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आज आपकी और अधिक जरूरत थी आलोक भैय्या

[caption id="attachment_19887" align="alignleft" width="94"]अनामी शरणअनामी शरण[/caption]18 मार्च, 2011 की रात करीब साढ़े दस बजे मैं कम्प्यूटर के सामने बैठा कुछ काम कर रहा था कि एकाएक आलोक कुमार का फोन आया। आलोक भैय्या (तोमर) की खराब सेहत का हवाला देते हुए बताया कि सुप्रिया भाभी बात करना चाहती हैं। मैं एकदम हतप्रभ रह गया और भाभी से बातचीत में भी यह छिपा नहीं पाया कि भैय्या से मैं नाराज हूं। भाभी की शीतल बातों से मन शर्मसार सा हो गया। मेरी पत्नी ममता से भाभी ने बात की और फिर कैंसर से पीड़ित और खराब हालात में बत्रा में दाखिल आलोक तोमर को लेकर मेरे मन में संबधों के 28 साल पुरानी फिल्म घूमने लगी।

अनामी शरण

अनामी शरण

18 मार्च, 2011 की रात करीब साढ़े दस बजे मैं कम्प्यूटर के सामने बैठा कुछ काम कर रहा था कि एकाएक आलोक कुमार का फोन आया। आलोक भैय्या (तोमर) की खराब सेहत का हवाला देते हुए बताया कि सुप्रिया भाभी बात करना चाहती हैं। मैं एकदम हतप्रभ रह गया और भाभी से बातचीत में भी यह छिपा नहीं पाया कि भैय्या से मैं नाराज हूं। भाभी की शीतल बातों से मन शर्मसार सा हो गया। मेरी पत्नी ममता से भाभी ने बात की और फिर कैंसर से पीड़ित और खराब हालात में बत्रा में दाखिल आलोक तोमर को लेकर मेरे मन में संबधों के 28 साल पुरानी फिल्म घूमने लगी।

आलोक तोमर से मेरा रिश्ता एक लंबी नदी की तरह है। कभी हम दोनों में भरपूर प्यार लबालब रहा, तो कभी सूखी हुई नदी की तरह भावहीन से हो गए। मन में तमाम शिकायतों के बाद भी सामने नाराजगी प्रकट करने की हिम्मत कभी नहीं रही, तो सामने देखकर भैय्या ने भी कभी मेरी उपेक्षा नहीं की। अलबता पिछले करीब आठ साल से हम दोनों के बीच कोई वार्तालाप तक नहीं हुआ, फिर भी मन में आदर के साथ शिकायत भी बना रहा है। भड़ास4मीडिया से कैंसर की जानकारी मिलने के बाद भी बात करने की पहल हमने भी नहीं की (इस गलती का अहसास कल रात को हुआ)।

जनसता के प्रकाशन के साथ ही 1983 से मैं आलोक तोमर से पत्र संपर्क के जरिए (तब तक तो मैं दिल्ली भी नहीं आया था) जुड़ गया। पहले पत्र से ही मैंने भैय्या का संबोधन दिया था। पहले पत्र में मैंने भाभी को भी प्रणाम लिखा था। लौटती डाक में भैय्या ने मुझे भाभी को किया गया प्रणाम यह कह कर लौटा दिया कि अभी तेरी कोई भाभी नहीं है। हमारे बीच पत्र का रिश्ता बना रहा और लगभग हर माह चार-पांच पत्र आते ही रहते थे। (कुछ पत्र तो मेरे घर देव में आज भी सुरक्षित होंगे)।

आलोक भैय्या से पहली मुलाकात 1985 में हुई। वे चाहे जितने भी बड़े पत्रकार होंगे, मगर आलोक भैय्या के रूप में वे हमारे लिए ज्यादा बड़े थे। जनसत्ता दफ्तर में जाकर पहली बार मिलना कितना रोमांचक रहा, इसका बयान मैं नहीं कर सकता। उनसे मिलना वाकई मेरे लिए किसी कोहिनूर को पाने से कम नहीं था। आलोक भैय्या ने भी करीब एक घंटे तक अपने सामने बैठाए रखा और घर परिवार से लेकर बहुत सारी तमाम बाते पूछी। फिर बिहार लौटने से पहले दोबारा मिलकर जाने को (आदेश) कहा।

