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दुख-दर्द

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार सतीशचंद्र नहीं रहे

झारखंड के वयोवृद्ध साहित्यकार तथा पत्रकार सतीशचंद्र इस दुनिया में नहीं रहे. शुक्रवार की शाम लगभग सात बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर जैसे ही फैली, धनबाद कोयलांचल शोक में डूब गया. वाकई सतीश बाबू के निधन से कोयलांचल की पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है और मुझ जैसे अनेक पत्रकारों ने अपना गुरू व अभिभावक खो दिया है. सतीश बाबू ने 1947 में झारखंड की धरती पर कदम रखा था. तब से वह लगातार देश औऱ प्रदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे.

झारखंड के वयोवृद्ध साहित्यकार तथा पत्रकार सतीशचंद्र इस दुनिया में नहीं रहे. शुक्रवार की शाम लगभग सात बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर जैसे ही फैली, धनबाद कोयलांचल शोक में डूब गया. वाकई सतीश बाबू के निधन से कोयलांचल की पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है और मुझ जैसे अनेक पत्रकारों ने अपना गुरू व अभिभावक खो दिया है. सतीश बाबू ने 1947 में झारखंड की धरती पर कदम रखा था. तब से वह लगातार देश औऱ प्रदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे.

उन्होंने ‘इंडियन नेशन’ और ‘आर्यावर्त’ अखबारों में नौकरी की और धनबाद में ‘आवाज’ नामक साप्ताहिक अखबार निकाल रहे ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के साथ मिलकर उसे दैनिक अखबार का स्वरूप प्रदान किया. उन्होंने सन् 1982 में ‘आवाज’ से अलग होकर ‘जनमत’ नामक दैनिक अखबार निकाला. 50 वर्षों के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने देश के शायद ही किसी पत्र-पत्रिका में न लिखा हो. उनका मजदूर आंदोलन से भी नजदीकी रिश्ता था. कांतिभाई मेहता के साथ काफी काम किया. उनकी साहित्यिक कृतियों में कोयला मजदूरों की जिंदगी पर अनुसंधानपरक और मार्मिक उपन्यास ‘वन पाथर’ तथा ‘काली माटी’ को खूब सराहा गया. इन सभी कृतियों का प्रकाशन जनमत प्रकाशन ने किया था, जिसकी स्थापना खुद सतीश बाबू ने की थी. सतीश बाबू पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। लेकिन कलम से उनका नाता अंत-अंत तक बन रहा.

ये रिपोर्ट लेखक किशोर कुमार पत्रकार की है जो सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं.

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0 Comments

  1. Vishnu Rajgadia

    February 26, 2011 at 2:34 am

    Meri Shradhanjali. Satish Babu se bahut kuch janane ka awasar mila, unki memory adbhut thi.

  2. Amit Raja

    February 26, 2011 at 5:16 am

    Satish babu ka jana patrkariya jagat ke liye bada nuksan hai. unhe meri shradhanjali.

  3. indranil sinha. (chacha of someone)

    March 10, 2011 at 7:21 am

    satish chandra nahi rahe.yeh baat viswas nahi hota dhanbud k patrakarita eak pehchan dene wale 2 naam swargio barhmdew sir;satish chandra. .kitni ajeeb baat hai…..? eak brahmchari doosra sansari.fir v dosti atut; 1982 mein janmat aiya sath sath chalte rahe; sachhai ki rahon par.aab madan sagar ajay sinha sarikhe patrakar nehi rahe.mere guru ravindra kumar singh ne kalam band kar diye.aab dhanbud main anusthano/pratisthano ka udghatan samaroh main officer/mafia neta dikhte hai;per mujhe yad hai bharmdew singh sharma satish chandra k bina koi sarkari gairsarkari kam ka subharamh nahi hota tha; mujhe garv hai mane satish chandra ko dekha bhi hai.

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