पोलिटिकली करेक्ट होने की परवाह नहीं करती : अलका सक्सेना

इंटरव्यू : अलका सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार और सुप्रसिद्ध एंकर : बेबाक हूं, जो सोचती हूं कह देती हूं : पत्रकारिता के 24 साल के इस लम्बे अनुभव में मैंने पाया कि सब उतने खुशकिस्मत नहीं होते जितना मैं रही :  समाज की एक मानसिकता है लड़कियों को लेकर जो पत्रकारिता में भी है, तब ज्यादा थी, आज बहुत कम है :  एसपी सिंह की एक चिट्ठी मैंने संभाल कर रखी है अब तक :  फ्रस्ट्रेशन के दौर आए लेकिन मैं भी जिद पर अड़ गई थी : एं‌कर की कुर्सी पर बैठती हूं तो उस समय मैं जनता की तरह होती हूं : छोटी गलियों से निकल कर आप मंजिल पर पहुंच तो जाते हो लेकिन उन गलियों में गंदगी बहुत होती है :  अभी भी बड़े एसाइनमेंट से पहले कुछ सेकेंड्स के लिए धड़कनें तेज हो जाती हैं : समझदार दर्शक जज कर लेता है कि एंकर जर्नलिस्ट है या फिर केवल एक चेहरा :


पत्रकारिता का एक परिचित और जाना-माना नाम। पिछले 24 वर्षों से पत्रकारिता की मुख्य धारा में सक्रिय। लड़ते-भिड़ते, संघर्ष करते, जूझते पत्रकारिता में वह मुकाम बनाया, जो किसी भी पत्रकार की तमन्ना होती है। उदयन शर्मा और एसपी सिंह जैसे मीडिया के दिग्गजों के सानिध्य में अपनी कलम को धार और तेवर देने वाली अलका ने महिला होने के बावजूद पुरुषों की इस दुनिया में हर मुश्किल को चुनौती के रूप में स्वीकारा और जो ठाना, उसे हासिल कर दिखाया। प्रिंट रहा हो या इलेक्ट्रानिक, अलका ने जो कुछ पाया, वह अपनी प्रतिभा और कठिन मेहनत के बल पर। भड़ास4मीडिया की तरफ से पूनम मिश्रा ने अलका सक्सेना से उनके जीवन व करियर को लेकर काफी बातचीत की। अलका ने कई राज की बातें बताईँ तो कई घटनाक्रमों की सच्चाई को बेबाकी से स्वीकार किया। पेश है उनसे बातचीत के अंश-

अलका सक्सेना से बातचीत करतीं भड़ास4मीडिया रिपोर्टर पूनम मिश्रा

  • सबसे पहले आप अपने बचपन और पढ़ाई-लिखाई के बारे में बताएं?

जब मैं तीन साल की थी, तभी मेरी फेमिली दिल्ली में शिफ्ट हो गई। यहीं पर मेरी पढ़ाई-लिखाई हुई। मेरे घर का माहौल बहुत कन्वेंशनल, ट्रेडीशनल, कल्चरल और पढ़ने-लिखने वाला था। घर में फिल्म देखने जाने की या फिर गाना गाने-सुनने की सख्त मनाही थी। उस समय हमारे घर में रेडियो हुआ करता था जिस पर हमें सिर्फ दो-तीन प्रोग्राम सुनने की इजाजत थी। एक न्यूज, दूसरा हवा महल और तीसरा इंस्पेक्टर ईगल। बस यही प्रोग्राम हम सुन सकते थे। सिनेमा हाल में जाकर फिल्म देखने की इजाजत नहीं थी । मैंने पहली बार मूवी हॉल तब देखा जब मैं कालेज के फर्स्ट इयर में आ गई। तब जाना कि अंदर से मूवी थियेटर कैसा दिखता है। ईमानदारी की बात यह है कि मैंने यह मूवी घर में बिना किसी को बताए देखी थी। एक दिन क्लास में केमिस्ट्री के सर नहीं आए और संयोग से हमें तीन पीरियड फ्री मिल गये, तब क्लास के कई स्टूडेंट्स मूवी देखने का प्रोग्राम बनाने लगे। कुछ डर तो लगा कि घर पर पता चल गया तो… लेकिन डरते-डरते हां कर दी। मैंने पहली फिल्म मैंने देखी थी, हरियाली और रास्ता, मार्निंग शो में।

