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मैं उनका सौवां अंश भी नहीं बन पाया

मुझे किसी की भी मृत्यु ज्यादा दुःख नहीं पहुंचाती. पिछले पांच सालों का लेखाजोखा याद किया तो लगा कि इस दौरान कई लोगों की मृत्यु हुई. इनमें कुछ परिजन थे और कुछ दोस्त भी. मगर किसी की मौत मुझे आत्मा के स्तर पर दुखी कर गई हो ऐसा याद नहीं आता. कभी-कभी तो लगने लगता कि कहीं मैं बहुत संवेदनहीन तो नहीं हो गया? सोचता कि सुबह से लेकर देर रात तक लगातार काम करने के कारण संवेदनाएं कम होती जा रही हैं. फिर लगता कि मैंने ओशो की “मृत्यु एक उत्सव” सीडी इतनी बार सुनी है कि उसका प्रभाव कहीं गहरे उतर गया है. इसलिए मृत्यु पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.

मुझे किसी की भी मृत्यु ज्यादा दुःख नहीं पहुंचाती. पिछले पांच सालों का लेखाजोखा याद किया तो लगा कि इस दौरान कई लोगों की मृत्यु हुई. इनमें कुछ परिजन थे और कुछ दोस्त भी. मगर किसी की मौत मुझे आत्मा के स्तर पर दुखी कर गई हो ऐसा याद नहीं आता. कभी-कभी तो लगने लगता कि कहीं मैं बहुत संवेदनहीन तो नहीं हो गया? सोचता कि सुबह से लेकर देर रात तक लगातार काम करने के कारण संवेदनाएं कम होती जा रही हैं. फिर लगता कि मैंने ओशो की “मृत्यु एक उत्सव” सीडी इतनी बार सुनी है कि उसका प्रभाव कहीं गहरे उतर गया है. इसलिए मृत्यु पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.

ऐसा लगता कि जिस काम के लिए व्यक्ति ने जन्म लिया है अगर बेबाकी से वो काम कर दिया तो मृत्यु से अच्छा भला और क्या? लगता कि अगर लोगों से यह कहूँगा तो वो सिरफिरा ही समझेंगे. बस मन ही मन में यह ख्याल बना रहता. पर कल पहली बार यह ख्याल टूटा. होली मैं जोरशोर से मनाता हूँ. कल भी होली मनाने के लिए सफ़ेद कुर्ता खरीद कर लाया. आम तौर पर सुबह देर से ही उठता हूँ. कल तैयार होने से पहले चाय पीते-पीते फेसबुक खोली. कुमार सौवीर की पोस्ट थी. उसमे आलोक तोमर जी की मृत्यु की खबर थी. मन धक हो गया. फिर भड़ास खोली. बहुत अजीब लगने लगा. लगा कि यह वो हो गया जो नहीं होना चहिए था.

पत्नी से कहा कि तबीयत ठीक नहीं हैं. आज होली नहीं खेलूँगा. थोड़ी देर लेटा रहा. बेटे ने जब देखा तो वो पार्क में अपने दोस्तों के साथ होली खेलने चला गया. पूरे दिन किसी को भी फोन पर बधाई नहीं दी ना ही किसी से मिलने गया. मैच देखा तो उसमें भी ज्यादा मन नहीं लगा. रात दस बजते-बजते पत्नी से कहा कि एक स्लीपिंग टैबलेट दे दो. उसने भी हैरत से देखा कि दो बजे से पहले ना सोने वाला मैं आज दस बजे ही क्यों सो रहा हूँ. बस मन उदास था तो सो गया. सोचा भी क्यों परेशान हूँ.. पर समझ नहीं आया.

आज सुबह पांच बजे प्यास लगी तो पानी पीने उठा. आदत है उठते ही सेल देखने की. भाई यशवंत का उदास करने वाला मैसेज पढ़ा था, आलोक जी के ना रहने पर. एक झटके से बिजली कौंधी. समझ आया कि कल उदासी की वजह क्या थी? दरअसल आलोक जी से सीधा कोई वास्ता नहीं था. इसलिए उनके ना रहने पर मेरे जैसे शख्स का मन उदास हो, जो अपने कई परिजनों की मृत्यु पर भी उदास ना हुआ हो यह मन मानने को तैयार नहीं था. पर जिंदगी में कई ऐसी घटना होती हैं, जो आपके अंतर्मन में पड़ी रहती हैं. जब उनसे मिली जुली कोई बात होती है तो अचानक लगता है अरे यही तो बात थी. सुबह सुबह यशवंत जी का मैसज देख कर लिखने बैठ गया.

