जागरण-भास्कर क्या जानें जर्नलिज्म

गांधी जी की एक तस्वीरसीख सखो तो गांधीजी से सीखो : महात्मा गांधी को हम सब राजनैतिक विरोधों और प्रतिरोधों के बावजूद, विवादों और प्रतिवादों के बावजूद श्रद्धा का एक अप्रतिम स्थान दिए हुए हैं। देश को आजादी दिलवाने में जो भूमिका निभाई और अहिंसा का जो मंत्र पूरी मानवता को सौंपा, उसकी बराबरी कोई भी आधुनिक नारा या विचार नहीं कर सकता। गांधी जी पत्रकारिता का महत्व जानते थे। वे उस युग में थे जब टीवी और रेडियो तो नहीं ही थे, अखबार भी नाम मात्र के चलते थे और उनमें से भी ज्यादातर के मालिक अंग्रेज थे इसलिए उनकी विचारधारा भारत और भारतीयता के पक्ष में होना संभव नहीं था। इस दौर में महात्मा गांधी ने अखबार निकाले, कंपोजिंग हाथ से होती थी, फोटो छापना हो तो आधा दिन लगा कर ब्लॉक बनवाना पड़ता था, छापने की रोटरी मशीनें नहीं थीं, एक-एक कागज डाल कर फोटो कॉपी की तरह छपा करते थे।

आज जब माडर्न दौर है, सेटेलाइट से पन्ने के पन्ने पूरी दुनिया के किसी भी महाद्वीप पर एक पल में भेजे जा सकते हैं, भारत में कई अखबार करोड़ों की पाठक संख्या होने का दावा करते हैं और इन पाठकों को आम तौर पर वही पढ़ना पड़ता है जो मालिक चाहते हैं और पाठकों की इसी फौज की आड़ में मालिक खबरें भी बेचते हैं, चीनी भी बेचते हैं, शराब भी बेचते हैं, नमक भी बेचते हैं, रिश्वत खिला कर खुद को भी बेचते हैं, गांधी जी की बहुत याद आती है। गांधीजी की पत्रकारिता एक इरादे को लेकर थी और वह इरादा देश की आजादी का इरादा था। मीडिया की ताकत का एहसास गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका में कुछ ही महीने रहने के बाद हो गया था और पत्रकारिता की शुरुआत बैरिस्टर गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के अखबारों को संपादक के नाम पत्र लिख कर की थी। अफ्रीका में उस समय का लोकप्रिय अखबार था ‘टाइम्स ऑफ नाटाल’। 25 अक्तूर 1894 को गांधी जी ने इस अखबार को इसके एक भारत विरोधी संपादकीय के जवाब में पत्र लिखा था।

गांधी जी ने लिखा था- ”आप ब्रिटिश लोग किसी भारतीय या अफ्रीकी को किसी भी हाल में मताधिकार का पवित्र इस्तेमाल नहीं करने देंगे क्योंकि वे काले हैं। हो सकता है कि आपकी गोरी चमड़ी के भीतर जहर भरा हो और आप ऐसा करके अपने उसी धर्म का अपमान कर रहे हैं जिसे आप ईसाईयत कहते हैं।” गांधी जी ने लिखा था – ”आप यह समझ लें कि यह ईसाईयत ईसा की नहीं है। श्रीमान, क्या मैं आपको एक सलाह दे सकता हूं? आप रंग के आधार पर इस उपनिवेश में भेदभाव करना छोड़ दें और सर्वश्रेष्ठ ब्रिटिश परंपराओं के आधार पर बाइबल की शिक्षा का पालन करें जो सबको बराबर मानती है। मैं अपना लिखा वापस भी ले लूं लेकिन जिस दिन आपके इस विचार के अनुयायी बढ़ जाएंगे, वह ब्रिटेन और भारत दोनों के लिए बहुत दुर्भाग्यशाली दिन होगा।”