  • पत्रकारिता के क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

अलका सक्सेनाबात उस समय की है जब मैं स्कूल में थी और छठें क्लास में पढ़ती थी। मेरे स्कूल में एक इंटर स्कूल डिबेट कम्पटीशन आयोजित किया गया जिसमें मैं फर्स्ट आई। इस प्रतियोगिता में एक जर्नलिस्ट फतह चंद्र शर्मा, जो नवभारत टाइम्स में काम करते थे, जज बनकर आये। उन्होंने खुश होकर मुझे गोद में उठा लिया और कहा कि आज इस बच्ची ने काफी अच्छा डिबेट किया है और मेरा बस चलता तो मैं सीनियर विंग में भी इसे ही एवार्ड देता। इतना कहकर उन्होंने अपनी जेब से निकालकर मुझे पचास रुपए दिए। उन दिनों पचास रुपए बहुत मायने रखते थे। स्कूल से जब मैं घर आई तो मां को पैसे दिए और कहा कि इसे मेरे गुल्लक में डाल देना। अगले दिन सुबह मम्मी ने मुझे बताया कि मेरा नाम अखबार में छपा है। उसके बाद मम्मी ने पापा को और घर में बाकी सबको भी बताया कि अलका का नाम नवभारत टाइम्स पेपर में छपा है। नवभारत के सिटी पेज पर छपी इस रिपोर्ट में इंटर स्कूल कम्पटीशन जीतने वालों के नाम छपे थे। इसे देखकर मैं बहुत हैरान हुई कि मेरा नाम अखबार में कैसे आ गया। फिर मैंने मां से पूछा कि क्या उज्जैन में जो हमारे मामाजी हैं, उन्होंने भी यह पढ़ लिया होगा, क्या जबलपुर की जो बुआजी हैं उन्होंने भी यह पढ़ लिया होगा, जो सहारनपुर की ताईजी हैं उन्होंने भी पढ़ लिया होगा… तो मेरी मां मेरी बातें सुनकर हां-हां करती रहीं। मुझे लगा कि यह तो चमत्कार जैसी बात हो गई कि मेरे स्कूल में जो पत्रकार आए थे उन्होंने जो लिखा वो सभी जगह पहुंच गया। उन दिनों छठी क्लास के बच्चे इतना अवेयर नहीं होते थे। न ही उस समय इनफॉरमेशन टेक्नालजी का जमाना था। इस घटना से मेरे मन में यह बात जम गई कि मैं भी बड़ी होकर कुछ ऐसा लिखूंगी जिसे मेरे सभी रिश्तेदार पढ़ लें। उस समय मेरी दुनिया घर और रिश्तेदारों तक ही सीमित थी। मेरी सोच सोच का दायरा भी रिश्तेदारों तक ही सीमित था। छुट्टी में घूमने जाने का मतलब रिश्तेदारों के घर जाकर धमाचौकड़ी मचाना होता था। बड़ी होने के साथ मैं यह सब भूल गई, लेकिन दिमाग में मैं खुद को एक ऐसा व्यक्ति बनते देखती थी जो कुछ भी लिखे तो उसके सारे रिश्तेदार पढ़ लें। मैंने ग्रेजुएशन के बाद जब पोस्ट ग्रेजुएशन शुरू किया तो मन में खयाल आया कि मुझे कुछ अपने लिए काम करना चाहिए, ताकि पॉकेट मनी आती रहे। फिर मैं रेडियो और टीवी में मैं फ्रीलांसर के तौर पर स्टूडेंट्स के लिए प्रोग्राम करने लगी। उन्हीं दिनों मैंने लिखना भी शुरू कर दिया। पोस्ट ग्रेजुएशन मैंने 1985 में किया और उससे थोड़ा पहले से मैंने लिखना शुरू कर दिया था। रविवार मैग्जीन में मुझे सहेली नाम के कॉलम में लिखने का काम मिला था। यह कॉलम महिलाओं की स्थिति पर आधारित था। मुझे याद है कि उन दिनों मैं अपने दोस्तों और क्लासमेट्स के बीच किसी हीरो की तरह थी क्योंकि मेरे लेख के साथ मेरा नाम छपता था। उन दिनों किसी अखबार या मैग्जीन में नाम छपना बहुत बड़ी बात होती थी। कालम के साथ तस्वीर नहीं छपती थीं। तस्वीरों का जीवन में महत्व तो बहुत बाद में आया। जब मैं जर्नलिज्म में आई तो ऐसा कुछ नहीं सोचा था कि मैं टीवी न्यूज टीम का हिस्सा बनूंगी। तब तो ये भी नहीं सोचा था कि ऐसे और इतने 24 घंटे के न्यूज चैनल हुआ करेंगे। बस पत्रकारिता के लिए जुनून था।

  • फ्रीलांसिंग के शुरुआती दिन कैसे गुजरे?

