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आइए, सचिन को भारत रत्न बनाएं! (दो)

दिनेश चौधरीपाकिस्तान के साथ कोई मैच था। जावेद मियांदाद ने आखिरी गेंद में छक्का मार कर पाकिस्तान को जिता दिया। अगले दिन परम आदरणीय प्रभाष जी के अग्रलेख का शीर्षक था – ‘वे विजेता की तरह जीते, हम विजेता की तरह हारे।” इसी दौरान -शायद पाकिस्तान में ही- हॉकी की कोई प्रतियोगिता चल रही थी और भारतीय हॉकी टीम, कमोबेश इन्हीं परिस्थितियों में हालैण्ड से मैच हार गयी।

दिनेश चौधरीपाकिस्तान के साथ कोई मैच था। जावेद मियांदाद ने आखिरी गेंद में छक्का मार कर पाकिस्तान को जिता दिया। अगले दिन परम आदरणीय प्रभाष जी के अग्रलेख का शीर्षक था – ‘वे विजेता की तरह जीते, हम विजेता की तरह हारे।” इसी दौरान -शायद पाकिस्तान में ही- हॉकी की कोई प्रतियोगिता चल रही थी और भारतीय हॉकी टीम, कमोबेश इन्हीं परिस्थितियों में हालैण्ड से मैच हार गयी।

आदरणीय प्रभाष जी ने हॉकी टीम के बारे में लिखा कि ”ऐसी टीम जीत भी जाये तो उसे जीतने का कोई हक नहीं हैं क्योंकि …”

अब जरा इसी बात को समझा जाये कि हम क्रिकेट में हारकर भी क्यों जीत जाते हैं और बाकी खेलों में जीतकर भी क्यों हारते हैं? कुछ दिन पीछे चलें। क्रिकेट में फिक्सिंग को लेकर बवाल मचा था। टीआरपी की होड़ में पहले तो हमारे चैनल-वीरों ने कहा कि अब इस खेल से लोगों का भरोसा उठ गया है। बाद में आकाओं से डांट पड़ी होगी या समझ में आया होगा कि भले ही बालक लपंट है, पर है तो कमाउपूत। घर से निकाल दिया तो कमाई का क्या होगा? लिहाजा घूमा-फिराकर बताना शुरू किया कि कुछ लोगों के फिक्सिंग में शामिल होने से भला इस महान खेल की महानता कम कैसे हो जायेगी ? डैमेज कंट्रोल का एक लंबा सिलसिला इस मीडिया ने चलाया और लोगों के दिलों में जो थोड़ी-बहुत शंकायें आयी होंगी उन्हें धो-पोंछकर सुखा डाला।

क्रिकेट में हम हारकर भी इसलिये जीत जाते हैं कि हमें हारकर जीतने के पूरे अवसर इस बाजार द्वारा मुहैया कराये जाते हैं। जरा याद कीजिये पिछले विश्व-कप को। भारत और शायद पाकिस्तान भी पहले ही दौर में विश्व-कप की होड़ से बाहर हो गये थे। मामला यदि हॉकी का होता तो हमारे चैनल और अखबार कह देते कि हॉकी की मौत हो चुकी है। इन्होंने एक बार नहीं कई बार लिखा कि हॉकी की मौत हो गयी और सचमुच ही इस खेल को मौत की कगार पर पहुंचा दिया। लेकिन जब क्रिकेट में बहुत बुरी भी हार हो तो भावनाओं के आवेश में भी कोई चैनल नहीं कहता कि क्रिकेट की मौत हो गयी। क्रिकेट की हार के ‘गम’ को व्यक्तिगत प्रदर्शनों-उपलब्धियों की आड़ में ‘गलत’ किया जाता है। जैसे अभी दक्षिण अफ्रीका से हारने पर हार की चर्चा कम हुई युसूफ पठान की ज्यादा हुई। यह समाचार माध्यमों की अघोषित रणनीति है क्योंकि इनके व्यवसायिक हित क्रिकेट के साथ सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं।