गांधी जी ऐसे ही पत्र लिखते रहे। कुछ छपे और कुछ नहीं छपे। एक दशक तक अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई लड़ने के बाद गांधी जी को लगा कि उन्हें अपना अखबार निकालना चाहिए। उन्होंने ‘इंडियन ओपिनियन’ नाम का अखबार दक्षिण अफ्रीका से जून 1903 में शुरू किया। पहले ही अंक में पहले ही पन्ने पर ऐलान था कि अखबार में कोई विज्ञापन नहीं छपेगा और अखबार किसी भी खबर के बदले पैसा नहीं लेगा। पता नहीं आज देश में जागरण कर रहे और पैकेज पत्रकारिता का अविष्कार करने वालों को यह पता है या नहीं। गांधी जी ने अपील छापी थी कि अखबार पढ़ने के लिए चंदा दे और ग्राहक बनें। प्रसंगवश सत्याग्रह शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले इसी अखबार में किया गया था। यह अखबार ग्यारह साल चला और इसने इतना असर जमाया कि ब्रिटिश सरकार को दक्षिण अफ्रीका में भारतीय विरोधी कई कानून बदलने पड़े।

आज लाखों की संख्या में दर्जनों संस्करण निकालने वाले कितने अखबार हैं जिनकी हिम्मत हो कि वे मुख्यमंत्री तो छोड़िए, एक जिला कलेक्टर के सामने खड़े हो जाए। उत्तर प्रदेश के एक अखबार ने हाल ही में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाई थी तो उसके मालिक का सामान घर से बाहर फेंक दिया गया और अभिव्यक्ति की आजादी के तथाकथित पक्षधरों में से कोई नहीं बोला।

गांधी जी ने चालीस साल में छह अखबारों का संपादन किया। इनमें से हरिजन और नवजीवन छोड़ कर बाकी कोई दस हजार से ज्यादा नहीं बिकता था। मगर यह संपादक के तौर पर गांधी जी के आत्मबल का ही नतीजा था कि वह ब्रिटिश सरकार जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था, इन अखबारों से डरती थी। इतना ही नहीं, देश भर में चल रहे आंदोलनों में जहां जरा भी हिंसा आई, गांधी जी ने एक संपादकीय लिखा और पूरे देश में आंदोलन बंद हो गया। यह नैतिक शक्ति नेताओं और सत्ता के सामने गिड़गिड़ाने, घुटने टेकने और उनसे सौदेबाजी करने से नहीं आती। गांधी जी के कोई ऐसे संवाददाता नहीं थे जो खबरों के पैकेज बेचते हो। दरअसल गांधी जी स्वाधीनता संग्राम बनने के बीस साल पहले अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रतीक पत्रकार बन चुके थे। महात्मा गांधी न छल्लेदार अंग्रेजी लिखते थे और हिंदी तो खैर उनकी आधारभूत ही थी। मगर उन्होंने खुद लिखा था कि अखबार मेरे लिए व्यक्तित्व का एक दर्पण हैं और मैं पहले अपने आपको निहार लेता हूं फिर दूसरों पर नजर डालता हूं। इन ईमानदार शब्दों को आज के जमाने में याद दिलाने का पता नहीं किसी को कोई हक भी है या नहीं।

यह गांधी जी के भीतर का पत्रकार ही था कि उन्हें जब पता लगा कि बिहार के चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के साथ अत्याचार हो रहा है तो वे खुद वहां गए और सिर्फ पत्रकारिता के जरिए नहीं बल्कि खुद सत्याग्रह किया और जीत कर लौटे। इसी जीत ने उन्हें महात्मा बनाया था। गांधी जी को यंग इंडिया और नवजीवन एक साथ संपादित करने होते थे। पहले नवजीवन सिर्फ गुजराती में मासिक छपता था लेकिन अनुवाद हिंदी सहित सारी भाषाओं में होता था। बाद में नवजीवन दैनिक अखबार बन गया। अंग्रेजी में नेशनल हैराल्ड निकला मगर देश आजाद होते ही दोनों कांग्रेस के मुख पत्र बन गए और आज दिल्ली में करोड़ो रुपए की इमारत होने के बावजूद दोनों के पास कर्मचारियों को देने के लिए वेतन नहीं है।