फ्रीलांस करने के दौरान शुरुआत में मुझे थोड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा था। जब मैं कोई एसाइनमेंट लेने किसी दफ्तर जाती तो लोग कहते कि यह बच्ची है, अभी पढ़ रही है। एसाइनमेंट के नाम पर कह देते कि जाओ बच्चों के पेज के लिए कुछ लिख लाओ। मैं सोच में पड़ जाती कि बच्चों के पेज के लिए क्या लिखूं। मेरा शुरू से झुकाव हार्ड न्यूज की तरफ था। मैं लिखकर ले जाती कि भारत में टीबी किस तरह साइलेंट डिजीज की तरह हर आय वर्ग को अपनी गिरफ्त में ले रही है… या इसी तरह के घनघोर रिसर्च आधारित आर्टिकल्स लेकिन मुझसे कहा जाता कि बच्चों पर महिलाओं पर कुछ क्यों नहीं लिखती, मसलन छोटे बच्चे जिद्दी हो जाएं तो कैसे उन्हें समझाएं, एक आदर्श बहू को ससुराल में सबका ध्यान कैसे रखना चाहिए… वगैरह।  एक बार जब मुझे बच्चों पर लिखने के लिए कहा गया तो मैंने बहुत सोचा और एक लेख लिख डाला। इस पर पाठकों की काफी चिट्ठियां आईं। मुझे याद है कि इसके बाद जब मैं नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर से मिलने गई तो उन्होंने मेरे उस लेख की तारीफ करते हुए कहा था कि तुम्हारा लेख काफी मेच्योर और अच्छा है। खिलौनों पर था वह लेख। इसमें मैंने लिखा था कि कैसे हमारे समाज की सोच का प्रभाव हमारे बच्चों के खिलौनों पर पड़ रहा है। पहले रुई भर के शेर के खिलौने बनाए जाते थे तो उनके मुंह काफी मासूम होते थे लेकिन आज खिलौनों की दुनिया समाज की सोच के साथ कुछ ऐसी बदल गई है कि अब अगर गुड़िया भी बनाते हैं तो वह इतनी मासूम नहीं लगती जितनी पहले लगा करती थी। यह लेख रविवारी मैग्जीन में करीब आधे पेज का छपा था। वरिष्ठ पत्रकार क्षमा शर्मा ने भी मेरे इस लेख की सराहना की थी। उन्हें आज भी वो लेख याद है और कभी मुलाकात होती है तो वो इसे मेंशन करना नहीं भूलतीं। इसके बाद लिखने और छपने का सिलसिला तेजी से चल निकला। देश के ज्यादातर नेशनल और करेंट अफेयर्स के न्यूज पेपरों-मैग्जीनों में छपने लगी थी। हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, दिनमान, रविवार में किसी न किसी विषय पर लिखती रहती थी और इसी दौरान रविवार में मेरा सेलेक्शन हो गया। पत्रकारिता की लंबी पारी की सिलसिलेवार शुरुआत यहीं से हुई।

  • आपने उदयन शर्मा और एसपी सिंह के साथ भी काम किया है। कुछ बताना चाहेंगी?

अलका सक्सेना और पूनम मिश्रापत्रकारिता के चौबीस साल के इस लम्बे अनुभव में मैंने पाया है कि सब उतने खुशकिस्मत नहीं होते जितना मैं रही। इस राह में मुझे बहुत अच्छे पत्रकारों के साथ काम करने और समझने का मौका मिला। करियर के पड़ावों पर गाइड की जरूरत होती है, जो केवल पत्रकारिता ही नहीं सिखाता बल्कि जिंदगी के फलसफों को भी समझाता है। इस राह में क्या-क्या खतरे हो सकते हैं, मैं किस तरह का काम कर सकती हूं, उसे पहचानने और बताने वाले बासेज मुझे मिले। उदयन शर्मा मेरे पिता समान थे। उनके साथ लम्बे अरसे तक काम करने का मौका मिला। एसपी सिंह के साथ काम किया। दोनों की अलग अलग खूबियां थीं और मैंने दोनों से बहुत कुछ सीखा। रविवार में धुंआधार रिपोर्टिंग की और दूसरे साल ही एक प्रतिष्ठित संगठन का बेस्ट यंग जर्नलिस्ट का एवार्ड भी मिला। खबर के लिए पैशन और उसको कवर करने के लिए लड़ जाना, भिड़ जाना, खबरों में जीने और खबरों को जीने के मेरे जुनून ने मुझे जल्दी पहचान बनाने का मौका दिया। रविवार के साथ मैंने संडे में भी काफी आर्टिकल लिखे। इसमें से एक मैंने अब तक संभाल रखा है। यह वह आटिर्कल है जिसमें मेरी बाइलाइन वीर सांघवी के साथ है, ‘अलका सक्सेना विथ वीर सांघवी’। यह बात करीब 1987 की है जब मैं सिटी रिपोर्टर थी और वीर सांघवी संडे मैग्जीन के एडिटर। यह स्टोरी सईद-मोदी मर्डर केस पर थी। एडिटर के साथ रिपोर्टर की बाइलाइन छपना गर्व की बात थी। वहां से संडे आब्जर्वर आ गई। हिंदी संडे आब्जर्वर में काम करते हुए यहां भी अंग्रेजी संडे आब्जर्वर अक्सर मेरी रिपोर्ट्स अपने यहां ले लेते थे।

  • आपका पहला आर्टिकल कब छपा और उस वक्त कैसा महसूस हुआ आपको?