मैं बात पिछले विश्वकप की कर रहा था। भारत पहले दौर में ही बाहर हो गया था। किसी दूसरे दर्जे की टीम ने इसे हराया था। देश के बहादुर-क्रांतिकारी नौजवान अपने ‘राष्ट्र’ के इस अपमान को कैसे बर्दाश्त करते? लिहाजा खिलाडि़यों के घरों में तोड़-फोड़ की गयी। निंदा की गयी। कहीं-कहीं जुलूस भी निकाले गये। पुतले जलाये गये। कैसे जागरूक हैं अपने देश के नव-जवान! काश कि वे ऐसी ही जागरूकता देश के बड़े-बड़े भ्रष्टाचरियों के मामले में दिखाते। जुलूस व प्रदर्शन महंगाई व बेरोजगारी के खिलाफ करते। किसानों की आत्महत्याओं के विरोध में करते। विदेश में जमा कालाधन वापस लाने के लिये करते। लेकिन नहीं। भिलाई में कालेज के लड़कों ने महज इसलिए प्रदर्शन किया कि राजेश चौहान को टीम में वापस लो। बंगाल में कुछ ऐसे ही प्रदर्शन सौरभ गांगुली को लेकर हुए। संसद तक में आवाज उठायी गयी। किनके लिये?

क्या महज एक खेल के लिये? क्या सचमुच क्रिकेट सिर्फ एक खेल है? और अगर है भी तो यह साल में कितने दिनों तक, कितनी देर तक खेला जाना चाहिये? किस मौसम में खेला जाना चाहिये? समाचार माध्यमों में इसकी चर्चा कितनी देर तक होनी चाहिये? कितनी देर तक इनकी खबरें आनी चाहिये, कितनी देर तक इनका विश्लेषण होने चाहिये और कितना समय मैच का पूर्वानुमान लगाने में खर्च किया जाना चाहिये? इसकी कोई सीमा है नही? या यह हमारे जीवन दिन-ब-दिन अनलिमिटेड होता जायेगा? अगर होता है तो हुआ करे, अपनी बला से। पर मैं इस देश का ईमानदार नागरिक हूं। ईमानदारी से सारे टैक्स चुकाता हूं। इसिलए मुझे यह पूछने का हक बनता है कि सरकारी कर्मचारी अपना काम-धाम छोड़कर टीवी से क्यों चिपके रहते हैं? इस खेल को मुझ पर जबरन क्यों थोपा जा रहा है? वैसे ही जैसे रेलगाड़ी में शोहदे किस्म के नौजवान -और कुछ भले किस्म के लोग भी- अपने मोबाइल बजाकर मुझे जबरन वे गीत सुनाते हैं जिन्हें मैं कभी नहीं सुनना चाहता।

माफ कीजियेगा! इस खेल ने मेरा दिमाग खराब कर दिया है और मैं बार-बार अपने मूल मुद्‌दे से भटक जाता हूं। तो पिछली बार जिस दिन भारत पहले ही राउंड में विश्वकप से बाहर हुआ और हमारे क्रांतिकारी नौजवानों ने खिलाडि़यों के घरों में जूते-चप्पल फेंकने का सिलसिला प्रारंभ किया तो मीडिया ने इसका कवरेज उतना ही किया, जितना उनकी टीआरपी की तात्कालिक जरूरतों के लिहाज से पर्याप्त था। क्योंकि अब तक उन्हें यह समझ में आ चुका था कि उन्हें क्रिकेट की हार में भी जीत की खनक दिखानी है। इस बार वे खिलाडि़यों के साथ खड़े नजर आये। आनन-फानन में कुछ दिनों बाद 20-20 कप खेला गया और बताने की जरूरत नहीं है कि इसका फाइनल भारत व पाकिस्तान के बीच खेला गया जो कुछ दिनों पहले ही फिसड्‌डी साबित हुए थे। भारत को यह वर्ल्ड कप जीतना ही था। जीता भी। नहीं जीतता तो 10-10 कप खेला जाता व इसमें नहीं जीतता तो 5-5 कप खेला जाता, क्योंकि इस खेल के साथ अरबों-खरबों का मामला जुड़ा है।

