साहित्य कूड़ेदान नहीं है : संजीव

अभिज्ञात के कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का लोकार्पण अवसर पर बाएं से आलोचक अरुण माहेश्वरी, भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और आलोचक डा.विजय बहादुर सिंह, पत्रकार व कथाकार अभिज्ञात, कथाकार और हंस के कार्यकारी सम्पादक संजीव, बंगला कवि अर्धेन्दु चक्रवर्ती और उपन्यासकार-आलोचक हितेन्द्र पटेल
अभिज्ञात के कहानी संग्रह ‘तीसरी बीवी’ का लोकार्पण अवसर पर बाएं से आलोचक अरुण माहेश्वरी, भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और आलोचक डा.विजय बहादुर सिंह, पत्रकार व कथाकार अभिज्ञात, कथाकार और हंस के कार्यकारी सम्पादक संजीव, बंगला कवि अर्धेन्दु चक्रवर्ती और उपन्यासकार-आलोचक हितेन्द्र पटेल

: लेखन में अगर उदात्तता नहीं है तो समझिए साहित्य की शर्त पूरी नहीं होती :

कथाकार व ‘हंस’ के कार्यकारी संपादक संजीव ने कोलकाता में अभिज्ञात के कहानी संग्रह ‘तीसरी बीवी’ का लोकार्पण किया। भारतीय भाषा परिषद सभागार में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए संजीव ने कहा कि मैंने अभिज्ञात की कहानियों के जो पारिवारिक दायरे हैं, उनमें द्वंद्व के नये क्षेत्र, आस्था के नये बिन्दु हैं। उन्होंने समकालीन कथासंसार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे धन्य हैं जो प्रयोग के लिए प्रयोग और कला के कला का सहारा लेते हैं। पुनरुत्थानवाद फिर आ गया है जिसके परचम लहराये जा रहे हैं। नये कथाकारों की फौज़ आयी है। भाषा के एक से एक सुन्दर प्रयोग हो रहे हैं। अगर अपनी आत्ममुग्धता को सम्भाल लें तो बहुत है।

संजीव के मुताबिक मेरे पास हंस में प्रकाशनार्थ रोज दस से बाहर कहानियां आती हैं। भूमंडलीकरण का प्रकोप मुझ पर भी पड़ा है और कनाडा से लेकर स्पेन तक से फ़ोन आते हैं कि मुझे बताइये मेरी कहानी क्यों नहीं छपेगी। मैं विनम्र निवेदन करता हूं कि साहित्य कूड़ेदान नहीं है। इसमें युयुत्सा व घृणा के लिए जगह नहीं है। मैं कहता हूं साहित्य की शर्त पर आओ। लोग पूछते हैं तो शर्त बतायें क्या शर्त है साहित्य की। मैं कहता हूं- एक ही शर्त है साहित्य की, वह है उदात्तता। वह नहीं है तो शर्त पूरी नहीं होती। अभिज्ञात ने धीमे अन्दाज में उधर कदम बढ़ाये हैं। क्रेज़ी फ़ैण्टेसी की दुनिया, मनुष्य और मत्स्यकन्या, देहदान जैसी कहानियां बिल्कुल निराले अन्दाज़ की कहानियां हैं। देहदान कहानी में लाश को टुकड़े-टुकड़े काटकर बेच दिया जाता है और बता दिया जाता है कि लाश को चूहे खा गये।

संजीव ने कहा कि दलित, नारी, शोषण तक कहानी का दायरा सिमटा हुआ था। अभिज्ञात ने दायरे का विस्तार किया है। आस्मां और भी हैं। उनसे मुक्त नहीं हो सकते। पीछे मुड़ के मत देखिये। द्वंद्व, आस्था के नये दिगंत खोले हैं। नये अनछुए दिगंत खोले हैं। कहानी में बिम्ब कैसे बनते हैं और किस प्रकार के निर्वाह से वे अलंकरण नहीं रह जाते इसका निर्वाह बड़ी कला है। इससे भाषिक संरचनाएं दीर्घजीवी हो जाती हैं। अभिज्ञात जी ने विज्ञान को लेकर मिथ बनाया है। कैसे मिथ बनता है यह उनकी कहानी में देखने लायक है। संजीव ने कार्यक्रम के दूसरे चरण में अपनी रचना प्रक्रिया, अपने जीवन अनुभव व प्रेरक तत्वों की खुलकर चर्चा की और श्रोताओं के सवालों की जवाब भी दिये। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ बंगला कवि अर्धेन्दु चक्रवर्ती ने की। कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत हितेन्द्र पटेल के वक्तव्य से हुई। उन्होंने तीसरी बीवी की कहानियों पर कहा कि अभिज्ञात कई बार असुरक्षित परिवेश में रह रहे लोगों की ज़िन्दगी से अपनी कहानियां एक संवेदनशील तरीके से उठाते हैं। ‘उसके बारे में’ कहानी ऐसी ही कहानी है जिसमें दर्द के रिश्ते की शिनाख्त की गयी है। असुरक्षित होते लोगों की बेचैन कहानियां ऐसी हैं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होनी चाहिए। जबकि ‘क्रेजी फैंटेसी की दुनिया’ इससे भिन्न एक क्लासिक फलक वाली है। इन कहानियों में वह तत्व है जिसे निर्मल वर्मा के शब्दों में ‘मनुष्य से ऊपर उठने का साहस’ कहा है।

जीवन सिंह ने कहा कि क्रैजी फैंटेसी की दुनिया में कहा गया है कि शासन बदलता है लेकिन तंत्र नहीं बदलता। यह वस्तुस्थिति की गहरी पड़ताल से उन्होंने जांचा परखा है। लेखक जिन स्थितियों में जी रहा है उससे लिखने की रसद कैसे प्राप्त करता है उसका उदाहरण कायाकल्प जैसी कहानियां हैं। अभिज्ञात की ‘जश्न’ जैसी कहानियों में एक विद्रोह है, जो थमना नहीं चाहता है, नजरुल की तरह-‘आमी विद्रोही रणक्रांत’। अरुण माहेश्वरी ने कहा कि ‘तीसरी बीवी’ संग्रह की कहानियां पढ़कर राजकमल चौधरी की याद आती है। इन्हें पढ़कर एक गहरा व्यर्थताबोध, डिप्रेशन पैदा होता है। सब कुछ व्यर्थ, कुछ भी सकारात्मक नहीं है। कुछ कहने की इच्छा न हो तो बस कच्चा माल इकट्ठा होता रहता है। हिन्दी कहानी परिपक्व हो चुकी है। उदय प्रकाश जैसे कुछ कथाकार हैं जिन्होंने अछूते कोणों को छुआ है।

Comments on “साहित्य कूड़ेदान नहीं है : संजीव

  • radheshyam says:

    i do not know what Mr. sanjeev told on that day and that occasion, but if it is the same what has been reported, in that case forget Ram Charit Manas, forget Mahabharat and forget most of the great plays of shakespear and read only Sanjeev’s short stories because all those epics are based on hatred an blood bath .Sanjeevs stories are timeless and immortal and washed from the Gangotari.

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