उनसे मेरी दूसरी मुलाकात कितनी अद्भभुत रही, इसको याद करके मैं आज भी सोचता हूं कि वे वाकई (उस समय) रिश्तों को खासकर हम जैसे छोटे गांव से पहली बार दिल्ली आने वाले को कितना मान देते थे। उस समय तक तो हमलोग नौसीखिया पत्रकार भी ठीक से नहीं बन पाए थे। कभी-कभी तो शर्म भी आती है कि सामान्य शहरी शिष्टाचार के मामले में भी मैं कितना आलोकजीअनाड़ी था। आलोक भैय्या से मुलाकात हो गई। कैंटीन से चाय और समोसे भी खिलाए। थोड़ी देर के बाद वे उठे और बोले बबल, तुम बैठो मैं अभी थोड़ी देर में आता हूं (यह आमतौर पर मुलाकात खत्म करने का सामान्य तरीका है)। मैं इस दांवपेंच को जानता नहीं था, लिहाजा उनके टेबुल के सामने ही करीब दो घंटे तक बैठा अपने आलोक भैय्या के आने की राह देखता रहा। वे आए और मुझे बैठा देखकर लगभग चौंक से गए। मुझसे बोले अभी तक गए नही? मैनें मासूमियत से जवाब दिया आपने ही तो कहा था कि तुम बैठो, मैं अभी आता हूं? मेरी मासूमियत या यों कहें बेवकूफी को भांपते हुए फौरन मेरा मान रखने के लिए अपनी भूल का अहसास करते हुए फौरन कहा हां, मैं एकदम भूल गया कि तुम बैठे हो। थोड़ी देर तक बातचीत की और एकबार फिर चाय पीलाकर मुझे रूखसत किया। इस घटना से उनके बड़प्पन का बोध आज भी मन को उनके प्रति आदर से भर देता है।

साल 1985 में मेरे संपादन में एक कविता की किताब संभावना के स्वर भी छपा, जिसकी प्रति भैय्या को दी। 1987 मे मैं भारतीय जनसंचार संस्थान में दाखिला लेकर दिल्ली आ गया। तब मेरे साथ आलोक भैय्या हमारे भैय्या है, इसका एक विश्वास हमेशा मन को बल देता रहा। 1990 में चौथी दुनिया (तबतक संतोष भारतीय एंड कंपनी अलग हो चुकी थी) की रिपोर्टिग के दौरान मैंने अपने लिए ढेरों लोगों से समय तय कराया। 1992 में समय सूत्रधार के लिए चंद्रास्वामी के इंटरव्यू के लिए भी समय तय कराया। पूरे इंटरव्यू के दौरान वे हमारे साथ भी रहे। मेरे आलोक भैय्या प्रेम को देखकर वे कई बार आगाह भी करते कि सब जगह मेरा नाम मत लिया कर वरना कभी-कभी घाटा भी उठाना पड़ सकता है। हालांकि जिदंगी में ऐसा मौका कभी नहीं आया।

1991 के बाद आलोक भैय्या से हमारा रिश्ता ही और ज्यादा प्रगाढ़ हो गया। हर एक लेख या रिपोर्ट 300 रूपए के हिसाब से शब्दार्थ के लिए मैनें 50 से भी अधिक लेख या रिपोर्ट लिखे। तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन से किया गया लंबा आक्रामक इंटरव्यू भी (जो बाद में सैकड़ों जगह प्रकाशित हुआ) शब्दार्थ के लिए किया। शब्दार्थ के लिए ही मैं गुमला झारखंड के जंगलों में जाकर आदिवासियों की समानांतर सरकार की रिपोर्टिग की।