क्या यह देश क्रिकेट के बिना नहीं चल सकता? सवाल पूछा ‘बड़ी खबर’ में पुण्य-प्रसून वाजपेयी ने। मैं खुश हुआ कि चलो कोई तो माई का लाल ऐसा है जो इस देश में क्रिकेट के खिलाफ भी बोल सकता है। अगले दिन उसी जी टीवी ने सचिन को महात्मा गांधी बना दिया। क्या किया जाये? धंधे का सवाल है। वह भी ऐसा धंधा जिसमें हार में भी जीत होती है। खिलाड़ी दोनों हाथ से पैसे बटोरते हैं। पेप्सी, कोला व दूसरे ब्रांड अपना धंधा चमकाते हैं। अखबारों के परिशिष्ट निकलते हैं। पत्रिकायें विशेषांक निकालती हैं। चैनलों को विज्ञापन मिलते हैं। बेरोजगार चीयर गर्ल्स को नाचने का रोजगार मिल जाता है। पहले दर्जे के फिल्म अभिनेता व अभिनेत्रियां किसी दूसरे दर्जे के क्रिकेट स्टार के साथ नयी फिल्म का प्रमोशन कर लेते हैं। ऐसे मास्टर जिन्हें ढंग से अपना विषय तक पढाना  नहीं आता क्रिकेट -ज्ञान बघारकर अपनी पर्सनालिटी चमका लेते हैं। खिलाड़ी अचानक मवेशियों की तरह बिकने लगते हैं। टीम का मालिक उन्हें बंदरों की तरह नचाता है और दोनों हाथों से पैसे बटोरता हैं। अखबारों-चैनलों में भतूपूर्व खिलाडि़यों की भी चल निकलती है और बाजार में सटोरिये खिलाडि़यों से भी ज्यादा पैसा पीट लेते हैं। ऐसे में हार में भी जीत नहीं होगी तो और क्या होगा? इसलिए, आइये इस महान खेल के महान खिलाड़ी सचिन को भारत रत्न बनायें!

जारी…

लेखक दिनेश चौधरी जर्नलिस्ट, एक्टिविस्ट रहे हैं. सरकारी नौकरी भी की. रिटायरमेंट के बाद फिर से कई तरह के प्रयोगों में सक्रिय हैं. इन दिनों इनका पता ठिकाना भिलाई में है. उनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. VSNandan

    January 26, 2011 at 3:45 pm

    आपका ये लेख अछरश सत्य है ,मेरी भी अभिव्यक्ति वही है लेकिन मैं कह नहीं सका और मेरे ही तरह कई और लोग भी होंगे जो इससे इतिफाक रखते होंगे ! चौधरी जी आपने जो सच का आईना दिखाया है वह काबिलेतारीफ है ! हम अपने-आप को राष्ट्रवादी मानते हैं ,लेकिन राष्ट्रीय गान , राष्ट्रीय पशु -पछी ,संविधान और माफ़ कीजियेगा शायद राष्ट्रीय खेल के बारे में नहीं जानते हैं ,आनेवाले समय में नयी पीढ़ी पूरी तरह पाश्चात्य ……………………………..???

  2. arvind

    January 26, 2011 at 4:44 pm

    हाकी के जादूगर दादा ध्‍यानचंद को भारत रत्‍न कब मिलेगा। क्‍या सरकार की आंखों के दीदा फूट गये हैं। बुद्वि जड़ हो गयी है। लानत है, धिक्‍कार है।

  3. Jay Singh Rawat

    January 27, 2011 at 3:25 am

    म्ेारा यह लेख गत वर्ष आज समाज में छपा था

    क्रिकेट के सिवा कुछ भी नहीं

    -जयसिंह रावत –
    महिला ए.आइ.बी.ए. विश्व चैम्पियनशिप का चार बार खिताब जीत कर भारत का नाम रोशन करने वाली मणिपुर की बाला एम.सी.मैरीकॉम को शिकायत है कि जब क्रिकेट खिलाड़ी महेन्द्रसिंह धौनी को खेल रत्न पुरस्कार मिल सकता है तो उसे क्यों नहीं मिल सकता ? धोनी की कप्तानी में केवल एक बार भारतीय टीम ने ट्वंटी-ट्वंटी का विश्व कप खिताब जीता, जबकि उसने लगातार चार बार विश्व चैम्पियन बनने का गौरव हासिल किया है। दरअसल मैरीकॉम ने यह प्रतिक्रिया व्यक्त कर भारत के हर गैर क्रिकेट खिलाड़ी के मन की वेदना व्यक्त की है। देखा जाय तो मैरीकॉम की जुबान से निकली यह आवाज हर उस भारतीय के दिल से होकर गुजरी है जिसका पेशा या समस्या या हुनर भारत के मीडिया और सरकार के लिये क्रिकेट के सामने धूल के बराबर भी नहीं है।

