाई जायेगी तथा यह समिति विविध आंदोलनात्क कार्यक्रमों के द्वारा जनमत तैयार करेगी।

लखनऊ से कौशल किशोर की रिपोर्ट.

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0 Comments

  1. Jai Prakash Sharma

    January 4, 2011 at 1:07 pm

    डाॅ. बिनायक सेन जिन्होनें गरीब आदमी के लिए अपने जीवन के 30 वर्ष सेवा करने में लगाये हैं उस महापुरूष का त्याग व प्रयास सरकार के लिए राजद्रोह कैसे हो सकता है ?
    सरकार अपने भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए तरह-तरह के रास्ते निकाल लेती है। जन समर्थन लेकर सरकार बनाने वाले नेता आम आदमी के विश्वास का खून कर रहे हैं। क्या कानून सिर्फ नागरिकों के लिए होता है।
    अगर कानून है तो क्यों भ्रष्ट नेताओं को जमानत दी जाती है ?
    नेता अगर अपराध करते हैं तो तुरन्त उन्हे गिरफ्तार क्यों नही किया जाता ?
    क्या भ्रष्टाचार राजद्रोह से कम है ?

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