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शिक्षा की ‘मंडी’ के खिलाफ महाभारत जरूरी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पहले से चले आ रहे पत्रकारिता के एक पाठ्यक्रम के समानान्तर एक और पाठ्यक्रम को मान्यता दिए जाने का विरोध हो रहा है। कुछ लोग मान्यता देने को सही ठहरा रहे हैं तो कुछ लोगों के गले नहीं उतर रहा कि ये कैसे हो सकता है? तकनीकि पहलुओं को छोड़ दें तो शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ यहां जो आंदोलन चल रहा है, उसका समर्थन उचित है। शिक्षण संस्थानों को मंडी बनने से रोकना होगा। ग्लैमर का चस्का देकर मोटी रकम वसूलकर उत्पाद पैदा करने वाले संस्थानों का विरोध करना होगा। यह शिक्षा के लिए बेहतर है और छात्र हित में है। ये संस्थान उत्पाद पैदा करने वाली फैक्ट्री बन गए हैं। इनसे सरोकार की उम्मीद बेमानी है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ न होने देने के लिए विरोध जरूरी है। क्यों जरूरी है, जानने के लिए आगे पढ़ें।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पहले से चले आ रहे पत्रकारिता के एक पाठ्यक्रम के समानान्तर एक और पाठ्यक्रम को मान्यता दिए जाने का विरोध हो रहा है। कुछ लोग मान्यता देने को सही ठहरा रहे हैं तो कुछ लोगों के गले नहीं उतर रहा कि ये कैसे हो सकता है? तकनीकि पहलुओं को छोड़ दें तो शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ यहां जो आंदोलन चल रहा है, उसका समर्थन उचित है। शिक्षण संस्थानों को मंडी बनने से रोकना होगा। ग्लैमर का चस्का देकर मोटी रकम वसूलकर उत्पाद पैदा करने वाले संस्थानों का विरोध करना होगा। यह शिक्षा के लिए बेहतर है और छात्र हित में है। ये संस्थान उत्पाद पैदा करने वाली फैक्ट्री बन गए हैं। इनसे सरोकार की उम्मीद बेमानी है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ न होने देने के लिए विरोध जरूरी है। क्यों जरूरी है, जानने के लिए आगे पढ़ें।

देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, पत्रकारिता विश्वविद्यालय, मुक्त विश्वविद्यालयों से पत्रकारिता का कोर्स करके हर साल हजार से ऊपर डिप्लोमा और डिग्रीधारी निकल रहे हैं। इसके अलावा बड़े शहरों में पत्रकारिता की डिग्री, डिप्लोमा देने वाले संस्थान गली-गली में खुल गए हैं। इन संस्थानों में छह महीने से साल भर के कोर्स के लिए डेढ़ से ढाई लाख रुपये से ऊपर लिए जाते हैं। दुख की बात ये है कि ज्यादातर संस्थानों में प्रिंट या इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारिता का इतिहास बताकर खानापूर्ति कर दी जाती है। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता की शिक्षा देने के लिए उनके पास बुनियादी संसाधन भी उपलब्ध नहीं है। आप अनुमान लगा सकते हैं कि देश में कितने (संख्या हजारों में) और किस गुणवत्ता के पत्रकारिता के डिग्रीधारी मीडिया संस्थानों में नौकरी के लिए आ रहे हैं।

किसी ने कहा था एक पत्रकार मरता है तो नए पत्रकार के लिए जगह खाली होती है। इसका तात्पर्य यही है कि इस क्षेत्र में बहुत कम जगह है। अब तो कई मीडिया संस्थान खुद पत्रकारिता की डिग्री, डिप्लोमा देने लगे हैं। वो सबसे पहले अपने यहां के छात्रों को नौकरी देते हैं। यानी बाकी शहरों से आने वाले पत्रकारिता छात्रों के लिए कई दरवाजे पहले से ही बंद हैं। एक नया न्यूज चैनल कितने लोगों को नौकरी दे सकता है ? अगर राष्ट्रीय स्तर का कोई नया न्यूज चैनल है तो ज्यादा से ज्यादा दो से ढाई सौ लोगों की जरूरत पड़ती है। उसमें ज्यादातर अनुभव वाले लोगों को ही लिया जाता है। नए लोगों को इन मीडिया संस्थानों में जगह पाने का अनुमान 10 फीसदी से ज्यादा नहीं है। लेकिन गली-गली में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये इन मीडिया संस्थानों को पत्रकारिता की शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों से कोई सरोकार नहीं है। बस लाखों रुपये लेकर अपनी झोली भरते हैं। वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं कराते। कहा जाता है मीडिया पढ़े-लिखों का क्षेत्र है लेकिन अब तो 10+2 के बाद ही पत्रकारिता का डिप्लोमा देने वाले संस्थानों की बाढ़ सी आ गई है। एंकर, रिपोर्टर और प्रोड्यूसर बनने का ख्वाब लेकर आने वाले ये लोग कहां फिट बैठेंगे ? ये मान्यता प्राप्त निजी संस्थान पत्रकारिता की व्यवहारिक शिक्षा देने की बजाय इस बात पर जोर देते हैं कि हर सत्र में मीडिया से जुड़ा कोई नाम एक दिन के लिए ही सही भाषण देने आ जाए। वो भी पैसा खाकर आता है चमक- दमक का बखान करता है और अंत में कह जाता है-मेहनत करोगे तो नौकरी जरूर मिलेगी। इस मेहनत का व्यवहारिक स्वरूप क्या हो कोई नहीं बताता।

