: सुहैल हामिद ने छापी बड़ी रिपोर्ट : यकीन करना मुश्किल है कि देश के मीडिया घराने अब पत्रकारिता की आड़ में संपत्ति हथियाने की लड़ाई में उतर गए हैं. दैनिक भास्कर ग्रुप का कारनामा अक्सर सुर्खियों में रहता है. इस समय सुर्खी छत्तीसगढ़ के धर्मजयगढ़ में डीबी पॉवर को मिले कोल ब्लॉक के ठेके को लेकर है. हिंदु के बाद हिंदुस्तान ने भी डीबी पॉवर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इसके लिए सुहेल हामिद को तैनात किया गया है. अब इस खबर को जनहित में लिखा गया है या फिर व्यवसायिक प्रतिद्वंद्वता में, यह तो हिंदुस्तान जाने पर इस खबर ने इस प्रोजेक्ट के पीछे चल रहे गोरखधंधे को जरूर उजागर किया है.
डीबी कार्प समूह दैनिक भास्कर निकालता है. इसी समूह की नई नवेली कंपनी है डीबी पावर. इस कंपनी को छत्तीसगढ़ के धर्मजयगढ़ में कोल खादान का एक बड़ा ठेका मिला है. इसके लिए करीब 693.32 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना है. इस अधिग्रहण से इलाके के करीब सवा पांच सौ परिवार उजड़ जाएंगे. इस प्रोजेक्ट का विरोध स्थानीय लोग भी कर रहे हैं. यहां के रहने वाले कतई नहीं चाहते कि उन्हें उजाड़ा जाए. वे लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं. डीबी पॉवर के कार्यालयों पर हमले हो रहे हैं. पुलिस और प्रशासन के लोग भी डीबी पॉवर के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं. इस कारण इससे संबंधित कोई भी शिकायत थाने में दर्ज नहीं हो रही है. जिलाधिकारी भी जन अदालत लगाकर स्थानीय लोगों को ही समझा रहे हैं. ग्रामीणों को बताया जा रहा है कि क्यों उन्हें यह जमीन डीबी पॉवर को सौंप देनी चाहिए और इसके बदले उन्हें क्या-क्या लाभ मिलेगा.
पिछले दिनों भास्कर पत्रकारिता के मानकों को भूलकर पूरी तरह से मालिक के पक्ष में उतर आया था. पहले पन्ने पर कई खबरें प्रकाशित की गईं. ऐसा दिखाया गया कि डीबी पॉवर को जमीन सौंप देने के बाद उनकी तकदीर पूरी तरह चमक जाएगी. इस स्थिति में यह उम्मीद कतई नहीं थी कि कोई अखबार दूसरे मीडिया ग्रुप की पोल खोलेगा. परन्तु प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक द हिंदू ने पहले पूरी कहानी विस्तार से प्रकाशित कर डीबी पॉवर की पोल खोली. इस खबर के झटके से अभी डीबी पॉवर उबरा भी नहीं था कि इस बार दैनिक हिंदुस्तान ने डीबी पॉवर की पोल खोलती एक रिपोर्ट प्रकाशित की है.
हिंदुस्तान ने धर्मजयगढ़ में डीबी पॉवर प्रोजेक्ट की खामियों पर निशाना साधा है. सुहेल हामिद के हवाले से लिखी गई इस खबर में बताया गया है कि धर्मजयगढ़ के आसपास अगर डीबी पॉवर कंपनी को प्रस्तावित कोल ब्लॉक में कोयला खनन की इजाजत मिलती है तो यहां की जनजातियों के अलावा एलिफैंट प्रोजेक्ट को भी भारी नुकसान पहुंचेगा. यहां के रहने वालों के साथ हाथियों को भी विस्थापन झेलना पड़ेगा. रिपोर्ट में मंडल वन अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि इस रेंज में 55 हाथियों के दो झुंड हैं और वह आसपास के जंगली इलाकों में स्थाई रूप से निवास कर रहे हैं. उसके अलावा उड़ीसा से भी इस कॉरिडोर में हाथियों का आजा-जाना होता है.
हिंदुस्तान ने विस्तार से इस खबर को प्रकाशित किया है. बताया गया है कि धर्मजयगढ़ एलिफैंट कॉरिडोर है पर रिपोर्ट में इसका जिक्र नहीं किया गया है. इसमें खरगोश, लोमड़ी सहित सिर्फ 14 वन्य प्राणियों के प्रभावित होने का जिक्र है. रिपोर्ट में कई तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया गया है, जिसमें इस प्रोजेक्ट के आसपास के 300 हेक्टेयर संरक्षित वन क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का जिक्र न किया जाना, इससे खनन और ढुलाई से होने वाले प्रदूषण के बारे में कोई जानकारी न देना शामिल है.
डीबी पॉवर प्रोजेक्ट मीडिया हाउसों की बढ़ती धन कमाने की ललक के रूप में देखा जा सकता है. आज ज्यादातर बड़े मीडिया हाउस पेड न्यूज एवं अन्य तरीकों से पैसा कमाने के बाद उसे सफेद करने की नीयत से दूसरे धंधों में उतरने लगे हैं. ये धंधे ही अब उनकी प्राथमिकता में शामिल होते जा रहे हैं. पत्रकारिता बाद की चीज बनती जा रही है या फिर इन धंधों को आड़ देने की छतरी. कुल मिलाकर अब कारपोरेट कंपनियों के बाद मीडिया कंपनी भी जनसम्पत्तियों को हथियाने की लड़ाई में उतर चुकी हैं. यानी अब तक आम आदमी की आवाज संसद, विधानसभाओं से तो दूर हो ही चुका था, अब मीडिया से भी दूर होने लगा है.