1985 की बात है। मैं एमए के अंतिम वर्ष में थी। टीवी और रेडियो पर टाक शोज और साइंस क्विज में हिस्सा लेने जाती थी। कुछ अखबारों में मैं मिलकर आई थी और उसके बाद लेख भेजने का सिलसिला शुरू कर दिया था। जनसत्ता में भी लेख भेजा था। उस दिन मैं बहुत खुश हुई थी। रविवारी जनसत्ता में मेरा पहला लेख छपा था जिसे मैंने सम्भाल कर रखा है। मैंने आर्टिकल भेज दिया था। उसके बाद जो भी संडे आता तो मुझे लगता कि इस बार मेरा आर्टिकल जरूर छपा होगा। ऐसा करते दो-तीन रविवार गुजर गए। दो-तीन दिन बाद पता चला कि अगली बार आएगा। फीचर पेज के साथ ऐसा होना आम बात है। कुछ जरूरी आ जाने पर पहले का पेंडिंग में डाल दिया जाता है। हर संडे को मैं जल्दी उठती थी और जैसे ही अखबार वाला बाहर आवाज लगाता, तब सबसे पहले मैं पहुंचती और जल्दी-जल्दी अखबार पलटती थी। अपना आर्टिकल नहीं देख बहुत डिप्रेस हो जाया करती थी। ऐसा दो-तीन रविवार हुआ और अंत में तीसरी बार जाकर लेख छपा तो मैं बहुत खुश हुई। सोचने लगी कि मैं अब क्या करूं। जल्दी से भागकर बाहर गई और सोचा कि अखबार की कुछ और प्रतियां खरीद लूं ताकि यह लेख पढ़ने के लिए अपने साथ पढ़ रहे दूसरे स्टूडेंट्स को भी दूंगी। तब तक अखबार वाला जा चुका था।

  • प्रिंट छोड़कर इलेक्ट्रानिक मीडिया में कैसे आना हुआ?

करीब नौ साल तक मैं प्रिंट में रही। इसी बीच शादी हो चुकी थी और जब बेटा हुआ तो तय किया कि मेरे करियर से ज्यादा मेरे बेटे को मेरी जरूरत है। तीन साल के ब्रेक के बाद जब बेटा स्कूल जाने लगा तब मैंने पुनः पत्रकारिता की शुरुआत फ्रीलांसर के तौर पर की। संघर्ष के इस दौर ने बहुत कड़ी परीक्षा ली। समाज की एक मानसिकता है लड़कियों को लेकर जो पत्रकारिता में भी है, तब ज्यादा थी, आज बहुत कम है। वो ये है कि शादी हो गई, अब क्या काम करेगी। फिर बच्चा हो गया तब तो बिलकुल ही मान लेते हैं कि लड़की का करियर बस खत्म। उन दिनों हिंदी पत्रकारिता में खास तौर पर, यही स्थिति थी। नौकरी की बात तो दूर, अगर कोई एसाइनमेंट भी मांगने जाती थी तो ऐसे देखा जाता था जैसे मैं कोई अपराध कर रही हूं। फ्रस्ट्रेशन के दौर आए लेकिन मैंने भी जिद कर ली कि ऐसा सोचने वालों को फिर से दिखाना है कि घर-परिवार स्त्री को खत्म नहीं करता, उसे ये और मजबूत बनाता है। बहरहाल, लिखने-पढ़ने से जुड़ा जहां जो काम मिला, वो किया। तभी मैंने डाक्यूमेंट्री और शार्ट फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिखने का काम शुरू कर दिया। उन्हीं दिनों जाना कि कैमरा, टेप, लो-बैंड, हाई-बैंड और एडिटिंग मशीन का क्या मतलब होता है। फिर मैं दूरदर्शन, भोपाल के लिए एक साप्ताहिक प्रोग्राम बना रही थी, तो उन्हीं दिनों टीवी टुडे से मुझे प्रपोजल आया। 1995 में मैंने टीवी टुडे ज्वाइन कर लिया और आजतक के फाउंडर सदस्यों की लिस्ट में शुमार हो गई। करीब छह साल मई 2001 तक आजतक में रहने के बाद जी न्यूज में आ गई। ये बताने की जरूरत नहीं कि आज तक ने देश में टेलीविजन खबरों की परिभाषा ही बदल कर रख दी और मैं उस प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी, ये सोच कर खुशी तो होती ही है। आज तक का पहला करेंट अफेयर्स प्रोग्राम ‘साप्ताहिक आज तक’ मैंने ही प्रोड्यूस और एंकर किया। स्टूडियो में नेताओं को बुलाकर डिस्कशन करने का ये पहला करेंट अफेयर्स प्रोग्राम था। आज तक के दौरान रिपोर्टिंग और एंकरिंग के कई मुकाम मैंने हासिल किए और खुश हूं कि मेरे काम के लिए मुझे सराहा भी गया। एसपी सिंह की ऐसी ही एक चिट्ठी मैंने संभाल कर रखी है अब तक।

  • फिर आज तक से जी न्यूज कैसे आईं आप?