मेरे  बारे में : मैं एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल से जुड़ा हूं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री लेकर नौकरी की तलाश में आज से पांच साल पहले दिल्ली आया । मेहनत करने की क्षमता और रुचि के कारण मेरे गुरुओं ने मुझे दिल्ली जाने का दबाव डाला था। मैं उन पत्रकारिता प्रशिक्षुओं की तरह था जिनका इस क्षेत्र में या कहें किसी भी क्षेत्र में ऊंचे ओहदे पर कोई नहीं था। सो संघर्ष करने के सिवाय कोई चारा नहीं था। तीन चार महीने के बाद यूएनआई में इंटर्नशिप करने का मौका मिला। एक महीने बाद दिल्ली ब्यूरो ईटीवी में इंटर्नशिप का मौका मिला। फिर सड़क पर गया। नौकरी की उम्मीद तो दूर-दूर तक नहीं थी। तीन-चार महीने के अंतराल के बाद एक बड़े मीडिया संस्थान में इंटर्नशिप का मौका मिला। उसी दौरान संयोग से वहां इंटरव्यू हुआ। इंटर्नशिप करते-करते इतनी जानकारी हो गई थी टेलीविजन में काम करना आसान लग रहा था यही नहीं कई तो मुझसे कम जानकारी वाले भी थे जिन्हें अच्छी सैलरी मिल रही थी। उम्मीद जगी कि इंटरव्यू में तो होना निश्चित है। इंटर्नशिप खत्म हुई। रिजल्ट के इंतजार में छह महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया। इस बीच लगता था किसी भी दिन फोन आ जाएगा और  कहा जाएगा आपकी नौकरी लग गई आकर ज्वाइन कर लीजिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। काफी इंतजार के बाद फिर एक नए मीडिया संस्थान में अवैतनिक काम करने का मौका मिला। कहा गया था कि अगर आप अच्छा काम करेंगे तो नौकरी मिल सकती है। अब तक ऐसी स्थिति में आ गया था कि बुलेटिन निकाल सकता था, प्रोग्राम प्रोड्यूस कर सकता था। इतनी बड़ी जिम्मेदारी के बाद भी नौकरी नहीं थी। घर से पैसे मंगाकर दिल्ली में रहकर दूसरे के लिए काम कर रहा था और हमारी मेहनत से वो अपनी झोली भर रहा था।

13 महीने तक अनवरत सेवा देने के बाद इस संस्थान में मुझे नौकरी मिल गई। यहां काम करते हुए मुझे वेतन कितना मिल रहा था ये नहीं बताऊंगा क्योंकि आप भी शरमा जाएंगे। यानि दो साल तक काफी दिक्कतें उठाने के बाद जाकर नौकरी मिली थी। आर्थिक रूप से कितनी परेशानी हुई इसका जिक्र करने का कोई मतलब नहीं है। मानसिक रूप से कितना परेशान हो गया था खुद के बल पर नौकरी तलासेंगे तो पता चलेगा। मेरी सलाह है कि लगन और रुचि हो और आज के महौल में इससे ज्यादा मुसीबत मोल लेने की हिम्मत हो तो पत्रकारिता के पेशे में आएं।

मैने पांच हजार रुपये फीस में विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की थी। यहां पैसे से नहीं बल्कि उन लोगों को प्रवेश मिला था जो कड़ी प्रवेश परीक्षा पास करके आए थे। उनमें मेहनत करने की क्षमता थी पत्रकारिता का जज्बा था। यहां अमीर और गरीब दोनों ही पृष्ठभूमि के छात्र थे। यह मंडी नहीं बल्कि वास्तविक अर्थों में एक शिक्षण संस्थान था, शायद अब भी है।


लेखक संतोष कुमार राय इ.वि.वि. पत्रकारिता विभाग के छात्र रहे हैं और इन दिनों एक नेशनल न्यूज चैनल में कार्यरत हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।
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