1993 में मयूर विहार फेज तीन में मैंने एक एलआईजी फ्लैट खरीदा। मकान तो खरीद लिया, मगर अंत में पांच हजार रूपए घट गए। जिसकी अदायगी नहीं होने तक प्रोपर्टी डीलर ने नए फ्लैट पर अपना ताला डाल दिया। तब तक मोबाइल तो दूर की बात लैंडलाईन का किसी घर में होना भी स्टेटस सिंबल होता था। घर से पैसा मंगवाने में भी आठ-दस दिन तो लग ही जाते। मैंने अपनी समस्या आलोक भैय्या को बताया, तो उन्होनें शब्दार्थ के लिए 20-25 रिपोर्ट लिखकर लाने को कहा। मैं दो दिन तक लक्ष्मीनगर वाले किराये के मकान में खुद को बंद करके तीसरे ही दिन करीब 30 रिपोर्ट कस्तूरबा गांधी मार्ग वाले पेट्रोल पंप के पीछे शब्दार्थ में दे दिया। आलोक भैय्या ने रिपोर्ट को देखे बगैर ही फौरन पांच हजार रूपए हमें दे दिए।

इस बीच अपने घर के प्रोपर्टी डीलर पुराण की गाथा मैं लक्ष्मीनगर में राकेश थपलियाल के घर पर बैठकर बता ही रहा था कि राकेश के पापा कमलेश थपलियाल अंकल अपने कमरे में गए और पाच हजार रूपए लाकर मेरी और बढ़ाया। यह मेरे लिए एक चमत्कार सा कम नहीं था। मैं एकदम चौंक सा गया। मैंने कहा कि अंकल पैसा तो मैं ले लूंगा मगर, इसे कब लौटाऊंगा यह मैं अभी नहीं कह सकता? मेरे ऊपर पूरा विश्वास दिखाते हुए उन्होंने कहा तुम पैसे ले जाकर पहले घर को अपने कब्जे में करो। मेरा पैसा कहीं भाग नहीं रहा है, मुझे पता है कि पैसा आने पर सबसे पहले तुम यहां पैसा देकर ही जाओगे। आलोक भैय्या से पांच हजार लेते समय यह बताया कि मुझे कमलेश थपलियालजी भी पैसा देने के लिए राजी है, जिसपर उन्होंने कहा कि पैसे तो मिल ही गए, फिर क्यों किसी का अहसान लोगे?

1993 अक्टूबर में मां पापा और पत्नी ममता जब पहली बार दिल्ली आए तो आलोक भैय्या भाभी और छोटी मिष्ठी को लेकर मयूर विहार फेज तीन घर पे आए। सबों से मिलकर भैय्या और भाभी भावविभोर हो गए। भैय्या ने ममता को कहा भाई मेरा बर्थडे 27 दिसंबर को होता है, मैं चाहता हूं कि मुझे ताऊ बनाने वाले का जन्मदिन भी 27 दिसंबर ही हो, ताकि एक साथ ही जन्मदिन मनाया जा सके। यह एक अजीब संयोग रहा कि मेरी बेटी कृति का जन्म भी 27 दिसंबर 94 में हुआ।

भैय्या से भाभी को लेकर यदा- कदा बहुत सारी बातें हुई। यहां तक कि कैसे भैय्या ने भाभी को पटाया और प्यार और विवाह का प्रस्ताव रखा। उधर से हरी झंडी मिलते ही हमारे भैय्या इस कदर भाव विभोर होकर खुश हो गए कि अपने स्कूटर को सीधे जाकर एक गाड़ी से भिड़ा दिया और सीधे अस्पताल में दाखिल हो गए। तब भाभी झंडेवालान दफ्तर जाने की बजाय भैय्या की देखभाल करती रही। भाभी को नवभारत टाइम्स में लगवाने से लेकर 1990 में जनसत्ता छोड़ने के तमाम कारणों पर भी भैय्या ने पूरी कहानी बताई।