    आप जब सुबह अखबार पढ़ते हैं या फिर सरकार के दूर दर्शन सहित कोई भी चैनल देखते हैं तो आपको लगता होगा कि भारत में क्रिकेट खेलने ,राजनीति करने, हत्या या बलात्कार करने के अलावा कुछ नहीं होता है। भारत के गुमनाम वैज्ञानिको ने चन्द्रयान को चन्दा मामा पर भेज कर वहां तिरंगा गाढ़ दिया फिर भी मीडिया के लिये वह उतनी बड़ी खबर नहीं हुई जितनी कि भारतीय टीम द्वारा क्रिकेट के विश्वकप विजेता आस्ट्रेलिया को भारत में हराने की खबर थी। भारत के वैज्ञानिक या कारीगर न जाने कितनी बार इतिहास रचते होंगे मगर हमारे मीडिया के लिये इतिहास वह है जोकि क्रिकेट के मैदान पर रचा जाता है। भारतवासियों के लिये इससे बड़ी विषाद की बात और क्या हो सकती है कि मुम्बई के ताजा आतंकवादी हमले से जहां देशवासी आहत और आवेशित थे तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जिन्हें इंग्लैण्ड की टीम का वापस लौटना ज्यादा आहत कर रहा था और उन लोगों में मीडिया वाले भी पीछे नहीं थे। ंबंगाल के दो तिहाई हिस्से में बर्ड फ्लू फैला मगर दूर दर्शन सहित अधिकांश मीडिया के लिये उससे बड़ी खबर मास्टर ब्लास्टर द्वारा सवा सौ से ज्यादा रन बनाना था। कुछ ही दिन पहले जब चन्द्र यान ने चांद पर तिरंगा गाढ़ा तो दूरदर्शन पर परिचर्चा के दौरान दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार को यह उपलब्धि नजर नहीं आयी मगर वह गर्व से यह कहना नहीं भूला कि आस्ट्रेलिया को हरा कर भारत खेल में भी महाशक्ति हो गया।

    यह सोचने का विषय है कि क्रिकेट का जो जुनून भारत में पैदा हो रहा है उसका अंजाम क्या होगा। क्रिकेट ने बाकी सारे खेलों का सफाया ही कर दिया है। इस देश के प्रतिभाशाली खिलाड़ी गुमनामी में या फिर बदहाली में जी रहे हैं। यहां तक कि कई बार मैडल बेच कर रोटी जुटाने की के किस्से भी आम हुये हैं। हाकी जैसा खेल जिसमें भारत की कभी तूती बोलती थी वह किस हाल में है उसे सारा देश देख रहा है।यही हाल रहा तो परम्परागत खेलों का नामलेवा नहीं मिलेगा। आखिर कोई इन खेलों में अपनी प्रतिभा और किस्मत आजमायेगा भी तो क्यों ? क्रिकेट की चमक दमक और धन की बरसात के आगे बाकी खेलों की औकात ही क्या है। ओलम्पिक में बड़ी मुश्किल से बिन्द्रा और कुछ मुक्केबाजों के साथ ही एक पहलान ने इज्जत बचाई। इसके बाद भी न तो भारत की सरकार और ना ही भारत के मीडिया को इतने बड़े देश कंे खिलाड़ी विहीन होने में शर्म आई। चिन्ता का विषय यह है कि क्रिकेट तो दुनियां के केवल एक दर्जन कंे करीब देशेंा में खेला जाता है। तो फिर क्या बाकी 2 सौ से अधिक देशों के खेल पत्रकार या अन्य पत्रकार वहां भूखों मरते हैं या फिर वहां पत्रकारिता ही नहीं होती है ?

    देहरादून में हमने देखा है कि जब भी किसी आन्दोलन के तहत सफल चक्का जाम होता है तो लोग सूनी सड़़कों पर क्रिकेट खेलने आ जाते हैं। आप भी देश के किसी भी शहर के गली कूचे में चले जांय, वहां आपको बच्चे केवल क्रिकेट खेलते नजर आयेंगे। आज इस देश के बच्चे का ख्वाब जे सी बोस अब्दुल कलाम या प्रो0 सतीश धवन या फिर होमी भाभा बनना नहीं बल्कि सचिन तेंन्दुलकर और धौनी बनना है।बच्चों के आदर्श महात्मा गांाधी या जवाहरलाल नेहरू नहीं बल्कि क्रिकेट खिलाड़ी हैं उनके लिय अब्दुल हमीद या विक्रम बत्रा के बलिदान का मोल नहीं बल्कि तेन्दुलकर के दस हजार रन पूरे होने का महत्व है । जो बच्चे चालू पुर्जे हांेगे वे नेता बनना चाहते हैं ताकि बिना मेहनत के बड़े बड़े नौकरशाहों पर हुक्म चला सकें। बच्चे ऐसा ख्वाब पालें भी तो क्यों नहीं? अगर भारतीय टीम में सलैक्शन हो गया तो एक छक्के पर ही नोटों की बरसात होने लगती है। विज्ञापन कम्पनियां पीछे भागने लगती हैं। प्रधानमंत्री तो देश पर राज करता है और लोगों की गालियां भी खाता है मगर क्रिकेटर तो दिलों पर राज करता है और उसकी फोटो देवी देवताओं की तरह पूजी जाती है। अब तो सचिन तेन्दुलकर को भगवान भी कहा जाने लगा है।इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है कि भारत का मीडिया भी सचिन को भगवान बनाने पर तुला हुआ है। विडम्बना देखिये कि आदमी हो कर भी क्रिकेट के भगवानों की नीलामी हो रही है। उन पर लक्ष्मी बरस रही है और उधर मीडिया वाले बिक रहे हैं।

