: संगठनतोड़क शक्तियों के खिलाफ एकजुट होने की अपील : दोस्तों, जैसा कि आपको अख़बारों से पता चला होगा कि इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन, जिसकी बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन भी एक सम्बद्ध इकाई है, आज दो गुटों में बँट गयी है. आईजेयू में असली आईजेयू से अलग एक नया नकली गुट प्रेसिडेंट सुरेश प्रसाद अखौरी जी का बन गया है. सेक्रेटरी जेनरल के. श्रीनिवास रेड्डी के साथ वे लोग हैं जो आईजेयू के संविधान के मुताबिक चलने वाले लोग हैं.
देश भर से जमा हुए प्रतिनिधियों ने आईजेयू के सिरसा कांफ्रेंस में यूनियन के संविधान में संशोधन का प्रस्ताव पारित किया था, जिसके मुताबिक प्रमुख पदों प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी जेनरल पर दो टर्म से ज्यादा किसी को चुने जाने पर प्रतिबन्ध किया गया था. आप सबों को मालूम है कि वर्षों से, बल्कि यूँ कहें कि यूनियन की शुरुआत से ही दिल्ली में मुख्यालय का काम प्रेसिडेंट एवं दिल्ली में रहने वाले सेक्रेटरी के हाथों में रहा है. मगर सिरसा कांफ्रेंस के द्वारा पारित इस संविधान संशोधन को जानबूझ कर रजिस्ट्रार ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स के दफ्तर में नहीं दाखिल किया गया और उसे टाइम बार होने दिया गया. इसका सीधा मतलब था कि माननीय प्रेसिडेंट अखौरी साहब की इस पद को ताउम्र अपने पास ही रखने की नीयत रही.
ज्ञातव्य हो कि पिछले दो सम्मेलनों से सेक्रेटरी जेनरल श्री के. श्रीनिवास रेड्डी पद छोड़ने की बातें कर रहे थे, लेकिन बार-बार अपने माननीय प्रेसिडेंट की ओर से उनपर विभिन्न प्रकार से पद पर बने रहने का दवाब बनाया जाता रहा. श्री रेड्डी भी इस दवाब में झुकते रहे. यूनियन की एकता के नाम पर. मगर जब इस बार श्री रेड्डी इस बात के लिए अंततः तैयार नहीं हुए तो अध्यक्ष जी ने यूनियन तोड़ने की ही नीति अख्तियार कर ली.
मगर फिर भी रेड्डी जी और अन्य की ओर से काफी कोशिशें की जाती रही यूनियन को टूटने से बचाने की. अखौरी जी की सहमति से ही चेन्नई में मीटिंग की तारीख तय की गई लेकिन अंततः श्री अखौरी जी उसमे नहीं शामिल हुए, क्योंकि यह मीटिंग सर्वसम्मति से नए नेतृत्व के चुनाव पर सहमति बनाने के लिए बुलाई गई थी और अखौरी साहब उस पद पर ता-उम्र बने रहना चाहते हैं. फिर हैदराबाद में भी एक बैठक बुलाई गई. उसके बाद अखौरी जी के पास चूँकि कहने के लिए कोई तर्क नहीं बच गया था अपनी पद-लोलुपता को ढंकने के लिए, तो उन्होंने अपने समर्थकों के बीच आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की बड़ी सदस्य संख्या के बारे में बातें करनी शुरू कर दी.
इससे ज्यादा अवसरवादिता क्या हो सकती है कि जिस सदस्य संख्या के दावे पर आप अपनी यूनियन को सबसे बड़ा यूनियन बता कर वेज बोर्ड, भारतीय प्रेस परिषद् (प्रेस काउन्सिल ऑफ़ इंडिया) तथा केंद्रीय सरकार के एक्रेदिसन कमिटी की सदस्यता के मजे लेते रहे, हवाई उड़ानें भरते रहे, स्टेट गेस्ट बनकर घूमते रहे- आज वही बड़ी सदस्यता अखौरी साहिब को अखरने लगी, क्योंकि आज उनको अपने आपको ता-उम्र अध्यक्ष बने रहने की सहूलियत मिलती नहीं दिख रही है. इसी को अंग्रेजी में रेंक ओप्पोर्च्निस्म कहा गया है.