आलोक जी का ना रहना इतना बुरा क्यों लगा यह सोचने लगा. लगा कि मैं इस शख्स को इसलिए पसंद करता था क्योंकि मैं उनके जैसा बनना चाहता था, पर उसका सौवां अंश भी नहीं बन पाया. जो आग उस शख्स के सीने में धधकती नजर आती थी लगता था कि वैसी ही आग मुझमें थी, जो पता नहीं कहां खो गई. लगता था कि सिस्टम हावी होने लगा है. जब सत्ता के खिलाफ कुछ तीखा लिखता तो आलोक जी का लिखना कहीं ना कहीं किसी कोने में पड़ा रहता. लगता कि जो जॉर्ज, चंद्रास्वामी जैसे लोगों के इतने करीब होकर भी उनकी बखिया उधेड़ सकता है, वो कितना कलेजा रखता होगा. खुद से पूछता कि क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ? जाने अनजाने में यह शख्स आत्मा के स्तर पर इतना गहरे उतर गया कि पता ही नहीं चला.

लखनऊ में वैसे भी सत्ता के खिलाफ लिखने का चलन नहीं है. सत्ता पुचकार कर, धमकाकर या किसी और भी तरीके से अपना पालतू बना ही लेती है. ऐसे में जब में वीकएंड टाइम्स में सत्ता के खिलाफ कुछ तीखा लिखता तो मेरे कुछ मित्र, जिनका पत्रकारिता से कोई सीधा वास्ता नहीं हैं, मुझे समझाते. तब मैं उन्हें आलोक जी के कई लेख और किस्से उन्हें बताता और कहता कि पत्रकारिता ऐसे ही होती है.

आलोक जी से पहला वास्ता तब पड़ा, जब उन्होंने रोहित शेखर की खबर डेटलाइन पर दी. तब एनडी तिवारी दस जनपथ के इतने खिलाफ नहीं थे. मैंने सोचा कि सब अखवारों में यह खबर जरूर छपेगी पर सब जगह खबर गायब. तब मैंने तय किया कि पहले पूरे पेज पर यह खबर छापी जाये. पत्रकारिता का नियम भी था और नैतिकता का तकाजा भी कि छापने से पहले आलोक जी से पूछना चहिए. मगर लगा कि अगर उन्होंने मना कर दिया तो एक दमदार स्टोरी हाथ से निकल जाएगी. लिहाजा बिना उनसे पूछे पहले पूरे पेज पर उनके नाम से खबर छाप दी. अख़बार छापने के बाद उन्हें फ़ोन किया. यह उनसे पहला संवाद होने वाला था. मन ही मन तैयार था कुछ बुरा सुनने को भी. मेरी बात सुनने के बाद जवाब आया नहीं यार पत्रकारिता के लिए क्या बुरा मानना. जब उन्हें अखबार स्पीड पोस्ट से मिला तो फिर उनका फ़ोन आया कि बहुत अच्छा अखबार निकला है. उसके बाद दो-तीन बार फिर तारीफ की कुछ अच्छे अंक की. उनसे मिलने का बहुत मन था पर मिलने-मिलाने में थोडा संकोची हूँ तो यह टलता रहा. पर यह नहीं सोचा था कि उनसे मुलाकात अब कभी ना हो सकेगी.

अब तो यह मानने को भी मन तैयार नहीं हो रहा कि मृत्यु हमेशा एक उत्सव हैं. अगर हो भी तो हम सब कहते कि यह उत्सव हम बाद में मना लेंगे. अभी हमें आलोक जी की वही आग चहिए. कृष्ण ने भले ही अर्जुन को महाभारत में आत्मा का कितना ही ज्ञान दिया हो पर अभिमन्यु के मृत शरीर को देख कर उसे भी लगा होगा कि अभी हमारे अपने और हमारे पास रहते तो ज्यादा अच्छा होता. काश आलोक जी भी अभी हमारे साथ ही होते.

लेखक संजय शर्मा वीकएंड टाइम्‍स, लखनऊ के संपादक हैं.

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0 Comments

  1. Mohan

    April 5, 2011 at 12:15 pm

    dear sir, please send ur articles on Osho.

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