    क्रिकेट या किसी भी अन्य खेला का शौक पालना बुरा नहीं है। लेकिन दीवानगी की हद तक जाना भी उचित नहीं कहा जा सकता। हमारे वेद पुराणों में भी लिखा है कि अति सर्वत्र वर्जयते। दुर्भाग्य से हमारे देश में यह दीवानगी सारी हदें पार कर चुकी है। आप अनुभव करते होंगे कि जिस दिन कोई अन्तर्राट्रीय एक दिवसीय क्रिकेट मैच होता है उस दिन आपका बच्चा मन लगा कर नहीं पढ़ता। बच्चा ही क्यांे बड़े बूढ़े तक सारा काम छोड़ कर टेलिविजन पर चिपके रहते हैं। अगर भारत और पाकिस्तान के बीच मैच हो तो जरा दफ्तरों की हाजिरी जा कर देखिये। उन्हें भी देखिये जो दफ्तरों में तो हैं मगर काम करने के बजाय मैच का आनन्द ले रहे होंगे। सारी हदें तो तब पार हो जाती हैं जब कि हार जीत को साम्प्रदायिक आयने में देखने की कोशिश की जाती है। हर खेल का मकसद स्वस्थ मनोरंजन और सद्भावना है लेकिन आप जानते ही हैं कि जीत पर जुनूनी लोग कहां जा कर और किन के घरों के सामने जा कर आतिशबाजी करते हैं। यह जानते हुये भी कि उस जीत में हिन्दू खिलाड़ियों का जितना योगदान है उतना ही मुसलमान खिलाड़ियों का भी है। होगा भी क्यों नहीं मैदान में हिन्दू या मुसलमान नहीं बल्कि खिलाड़ी होता है और अपनी टीम को जिताना ही उस समय उसका धर्म होता है। अगर इस खेल का अंजाम साम्प्रदायिक सद्ाभाव बिगाड़ना ही है तो ऐसे खेल से तौबा करना ही श्रेयस्कर है।

    भारत में आज क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों की दुर्दशा हो रही है या फिर बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं या क्रिकेट के दिन कोई बाकी काम ही नहीं हो रहा है तो इसके लिये मीडिया ज्यादा जिम्मेदार है, जिसने इसका इतना बड़ा हव्वा खड़ा किया है। तीन दशक पहले जब हमने पत्रकारिता शुरू की थी तो हमारे सम्पादक या वरिष्ठ समझाते थे कि कभी समाचार में अलंकारिक या अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा का उपयोग मत करो। वह इसलिये कि हमारा काम केवल सत्य को उजागर करना है और किसी बात को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना सच्च की आत्मा को मारना है। लोग अखबार या टेलिविजन सच्चाई जानने के लिये ही देखते हैं। सच्चाई ही पत्रकारिता का प्राण मानी जाती है। मगर आज आप अखबार पढ़ें या कोई चैनल देखें तो आप मास्टर ब्लास्टर, धौनी के धुरन्दर, गांगुली के शेर, नजफगढ़ का सुल्तान जैसे अलंकार पढ़ और सुन कर अन्दाज लगा सकते हैं कि यह समाचार प्रसारण है या फिर भाट चारण। कभी हम अखबार के कारोबार वाले पन्ने में इस तरह की भाषा का उपयोग करते थे जैसे सोना उछला चांदी लुड़की आदि आदि । लेकिन अब तो क्रिकेट के बाजार में केवल क्रिकेट ही उछल रही है और बाकी सबकुछ लुड़क रहा है।

    —— जयसिंह रावत —
    0 9412324999

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