आज हमारे माननीय अध्यक्ष श्री अखौरी साहब जी दुष्यंत की इन पंक्तियों को अमल में लाते नजर आते हैं _ ” मत कहो आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है”. जो कोई भी आज आईजेयू में आईजेयू के संविधान के पालन और जनतंत्र की बात करता है, उसमें वे और उनके समर्थक अपना व्यक्तिगत शत्रु देखते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि “हमीं जब ना होंगे तो क्या होगी महफ़िल” यानी कि जब अखौरी साहब ही अध्यक्ष नहीं रहेंगे तो फिर क्या आईजेयू य़ा फिर और कुछ भी?
माननीय अखौरी साहब जी को यूनियन को व्यक्तिगत जागीर की तरह इस्तेमाल करने की बुरी आदत लग चुकी है, उनको पदों पर रहते रहते खून का स्वाद लग चुका है जो छूटना नहीं चाहता, तो अब वे यूनियन को तोड़ कर एक अपनी नई जागीर बनाना चाहते हैं – अपना एक नया हस्तिनापुर (इन्द्रप्रस्थ नहीं क्यूंकि इन्द्रप्रस्थ न्याय चाहने वाले, न्याय के रास्ते पर चलने वाले पांडवों का प्रतीक है) – जिसमे सिर्फ और सिर्फ अखौरी साहब का कौरवी हुक्म चलता हो और बाकी जो भी हों, वे उनकी, दुर्योधन की बांदियाँ हों या उनके इशारों पर चलने वाले दास हों.
अपने अखौरी साहब ने कभी आईएफडब्ल्यूजेयू के के. विक्रम राव साहब के खिलाफ तथाकथित तौर पर इसलिए बगावत की थी कि वे भी इसी प्रकार ताउम्र प्रेसिडेंट बने रहना चाहते थे. इसी नाम पर आईएफ़डब्ल्यूजेयू को तोड़कर आईजेयू बना था. आज वही अखौरी साहेब अपनी यूनियन के नए “के. विक्रम राव” साहब बन गए हैं. उनके अन्दर जनतंत्र की क्या भावना है, जनतंत्र का वे कितना आदर करते हैं या फिर वे कितने जनतांत्रिक हैं, इसकी पहचान के लिए इससे बड़ी कसौटी और क्या हो सकती है?
आज अपने अखौरी साहब ने अलग से अपनी एक अलग आईजेयू और उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी बना ली है, जिसमे सिरसा सम्मेल्लन के द्वारा चुने गए मात्र नौ सदस्य उनके साथ गए हैं, बहुमत आज भी अपनी जगह पर कायम है. सिरसा सम्मेल्लन द्वारा चुने गए दस राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य सामान्यतया आईजेयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बने हुए हैं, जिसमें बिहार से मैं (अरुण कुमार) और मोहम्मद असगर भी शामिल हैं.
पिछले 15 दिसंबर को दिल्ली के वाईएमसीए हॉल में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में फैसला लिया गया था, जिसमें खुद अखौरी साहब और वो सभी नौ राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भी शामिल थे, जो आज अखौरी साहब के साथ हैं और असली आईजेयू की चुनी गयी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से अलग बैठकें कर रहे हैं. 15 दिसंबर की बैठक में निर्णय लिया गया था कि पीटीआई फेडरेशन के साथी एमएस यादव की मध्यस्थता में सेक्रेटरी जेनरल श्री रेड्डी और प्रेसिडेंट श्री अखौरी दोनों मिल कर एकमत निर्णय लेंगे कि आईजेयू का मसला कैसे हल किया जाये और उन्हें एकमत होकर प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया में आईजेयू के प्रतिनिधियों की सूची तय करने का अधिकार और जिम्मेवारी भी दी गई.