इस बीच राष्ट्रीय सहारा से मैं 1993 दिसंबर में जुड़ गया। बात 1995 की है। डेटलाइन इंडिया के लिए भी मैंने 30-35 रिपोर्ट लिखे, मगर इस बार मुझे पैसा नहीं मिला। काफी समय बाद फिर बात 2000 की थी, जब एक दिन भैय्या ने दीपक बाजपेयी (तब डेटलाइन देख रहे थे) से फोन करवाया और रिपोर्ट लिखने के लिए कहलवाया। बाद में फोन लेकर भैय्या ने कहा अनामी इस बार तु्म्हें जरूर पैसे दूंगा। मैंने कहा भैय्या आपने फोन किया यही मेरे लिए काफी है। मगर, भैय्या बार-बार बोलते रहे नहीं अनामी, इस बार तुम्हें शिकायत नहीं होगी, बस जुट जाओ डेटलाइन को जमाना है। इसके बाद करीब दो माह तक यह रोजाना का सिलसिला सा बन गया कि सुबह 8-9 के बीच भैय्या का फोन आता और मैं दो एक रिपोर्ट का टिप्स भैय्या को पूरे विवरण के साथ लिखवाता, जिसे बाद में भैय्या अपनी तरफ से कभी मेरे नाम तो और भी कई नाम से रोजाना डेटलाइन के लिए जारी करते।

भैय्या के घर में जाकर दो बार मिला। एक बार कालकाजी वाले मकान और दोबारा चितरंजन पार्क में। दोबारा जाने पर तो एकाएक भाभी को सामने देखकर मैं पहचान ही नहीं पाया। इस पर भाभी नाराज होकर बोली और मत आया करो, बाद में तो फिर पहचानोगे ही नहीं? भैय्या हमेशा मेरे लिए सुपर ब्रांड रहे, यही वजह है कि चाहे आलोक कुमार, अनिल शर्मा (छायाकार), नवीन कुमार, अशोक प्रियदर्शी आदि को मैंने ही भैय्या से मिलवाया। सारे लोग किसी ना किसी तरह से आज भी संपर्क में हैं, मगर मैं ही कट सा गया।

इसी दौरान तीन नए राज्य बने, और मुझे झारखंड में रांची, हजारीबाग जाना पड़ा। भैय्या ने मुझसे कुछ रिपोर्ट लाने को कहा। नए राज्य के गठन के समय नए उत्साह और नए माहौल में भागते हुए करीब 15-16 रिपोर्ट के लिए मैटर जमा कर वापस दिल्ली लौटा। एक दिन रात में भैय्या फोन करके रिपोर्ट के बाबत पूछ रहे थे। मेरी जेब में उस समय केवल 13 रूपए ही थे। मैंने भैय्या से कहा कि कुछ पैसे तो दीजिए भैय्या, जेब एकदम खाली है। इस पर भैय्या ने कहा जल्द ही मैं भिजवाता हूं। उस दिन के बाद फिर आलोक भैय्या का फोन आना बंद हो गया। बहुत सारी रिपोर्ट होने के बाद भी मैं इस डर से फोन नहीं किया कि कहीं भैय्या को यह ना लगे कि पैसों के लिए मैंने फोन किया है? बातचीत बंद होने का यह सिलसिला इस कदर गहराया कि रिश्तों पर ही विराम लग गया। अलबता कई साल के बाद एक दिन बंगाली मार्केट में बंगाली स्वीटस में मुझे देखकर भैय्या ने आवाज दी। अनामी सुनकर मैं भी चौंक पड़ा। उनसे मिला और हमेशा की तरह पैर छूआ। घऱ का हाल चाल पूछे। करीब पांच मिनट की इस मुलाकात के बाद यह मेरा दुर्भाग्य है कि 28 साल पुराने रिश्ते पर विराम लगे एक दशक गुजरने के बाद भी हम दोनों को (मेरी गलती अधिक है क्योंकि मैं छोटा भाई हूं) खत्म हो गए इस रिश्ते की कभी लेखन, तो कभी पारिवारिक स्तर पर हर समय खबर तो मिलती ही रहती थी, मगर अपने बीमार भाई से जाकर मैं नहीं मिल पाया।