अलका सक्सेना

बस छह साल हो गए थे आज तक में। जी से बात चली तो और ज्यादा चैलेंजिंग लगी जिम्मेदारी। बस।

  • जी न्यूज छोड़कर आप जनमत और फिर जी न्यूज लौट आईं। कोई वजह?

उस समय जनमत एक नए कांसेप्ट पर काम कर रहा था, जहां शेखर सुमन, वीर सांघवी, राहुल देव और मैं सभी गेस्ट एंकर के तौर पर जुड़े हुए थे। अलग किस्म का कांसेप्ट था। मासेज के लिए नहीं लेकिन निश्चित तौर पर क्लासेज के लिए था। न्यूज चैनल ना होकर ये एक व्यूज चैनल था। समकालीन विषयों पर गरम गरम बहस। सप्ताह में मेरे चार शो हुआ करते थे। टीआरपी के लिए ये चैनल नहीं था लेकिन पालिसी मेकर्स के बीच काफी देखा जाता था और राजनीतिक हलकों में प्रोग्राम्स की अच्छी चर्चा होती थी। फिर जी में इसी तरह की भूमिका की बात आई तो मैं लौट आई।

  • पत्रकारिता से जुड़ने में परिवार का कितना समर्थन रहा?

शीला दीक्षित के हाथों पुरस्कृत होंती अलका सक्सेनाघर में पापा बिल्कुल इस पक्ष में नहीं थे कि मैं पत्रकार बनूं। उन्हें लगता था कि मैं कोई आफिसर बनूं तो अच्छा रहेगा। उन्हें लगता था कि इतना पढ़ने-लिखने के बाद जाने क्या करती है कि सुबह जाती है और शाम को आती है और तनख्वाह केवल 900 रुपए पाती है। उस समय मैं रिपोर्टिंग के लिए इधर-उधर भटका करती थी। जैसे कभी फूल वालों के साथ दिन बिता लिया कि वो कैसी जिंदगी जीते हैं। मैं ऐसी कई चीजों को खंगालती रहती और चप्पलें चटकाती रहती थी। इन्हीं सब पर मैं आर्टिकल लिखा करती थी। पापा मुझे लेकर काफी प्रोटेक्टिव थे और शाम के 6 से 7 बजे तक नहीं लौटती तो वो बस स्टॉप पर होते थे कि शायद मैं अगली बस से आऊं। घर में बड़े भाई ने मुझे काफी सपोर्ट दिया। उन्होंने ने न सिर्फ सपोर्ट किया बल्कि अक्सर मुझे गाईड भी किया करते थे और कहते थे कि अखबार के दफ्तर जाओ, लोगों से मिलो, ऐसे लिखो और लेख पब्लिश न हो तो दुखी मत होना क्योंकि शुरू-शुरू में ऐसा सबके साथ होता है।

  • पुराने दिनों की जब आपको याद आती है तो क्या सोचती हैं?

अभी हाल ही में घर शिफ्टिंग के दौरान मेरी नजर शादी के फोटोग्राफ पर पड़ी जिसमें मैंने देखा कि उस समय के सभी बड़े एडिटर मेरी शादी में उपस्थित थे। 1987 में मेरी शादी हुई थी। उन फोटोग्राफ को देख कर याद आ रहा था कि उन दो सालों तक मैं किस तरह झोला लटकाए, दो चोटी बांधे भटकती रहती थी। उन दिनों मैं सभी अखबारों के दफ्तर जाया करती थी और बड़े अधिकार से अखबारों के एडीटरों से बातें करती थी, मानों उनसे मिलना और न समझ में आ रहे विषयों पर पूछना मेरा अधिकार है और इनका कर्तव्य है कि ये लोग मुझे बताएं, समझाएं। और ऐसा हुआ भी। राजेंद्र माथुर जी के साथ मैंने काम नहीं किया लेकिन मैं अक्सर उनसे मिलने, खबरों पर बात करने नवभारत टाइम्स जाया करती थी। उन्होंने कभी भी मुझे बिना मेरे सवालों का जवाब दिए वापस नहीं भेजा। हरिवंश जी की याद आती है तो हंसी आ जाती है आज भी। रविवार में कलकत्ता में अपने ट्रेनिंग के दिनों में मैं कुछ दिन उनके घर परिवार के साथ रही। ऐसा उस वक्त नहीं लगा कि मेरी वजह से उनको या उनके परिवार को दिक्कत भी हो रही होगी। पूरे अधिकार के साथ रहती थी। बड़े बिंदास दिन थे।

  • आप जब एंकर की कुर्सी पर होती हैं तो उस समय आपके भीतर क्या चल रहा होता है?

