झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार सतीशचंद्र नहीं रहे

झारखंड के वयोवृद्ध साहित्यकार तथा पत्रकार सतीशचंद्र इस दुनिया में नहीं रहे. शुक्रवार की शाम लगभग सात बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर जैसे ही फैली, धनबाद कोयलांचल शोक में डूब गया. वाकई सतीश बाबू के निधन से कोयलांचल की पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है और मुझ जैसे अनेक पत्रकारों ने अपना गुरू व अभिभावक खो दिया है. सतीश बाबू ने 1947 में झारखंड की धरती पर कदम रखा था. तब से वह लगातार देश औऱ प्रदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे.

गया में बम विस्‍फोट, तीन पत्रकार घायल

: पुलिस के दो जवानों की मौत : बिहार विधानसभा चुनाव के छठे एवं अंतिम चरण में गया जिला में एक बम विस्‍फोट में दो पुलिसकर्मियों की मौत हो गई, जबकि इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के तीन पत्रकारों समेत सात लोग घायल हो गए. घायलों को इलाज के लिए विभिन्‍न चिकित्‍सालयों में भर्ती कराया गया है.

नक्सली नेताओं के विश्वास की रक्षा करें

किशोर कुमारपुलिस नहीं, पत्रकारों की भूमिका पर बहस हो : पश्चिम बंगाल के लालगढ़ से नक्सली नेता छत्रधर महतो की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की भूमिका और पत्रकारिता की चुनौतियों पर बहस छिड़ी हुई है। यह लाजमी भी है। लेकिन मेरा मानना है कि इस प्रकरण में या ऐसे संवेदनशील मामलों में पुलिस से ज्यादा पत्रकारों की भूमिका पर बहस होनी चाहिए। यह आत्म-मंथन का वक्त है। मैं अपनी बात को विस्तार देने से पहले एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। बात पुरानी है। तब मैं नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण का धनबाद में संवाददाता था। धनबाद जिले के ही टुंडी और पीरटांड इलाके में नक्सलियों की गतिविधियां बढ़ी हुई थीं। उस समय नक्सलियों के एक बड़े नेता पत्रकारों के संपर्क में रहते थे।

सरकार की संवेदनहीनता और सतीश बाबू की पीड़ा

किशोर कुमारवरिष्ठ और बुजुर्ग पत्रकार सतीश चंद्र ने 1947 में झारखंड की धरती पर कदम रखा था। तब से वह लगातार देश औऱ प्रदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। उन्होंने ‘इंडियन नेशन’ और ‘आर्यावर्त’ अखबारों में नौकरी की और धनबाद में ‘आवाज’ नामक साप्ताहिक अखबार निकाल रहे ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के साथ मिलकर उसे दैनिक अखबार का स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने सन् 1982 में ‘आवाज’ से अलग होकर ‘जनमत’ नामक दैनिक अखबार निकाला। 50 वर्षों के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने देश के शायद ही किसी पत्र-पत्रिका में न लिखा हो।