मगर यादव जी, जो अखौरी साहब के अच्छे मित्र माने जाते हैं, की तमाम कोशिशें अपने प्रिय मित्र अखौरी साहब को रास्ते पर लाने में नाकाम रहीं. रेड्डी जी भी पूरी तरह नाकाम रहे अखौरी साहब को किसी निर्णय पर लाने में और अखौरी साहब ने अपनी ओर से इकतरफा तीन नामों का एक पैनल प्रेस कौंसिल में पेश कर दिया, जिसमें उन्होंने अपना खुद का नाम, ट्रिब्यून के विनोद कोहली साहब का नाम और त्रिपुरा के जयंत भट्टाचार्य का नाम दिया. फिर वही “हमीं जब ना होंगे तो क्या होगी महफ़िल” वाली बात – जिसमें स्वयं अखौरी साहब ही नहीं हों तो फिर वो प्रेस कौंसिल ही क्या?
15 दिसम्बर की बैठक के बाद अखौरी साहब ने यह भांप लिया कि मामला उनके खिलाफ जा रहा है तो उन्होंने यूनियन तोड़ने की कार्रवाई और भी तेज कर दी. क्योंकि उनकी आशा के विपरीत रेड्डी जी ने इस बार अपने को एस्सर्ट किया और प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया में बा-हैसियत सेक्रेटरी जेनरल अलग से आईजेयू का पैनल पेश कर दिया.
अखौरी साहब का दुर्भाग्य यह रहा कि प्रेस कौंसिल में मान्यता वाली पांच में से एक भी यूनियन ने उनके पैनल पर अपने समर्थन का हस्ताक्षर ही नहीं किया. सबों ने उनके पैनल पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. उनका पैनल गिर गया. रेड्डी साहेब के पैनल को बहुमत यूनियन का समर्थन मिल गया. उनमें से दो आईजेयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों – जिसमें एक बिहार से मेरा (अरुण कुमार) और दूसरा आंध्र प्रदेश से अमरनाथ कोशुरी का नाम शामिल है. पिछले 9 फरवरी को यह पैनल पास भी हो गया.
मगर अखौरी साहब की हरकतों से एक घाटा आईजेयू को यह हुआ कि जहाँ हम प्रेस कौंसिल में पहले तीन सीटें ले पाते थे, हमें दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा, क्योंकि हमें बहुमत जुटाने के लिए एनयूजे (आई) को एक सीट देनी पड़ी. क्योंकि आईजेयू का दावा ही अखौरी जी की वजह से विवादित हो गया था और हमें अपनी सीटें निकालनी भी थीं. आज इसी रणनीति को अखौरी जी के द्वारा गलत बताया जा रहा है और जिन्दगी भर अवसरवादिता करने वाले अखौरी साहब जी इसी को सिद्धांतहीनता बताकर अपनी सिद्धान्तवादिता के दावे करते चल रहे हैं. इसी को कहते हैं “सत्तर चूहे खाकर बिल्ली चली हज को”. यह सिद्धांतहीनता नहीं – रणनीति है. जो श्रीनिवास रेड्डी जी के द्वारा अपनाया गया और कामयाब भी रहा. वैसे भी राजनीति और संगठन के मामलों में किसी क़िस्म का छुआछूतवाद नहीं चलाया जा सकता. क्या हम अपने वेज बोर्ड का लक्ष्य हासिल करने के लिए फिर किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संयुक्त मोर्चा नहीं बनाया करते?
जब प्रेस कौंसिल में अखौरी साहब का पैनल मंज़ूर नहीं हुआ उसी वक़्त प्रेस कौंसिल अध्यक्ष के सामने ही श्रीमान अखौरी साहब जी ने चीख-चीख कर घोषणा कर दी कि अब आईजेयू टूटेगा. यानी जब आईजेयू अखौरी साहेब के स्वार्थ की पूर्ति नहीं करेगा तो आईजेयू को तोड़ दिया जायेगा. आज माननीय अखौरी साहब जी यही कर रहे हैं.