कल दोपहर में ही रायपुर से रमेश शर्मा का फोन आया और भैय्या की सेहत को लेकर काफी देर तक बातें होती रही। आलोक भैय्या से भाभी को पहली बार मिलाने वाले रमेश शर्मा कई साल तक एक साथ काम करते थे। एक बार हिन्दी की विख्यात लेखिका चित्रा मुदगल जी के यहां गया था। जहां पर चर्चा के दौरान भैय्या की मानस मां चित्रा आलोक तोमर को लेकर भावविभोर हो गईं।

कल रात भाभी से बात होने के साथ ही मेरे मन का सारा मैल धुल गया। आंखों से आंसू की तरह तमाम शिकवा गिला भी खत्म हो गए। अपने आप पर शर्म आ रही है कि क्या मैं वाकई इतना बड़ा हो गया हूं कि अपने उस भाई से भी नाराज हो सकता हूं ? यह सब मेरे जैसे छोटी सोच वालों से ही संभव है। वाकई भैय्या आपसे नाराज और दूर होकर मैने अपना कितना नुकसान किया? यह बता पाना मेरे लिए कठिन है। सचमुच भैय्या अपनी जिद्द और लगन से अभी तक सबकुछ संभव साबित किया है। हमने कामना की थी कि हमलोगों की दुवाओं से नहीं भैय्या बल्‍िक आपको अपनी जिद्द और कठोरता से इस बार फिर कैंसर को परास्त करना है, ताकि एक बार फिर सब कुछ सामान्य हो सके। क्योंकि आज आपकी और अधिक जरूरत है। आज जब मीडिया के ही लोग दलाल बनकर सामने आ रहे है, तो उनको बेनकाब करने का साहस आपके सिवा और किसमें है? सचमुच भैय्या वाकई आपकी आज ज्यादा आवश्यकता है। पर शायद भगवान को यह मंजूर नहीं था।

लेखक अनामी शरण बबल दिल्‍ली में पत्रकार हैं. काफी समय तक आलोक तोमर के साथ जुड़े रहे हैं.

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0 Comments

  1. योगराज शर्मा

    March 20, 2011 at 8:05 am

    आलोक जी को जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क की तरफ से श्रद्धांजलि व नमन… प्रभू उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
    योगराज शर्मा, एडिटर इन चीफ, जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क
    http://www.journalisttoday.com/

  2. pankaj kr. singh

    March 20, 2011 at 8:06 am

    aisa satya bhal aub kaun likhata hai?

  3. संजीव समीर

    March 20, 2011 at 8:55 am

    आलोक तोमर कई पत्रकारों के प्रेरणास्रोत रहे हैं. उनके निधन से हिंदी पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है. उन्हें कोडरमा जिले के पत्रकारों की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि. भगवान उनकी आत्मा को शांति और उनके परिवार को इस दुखद घडी में शक्ति दे…
    – संजीव समीर, कोडरमा

  4. अमित बैजनाथ गर्ग. जयपुर. राजस्थान.