नीचे हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर
डीबी पावर प्रोजेक्ट से हाथियों पर आफत
सुहेल हामिद
धर्मजयगढ़ (छत्तीसगढ़)।: विस्थापित हो जाएंगे हाथी, करोड़ों रुपए हो रहे हैं एलीफेंट प्रोजेक्ट पर खर्च : छत्तीसगढ़ सरकार के प्रोजेक्ट एलीफेंट को पलीता लग सकता है। धर्मजयगढ़ और उसके आसपास के गांवों में डीबी पावर कंपनी के प्रस्तावित कोल ब्लॉक में कोयला खनन की इजाजत मिलती है, तो बिरहोर और पहाड़ी कोरबा जनजातियों के साथ हाथियों को भी विस्थापित होना पड़ेगा। इसलिए कोल ब्लॉक आवंटन का विरोध कर रहे संगठन अपनी लड़ाई में वाइल्ड लाइफ के लिए काम करने वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी साथ लेने की तैयारी कर रहे हैं।
धर्मजयगढ़ के वन मंडल अधिकारी सत्यप्रकाश मसीह कहते हैं कि इस रेंज में करीब 55 हाथियों के दो झुंड हैं और वह आसपास के क्षेत्रों में स्थाई तौर पर निवास कर रहे हैं। स्थितियां अनुकूल होने की वजह से उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। उनका कहना है कि धर्मजयगढ़ को प्रोजेक्ट में एलीफैंट कॉरिडोर के बजाय मुख्य स्थान के तौर पर शामिल किया जाए। रायगढ़ के वनमंडल अधिकारी आशुतोष मिश्रा भी इसकी तसदीक करते हुए कहते हैं कि इस इलाके में उड़ीसा की तरफ से हाथियों का आना-जाना है।
कंपनी की रिपोर्ट में हाथी नदारद कोल ब्लॉक आंवटन का विरोध कर रहे जन चेतना मंच के रमेश अग्रवाल कहते हैं कि डीबी पावर ने अपने एन्वायमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट (ईआईए) में हाथियों का कोई जिक्र नहीं किया, जबकि सरकार प्रोजेक्ट एलीफैंट पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। कोल ब्लॉक आवंटन से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को मुद्दा बनाकर लड़ाई की तैयारी में जुटे रमेश कहते हैं कि लोग संगठित हैं। उन्हें एक जुट रखने के लिए वह हर सप्ताह विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।पिछले माह हुई जनसुनवाई में लोगों ने भास्कर समूह की डीबी पावर कंपनी को ब्लॉक आवंटित करने का विरोध कि या था।
कोल ब्लॉक आवंटन का विरोध तेज
भास्कर समूह के डीबी पावर प्रोजेक्ट के लिए प्रस्तावित कोल ब्लॉक आवंटन का विरोध बढ़ता जा रहा है। रायगढ़ के कलेक्टर अशोक अग्रवाल भी मानते हैं कि धर्मजयगढ़ के लोग कोल ब्लॉक आवंटन के खिलाफ हैं। इसमें आदिवासी, धर्मजयगढ़ नगर पंचायत के लोग और बांग्लादेश से लाकर बसाए गए शरणार्थी शामिल हैं। यही वजह है कि जनसुनवाई के वक्त प्रशासन को 700 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े थे।
‘हिंदुस्तान’ के साथ बातचीत में अशोक अग्रवाल ने कहा कि इस मामले की जनसुनवाई करवाना उनका मुख्य उद्देश्य था। कोल ब्लॉक के बारे में 28 फरवरी को हुई सुनवाई में सभी लोगों ने इसका विरोध किया है। इसके अलावा बड़ी तादाद में लोगों ने लिखित आपत्ति दर्ज कराई है।
उनके मुताबिक, प्रस्तावित कोल ब्लॉक में धर्मजयगढ़ नगर पंचायत का करीब 40 फीसदी हिस्सा आता है। पंचायत के तीन वार्डों में रहने वाले लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। प्रभावित होने वाले क्षेत्र में आठ स्कूल, अस्पताल और सरकारी दफ्तर भी हैं। पर कोल ब्लॉक आवंटित करने के बारे में अंतिम फैसला केंद्र सरकार को करना है। जनसुनवाई मामले में स्थानीय प्रशासन अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है।
राज्य सरकार की उद्योग के लिए जमीन अधिग्रहण करने की नीति का जिक्र करते हुए जिला कलेक्टर अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘पहले किसानों को एक से डेढ़ लाख रुपए प्रति एकड़ मुआवजा मिलता था। पर अब बंजर जमीन के लिए छह लाख, एक फसल वाली भूमि के लिए आठ लाख और दो फसल वाली जमीन के लिए दस लाख रुपए प्रति एकड़ मुआवजा दिया जाता है।’












rajesh
March 9, 2011 at 11:45 am
ye to bhaskar ki purani aadat hai, paka daku group hai
madhyapradesh par akhbar ke madhyam se blackmail kar raha hai
Anirudh Mahato
March 9, 2011 at 9:43 pm
pawar aour paisa hamesa galat kam karati hai, yedi wah galti nahi karta to wah bhagwan ke saman hai. yahan to bhagwan ko bhi bisthapit banane se log nahi chuk rahen hain. samaj me bada dikhne ka saouk hi manawo ko passu banata hai.
anil choubey
October 4, 2011 at 4:49 am
अखबारों की मल्कियत बनियों के हाथों में रही हे बनिये हमेसा से लछमी के पुजारी थे सरसुती से उनका वास्त्ता ही नहीं हे ऐसे में ये घपला उनके लिए
खास नहीं हे इसी दैनिक हिन्दुस्तान से उन्हों ने १५००००००० रुपया कम लिया हे पर एक करोड़ पचास लाख के गोलमाल में पीछे नही रहे