अखौरी साहब जी प्रेस कौंसिल से बिफरे हुए निकले और अपने लोगों के साथ मिलकर यूनियन तोड़ने की मुहिम पर चल परे. एकतरफा सेक्रेटरी जेनरल को सस्पेंड कर दिया, आंध्र यूनियन को असम्बद्ध घोषित कर दिया, तमिलनाडु यूनियन को असम्बद्ध घोषित कर दिया मानो यह यूनियन कोई उनकी व्यक्तिगत जागीर हो. आईजेयू के संविधान के मुताबिक इस तरह के निर्णय राष्ट्रीय कार्यकारिणी तो क्या राष्ट्रीय परिषद द्वारा ही लिए जा सकते हैं. मगर जब एक तानाशाह अपने रंग में आता है तो फिर उसके लिए संविधान कूड़ेदान में फेंकने की चीज हो जाती है. इतिहास गवाह है कि कोई भी तानाशाह संविधान को पसंद नहीं करता है, क्यूंकि संविधान तानाशाही को रोकने – मर्यादित करने के लिए बनाया ही जाता है. आज माननीय अखौरी जी एक तानाशाह के रूप में खुल कर हमारे सामने आ गए हैं, उनके पास अब कोई मुखौटा भी नहीं रह गया है. अब उनका सब “खुला खेल फर्रुखाबादी” चल रहा है. अपने अखौरी साहेब जी का. जो अब हमारे, आपके सभी के सामने है.
बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के साथियों ऐसी विषम परिस्थिति में ही मुझे यह खुला पत्र जारी कर आपसे वो सभी बातें शेयर करनी पड़ रही हैं, ताकि कल मुझे आपके सामने कठघरे में खड़े होने की नौबत ही नहीं आये. मैं विगत चेन्नई सम्मेल्लन से ही लगातार आईजेयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य आपलोगों के द्वारा चुना जाता रहा हूँ और मैंने पूरी ईमानदारी और वफादारी के साथ अपनी ताकत के मुताबिक आईजेयू की सेवा की है.
सिरसा सम्मेलन में भी मुझे आपकी ओर से राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भेजा गया और मैं आज भी वहां कायम हूँ, अपने बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के अपने दूसरे राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य साथी मोहम्मद असगर साहेब के साथ. हमने अपनी वफादारी किसी व्यक्ति के साथ नहीं वरन आईजेयू और उसके संविधान के साथ बनाये रखी है- हमने कोइ दल-बदल और गुटबाजी में जाने से अपने को बचाया है. हम दोनों जहाँ थे वहीँ हैं और पूरी वफादारी से आईजेयू संविधान की हिफाज़त में लगे हैं, जिसकी जिम्मेदारी आप सभी बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के साथियों ने हमें सौंपी है.
मगर आज एक विषम परिस्थिति आईजेयू के साथ आन पड़ी है कि जब अपने ही प्रेसिडेंट साहब के नेतृत्व में आईजेयू से अलग होकर य़ा कहिये की आईजेयू को तोड़ कर – आईजेयू के बैनर पर कब्ज़ा ज़माने का एक अभियान चलाया जा रहा है और ऐसी परिस्थिति में हमें अपने आईजेयू को संविधान नहीं मानने वाली गुटवादी – तानाशाही ताकतों से बचाना है और इस काम में आप सबों से मदद की अपील करता हूँ कि अपनी एकता और एकजुटता बनाये रखते हुए इन तानाशाही ताकतों को जोरदार शिकस्त दें, ताकि आने वाले दिनों में इस तरह की यूनियन तोड़क ताकतों को फिर सर उठाने की हिम्मत नहीं हो पाए.
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आईजेयू संविधान की रक्षा के हमारे संकल्प को आप अपनी ताकत दें और संविधान को ताक़ पर रख कर अपनी मनमानी, गुटवादिता और तानाशाही चलनेवाली ताकतों को सदा सदा के लिए शिकस्त दे कर जमींदोज कर दें.
आपका अपना
अरुण कुमार
महासचिव
बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन












sivendra narayan singh
August 29, 2011 at 7:22 am
arun kumar jee ko sach likhnai kai liyai dhanybad—– sivendra narayan singh