अलका सक्सेनाजब मैं एं‌कर की कुर्सी पर बैठती हूं तो उस समय मैं जनता की तरह होती हूं और उस समय जनता जो चाहती है वह नहीं पूछा तो मुझे उस कुर्सी पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है। कई लोगों ने शिकायत की कि आप तो पहचान का लिहाज नहीं करती, अच्छी पहचान होते हुए भी ऐसे सवाल करती हैं तो मैं कहती हूं कि सारी जान-पहचान यहां से हटने के बाद है। और सच तो ये है कि पहचान वाली थ्यूरी मुझ पर फिट नहीं बैठती। अपने प्रोफेशन के बाहर, और खासतौर से नेताओं से दोस्ती के मामले में हमेशा से मेरी कोई श्रद्धा नहीं रही। कहीं मिलते हैं तो दुआ सलाम हो जाती है। बस इतना ही।

  • आपने जब पत्रकारिता की शुरुआत की और आज जो पत्रकारिता हो रही है, दोनों में क्या फर्क देखती हैं?

पत्रकारिता तब एक पेशे से ज्यादा एक पैशन और मिशन थी। आज का दौर अलग है। आज मीडिया में बहुत पैसा है। पहले  इतना पैसा नहीं हुआ करता था। टेलीविजन आने से बहुत-सी चीजे बदल गई हैं। टेलीविजन एक आडियो-विजुवल मीडियम है जो देखने और सुनने, दोनों मे अच्छा लगता है। यही कारण है कि उसके साथ खुद-ब-खुद ग्लैमर जुड़ गया है। मीडिया इंडस्ट्री एक बड़ा बिजनेस बन गया है। यहां बड़े इनवेस्टमेंट हैं तो बड़े खर्च भी। बडी अर्निंग के साथ जुड़े लोगों को तनख्वाह के रूप में बड़ी रकम दी जाती है। लेकिन यहां काम करना अखबार से कहीं ज्यादा मुश्किल है। एक अखबार को 24 घंटे में एक बार दूसरे अखबारों से कंपीट करना होता है वहीं टीवी न्यूज चैनल एक-दूसरे से हर मिनट कम्पीट कर रहे होते हैं। काम ज्यादा डिमांडिंग और चैलेंजिंग है। यहां ये जरूर कहना चाहूंगी कि प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया एक दूसरे के पूरक रहे। दोनों माध्यमों की अपनी-अपनी खासियत और मजबूरियां हैं जिन्हें समझना होगा। एक दूसरे को कोसने से कुछ हासिल नहीं होगा। और ऐसा नहीं है कि प्रिंट में बदलाव नहीं आया है इतने सालों में।

  • आजकल न्यूज के नाम पर चैनल भूत-प्रेत और हंसी के कार्यक्रम भी दिखाते हैं, क्यों?

भारतीय टीवी मीडिया अभी शुरुआती दिनों में है इसलिए आए दिन नए-नए एक्सपेरीमेंट हो रहे हैं। मीडिया के इस भटकाव का कारण बाजारवाद है, जिसका हल भी देर-सबेर निकल आयेगा। मैं यह नहीं कहूंगी कि आज से बीस साल पहले जो न्यूज की परिभाषा थी, वही होनी चाहिए। समय बदला है और इसमें न्यूज की परिभाषा भी बदली है। परिभाषा इस संदर्भ में कि अब दर्शक खबरों के साथ फिल्मों और सीरियल के बारे में भी जानना चाहता है। मुझे नहीं लगता कि न्यूज चैनलों के पास कन्टेट की कमी हो गई है इसलिए वे कुछ भी दिखाते रहते हैं। न्यूज चैनल में क्या दिखाना है और क्या नहीं, यह उस चैनल को चलाने वालों की इच्छा और उसकी एडिटोरियल पॉलिसी पर निर्भर करता है। जी न्यूज में कंटेंट की कोई कमी नहीं है। बिना नाम लिए कहना चाहूंगी कि कुछ न्यूज चैनल हंसी-ठहाकों वाले प्रोग्राम दिखाते हैं लेकिन जी न्यूज भूत-प्रेत, हंसी-ठहाकों जैसे किसी प्रोग्राम को नहीं दिखाता है। हां, हम फिल्म्स की दुनिया का एक प्रोग्राम दिखाते हैं जिसमें आने वाली फिल्मों और नए सीरियल की जानकारी होती है। यानि यह प्रोग्राम भी न्यूज ओरियेंटेड होता है। मैं समझती हूं कि चैनलों के लिए टीआरपी भी महत्वपूर्ण है क्योकि चैनल एक बिजनेस है, चैरिटी नहीं। पर ये नहीं होना चाहिए कि टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा। न्यूज की गरिमा का ध्यान भी रखा जाना चाहिए।

  • कई लोग टीवी एंकरों की गिनती जर्नलिस्ट के तौर पर नहीं करते?