    March 20, 2011 at 10:12 am

    आलोक तोमर साहब को नमन…

  5. anamisharanbabal

    March 20, 2011 at 10:24 am

    अनामी शरण बबल 20 मार्च 2011 दोपहर 2बजे।
    अभी अभी मैं घऱ में बैठा ही था कि माणिक का फोन आया और एक धमाके के साथ उसने बताया कि आलोक तोमर नहीं रहे। यह सुनकर मैं कांप सा गया। फौरन भडास खोला ताकि यह पता चल सके कि भैय्या को लेकर क्या खबर है। भैय्या पर लिखा मेरा लेख भी लग गया था। भडास में यह लेख कल नहां लगा तो इसे मैने विनोद विप्लव को उसके वेब के लिए दिया और मैं चाहता था कि यह किसी तरह भी कहीं जारी हो, ताकि भैय्या से जब मैं 21 मार्च को मिलने जाऊं तो यह वे जरूर पढ़े। भाभी से मिलने या भैय्या को देखने की मेरी हसरत ही रह गई, क्योंकि होली की वजह से मैं 19 को नहीं जा सका। आलोक कुमार ने बताया तो था तो था कि भैय्या की हालत काफी नाजुक है, मगर हमें लगा कि अब दो दिन के बाद ही जाकर मिलूंगा। मगर हमेशा की तरह इस बार भी मैं फिर गलत साबित हुआ । शायद भैय्या मुझसे इस कदर नाराज थे कि हमें माफी मांगने का मौका देना भी उन्हें गवारा नहीं लगा। सचमुच भैय्या नाराजगी के लिए मैं आपसे माफी तक नहीं मांग सका , और इसका मलाला जीवन भर रहेगा। सचमुच भैय्या आपको खोकर वाकई लग रहा है मानो अपनी भूल से मैं अपने उस रिश्तें का भी मान नहीं रखा, जिसके लिए आपने मुझ जैसे अबोध पत्रकार को ठेठ गंवार या बुद्धू नहीं बनने दिया था। आपका छोटा भाई आज आपके सामने लज्जित है भैय्या मुझे क्षमा कर दे, क्योंकि अब तो मैं आपके सामने कान पकड़ कर भी क्षमा नहीं मांग सकता।

  6. मदन कुमार तिवारी

    March 20, 2011 at 12:46 pm

    अनामी जी आप अनाम रहे ज्याा ठिक है आपने इस पुरे लेख में अपने आपको महान और आलोक तोमर जी को अदना दिखाने का असफ़ल प्रयास किया है । कैसे पत्रकार हो यह तो मैं नही जानता और जानना भी नही चाहता ।ओछे लोगों से बहुत नफ़रत करता हूं। तुम्हारा यह लेख पढकर लगता है तुम मानसिक स्तर पर एक बनिया हो , पत्रकार तो हरगिज नही लगते । आलोक तोमर कर्म पुरुष थें , मर्त्यु शैया पर पडा आदमी अस्पताल से अपने पत्रकारिता के कर्म को निभा रहा था , आज मैने होळी नही खेली , रंग की एक बुंद भी नही , कभी मिला भी नही आलोक तोमर जी से , मेरे हीं उम्र के थें। उनकी लेखनी और जुझारुपन ने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया । अनामी आगे से किसी को गाली देना हो तो सीधे-सीधे देना , एक वाहियत गंदा लेख । अपने पुरे लेख में तुमने अपने बाकी पैसे के अलावा और किसी बात का जिक्र नही किया जिससे लगता की तुमने आलोक तोमर जी से कुछ सीखा । मूर्ख .

  7. RATNA RAJSHRI

    March 20, 2011 at 5:06 pm

    Alok Tomarji ko mera hraday sey naman…Ishwar unki aatma ko shanti dey aur paiwar ko ye pahad sa dukh sahne k shakti dey…Ratna Rajshri

  8. vishal sharma

    March 21, 2011 at 3:38 am

    जिंदगी बस एक उम्मीद भरी डगर है…मौत एक हक़ीकत है। लेकिन आख़िर दम तक अपने पसंदीदा क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए मौत से रुबरू होने का नसीब कम लोगों को ही मिलता है। आलोक जी आपका जाना दुखद है लेकिन आपका सफ़र सुकुन भी देता है क्योंकि इसमें ये अहसास छिपा है कि अपनी शर्तों पर भी जिदंगी को बख़ूबी जिया जा सकता है। कलम के इस अद्वितीय सिपाही को पूरे सम्मान और गौरव के साथ भावभीनी श्रद्धाजंलि…. विशाल शर्मा,पत्रकार,(जयपुर)

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