यह बहुत बुरा है। मैं इस एट्टीटूयड से बिल्कुल सहमत नहीं हूं। मुझे पसंद नहीं कि कल लोग मुझे यह कहकर याद करें कि अलका सक्सेना एक एंकर थीं। मैं हमेशा ही एक वर्किंग जर्नलिस्ट हूं। बाई प्रोफेशन मैं जर्नलिस्ट थी और मैं जर्नलिस्ट रहूंगी। मैं एंकर भी हूं तो ये मेरे पत्रकार होने का ही एक एक्सटेंशन है। मैंने अपनी कैरियर की शुरुआत अखबार से की थी। एक दिन मैं एंकर बनूंगी और कैमरे पर हूंगी, यह सोचकर तो पत्रकारिता में कदम नहीं रखा था। एंकर बनना तो एक इत्तेफाक था।

  • पर कई महिला एंकरों का तो वास्तविक जर्नलिज्म से कोई साबका नहीं पड़ता?

मुझे लगता है कि इसे हम पूरे समाज से अलग करके नहीं आंक सकते क्योंकि आज भी स्त्री को खूबसूरती, आकर्षण और ग्लैमर से जोड़ कर देखा जाता है। यही कारण है कि लडकियों को न्यूज चैनलों में एंकर बनने का मौका लड़कों की अपेक्षा जल्दी मिल जाता है। जहां तक एंकरों के लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट पढने की बात है तो अब ऐसा नहीं है क्योंकि खबरों के दौरान बुहत सी लाइव खबरें आती रहती हैं। एंकर अच्छी-भली अपना बुलेटिन पढ रही है तभी अचानक कहीं ब्लास्ट की खबर आ जाती है तो उसे घटना की जानकारी व्यूवर को देनी पड़ती है। साथ ही रिपोर्टर से प्रश्न भी पूछने होते हैं। उसी में समझदार दर्शक यह आसानी से जज कर लेता है कि एंकर जर्नलिस्ट है या फिर केवल एक चेहरा।

  • क्या आज भी आप अपने काम को चैलेंज के तौर पर लेती हैं?

आज भी जब कभी नया एसाइनमेंट करने जाती हूं तो हमेशा की तरह जमकर तैयारी करती हूं। मुझे कहने में कोई शर्म नहीं की अभी भी बड़े एसाइनमेंट से पहले कुछ सेकेंड्स के लिए धड़कनें तेज हो जाती हैं। मुझे लगता है जिस दिन आपके मन में ये बात आ जाती है कि सब तो मालूम है, क्या पढ़ना है, क्या सुनना है, उस दिन आप सीखने की प्रक्रिया से कट जाते हैं। मेरे लिए आज भी हर एसाइनमेंट एक चैलेंज है। 1998 में आज तक ने दूरदर्शन के साथ मिलकर इस देश का पहला लाइव इलेक्शन टेलीकास्ट किया था जो 72 घंटों तक चला था। उन दिनों ईवीएम मशीनें नहीं होती थीं और काउंटिंग इतना ही टाइम लिया करती थी। मैंने वो एंकर किया था। तब से आज तक देश में जितने भी चुनाव हुए हैं, उन सबकी लाइव एंकरिंग करती आ रही हूं लेकिन आज भी मैं हर एसाइनमेंट को उतनी ही गंभीरता से लेती हूं।

  • मीडिया में भी आजकल लोग तुरंत उंचाइयां पा लेना चाहते हैं। आपने उस वक्त ऐसा नहीं सोचा?

अलका सक्सेनामेरी मां का हम भाई-बहनों पर बहुत ज्यादा असर है। जीवन जीने की शैली, संघर्षों में कैसे जीते हैं, कैसे पेट खाली हो और किसी के घर जाने पर वो बिस्किट की प्लेट बढाये तो लालच को कंट्रोल करके मुस्करा कर मना कर देना चाहिए!! बचपन में उन्होंने हमें बहुत सारी कहानियां और कविताएं सुना-सुना कर पाला है। हरिवंश राय बच्चन की एक कविता है जो मुझे आज भी याद है। बचपन में रट्टू तोते की तरह कविता याद करने में माहिर थे, लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते गये, कविताओं का अर्थ समझ में आने लगा। मां हमेशा कहा करती थी कि जीवन में कभी छोटे लालच में नहीं पड़ना। जीवन में हमेशा हाईवे पर चलना क्योंकि छोटी गलतियां रास्ता छोटा बनाती हैं। छोटी गलियों से निकल कर आप मंजिल पर पहुंच तो जाते हो लेकिन उन गलियों में गंदगी बहुत होती है। मंजिल पर देर से पहुंचना लेकिन साफ रास्ते से पहुंचना ताकि आपको वहां पहुंच कर गर्व हो सके। कभी मुझे भी ये बातें कचोटती थी कि मैं कितना स्ट्रगल कर रही हूं और फलां को तो बहुत जल्द प्रमोशन मिल गया। घर आकर जब मां से यह सब कहती तो वो हमेशा समझाती कि आंख बंद कर लो। चार-पांच साल बाद मैंने पाया कि जिन लोगों को प्रमोशन मिला, वो लोग कहीं नहीं थीं। तब जाना कि जीवन में सच बोलने का और ईमानदारी से रहने का फायदा होता है, भले ही तुरंत इससे नुकसान दिखे। मैंने क्या एचीव किया, ये भले ही न बता पाऊं लेकिन इतना जरूर कह सकती हूं कि बेबाक हूं, जो सोचती हूं कह देती हूं, पोलिटिकली करेक्ट होने की परवाह ना की है ना करूंगी।

  • बच्चन जी की कौन सी कविता आप कह रहीं थीं…?

मैं हूं उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़,

कभी न जो तज सकते अपना न्यायोचित अधिकार

कभी न जो सह सकते शीश नवा कर अत्याचार

एक अकेले हो या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़

मैं हूं उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़।

  • आपकी जिंदगी का सबसे दुखद दिन कौन-सा था?

अलका सक्सेनाजिस दिन मैंने अपनी मां को खोया, वो दिन मेरी जिंदगी का सबसे दुखद दिन था। मेरी मां हमारे परिवार की सबसे मजबूत स्तम्भ थीं। हम सभी को उनसे मानसिक ताकत मिलती थी। वह हमारे हर संघर्ष की ताकत थीं। तीन साल पहले एक दिन वे अचानक बीमार हुईं। उन्हें ओल्ड एज वाली कोई बीमारी नहीं थी। सिर्फ मामूली सा कोल्ड हुआ और वह नहीं रहीं। उनके जाने के बाद मेरी जिंदगी में एक खालीपन आ गया, जो अब तक नहीं भरा है। मां के जाने के बाद अहसास हुआ कि उनका होना कितनी बड़ी बात थी। सही कहा जाता है कि जब इंसान नहीं होता है तो उसकी कमी खलती है। उनके जाने के बाद ऐसा लगा कि वह हमारे बीच नहीं होकर भी हमेशा हैं। जिस दिन वह नहीं रही, उससे बुरा दिन मेरी जिंदगी में नहीं आया। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बोल पाऊंगी। वो सब याद कर अजीब-सा महसूस करती हूं।

  • आपका मनपसंद एक्टर और एक्ट्रेस कौन हैं?

मैं बहुत ज्यादा फिल्में नहीं देखती। अभी हाल में जो फिल्में देखी हैं वह हैं- ‘तारे जमीन पर’ और ‘गजनी’। इतफाक ये कि दोनों ही फिल्में आमिर खान की हैं। पुराने लोगों में मुझे गुरुदत्त और वहीदा रहमान पसंद हैं। उसके बाद स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह पसंद हैं। अभी के एक्टरों में मुझे आमिर खान पसंद आते हैं। मुझे लगता है कि वे बड़ी शिद्दत से काम करते हैं। यदि आप मुझसे आज की एक्ट्रेस के बार में अभी नाम जानना चाहेंगी तो मुझे सोचना पड़ेगा।  


इस इंटरव्यू पर अगर आप अपनी प्रतिक्रिया अलका सक्सेना तक पहुंचाना चाहते हैं तो उन्हें [email protected] पर मेल कर सकते हैं.

Comments on “पोलिटिकली करेक्ट होने की परवाह नहीं करती : अलका सक्सेना

  • saurabh varshney From chhata Diss.mathura U.P. says:

    alka g – pranaam. aap hum jaise yuva patrakaron ki prerna srrot hain. aapki anchoring ke dauran aapse bhut kuchh seekhne ko milata hai . aapko natvar nagar yogiraj bhagwan shri krishna ki pavan punit janm bhumi par saparivar sahit sadar aamantran.Thanks for publish this interview.

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  • adittya mishra d gorakhpuri says:

    nice interview…..i cant believ its a true story…because alka saxena is a busy lady…how can she give her time for this.;):D:D:)

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  • इतनी अच्छी हैं कि जब एमएचवन में आयीं थीं तो एक साथ बेेवजह 80 लोगों को चैनल से बाहर करने की साजिश की थी तांकि अपने लोगों को भर सकेें। लेकिन एक माह बाद इनकी ही कुंडली पलट गई।

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