जहां तक प्रेस की आजादी का सवाल है तो गांधी जी ने 1910 के प्रेस कानून को खत्म करने के लिए संघर्ष किया और आखिरकार ब्रिटिश सरकार को मजबूर किया कि इस कानून की तानाशाह धाराओं को बदला जाए। गांधी जी रोज लिखते थे और दिल से लिखते थे। 1932 की जनवरी में जब गांधी जी लंबे समय के लिए जेल गए तो ये अखबर बंद हो गए। 1933 और 1940 के बीच अंग्रेजी के हरिजन, गुजराती के हरिजन बंधु और हिंदी के हरिजन सेवक नाम के अखबरों की फाइलें पढ़ लीजिए, आज जिसे सामाजिक न्याय कहा जाता है, उसके सूत्र उसी में मिल जाएंगे। उस समय गांधी जी कहा करते थे कि अखबार तो धंधा नहीं बनना चाहिए। वे कहते थे ऐसा करने पर अखबार सरकार से डरने लगेंगे और सच्ची रिपोर्टिंग नहीं कर पाएंगे। 19 जून 1946 को अपनी प्रार्थनासभा में उन्होंने कहा कि अगर एक दिन के लिए उन्हें देश का वायसराय बना कर तानाशाह के अधिकार दे दिए जाए तो वे हरिजन छोड़ कर बाकी सब अखबार हमेशा के लिए बंद कर देंगे।

आज गांधी जी नहीं है। नवजीवन नाम के लिए रह गया है। आज भास्कर और जागरण हैं जो सरेआम खबरों का धंधा करते हैं। कानूनी जालसाजी करते हैं। सरकार के सामने दंडवत करते हैं। सरकारी अफसरों को दलाली खिलाते हैं। मंत्रियों की शिकायत पर संपादकों को बदल देते हैं। इन्हें गांधी का नाम लेने का कोई हक नहीं है। प्रसंगवश, गांधी जी की हत्या जिस नाथू राम गोडसे ने की आलोक तोमरवह भी एक अखबार का संपादक था। जाहिर है कि उसकी कलम में वह ताकत नहीं थी इसलिए उसे पिस्तौल उठानी पड़ी। आज की मीडिया और राजनीति में कई गोडसे हैं। किसी का नाम अंकुर हैं, किसी का अतुल। थोड़ा लिखा, बहुत समझना।

लेखक आलोक तोमर देश के जाने-माने पत्रकार हैं.

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Comments on “जागरण-भास्कर क्या जानें जर्नलिज्म

  • Dear Mr. Tomar, your bold and sharp, underlined and red lined article, unfortunately, is really going to fall on the deaf ears of both the media houses. I remember, one junior reporter was suspended in Jalandhar by the then news editor on the complaint of the Mayor. The reporter begged his pardon, he sent the message to the news editor and then he was reinstated. On one single fone call of the then Improvement Trust Chairman of Jalandhar, a senior reporter had to give a “maafinama” in the same paper. On the swearing in ceremony of Punjab Chief Minister PS Badal in 2007, the resident editor lashed every reporter for not getting the invitation letter to attend the ceremony, incidently the executive editor of the same paper was present in the ceremony. This is the level…Tomarji…they are dismal, unfortunate, and impossible people on earth. Anyway, hats off to your bold and loud voice!
    Rishi

    Reply
  • Tomar Sir, Aap ko shayad pata nahi hoga ki BHOPAL me National Herald or Navjivn ki jamin par VISHAL MEGAMART khada he.Haa itna jarur he ki is shandaar BUILDING ke uper in dono AKHBARO ( AB SAVRGIY) ke bord jarur lage he.In AKHBARO ke karmchariyo ne pichle saal apne bakaya vetan ko lekar BHOPAL ke M.P. Nagar thane me F.I.R. darj karayi thi or us par koi karyvahi na hone ke ke karan usi thane me jakar F.I.R. ki pahli varshgaath manayi thi.

    Reply
  • surender sharma says:

    dear tomar ji aapne sach me kam likha aur ham ise bhot hi samjenge.. aaj gandiji ki patkarita ki jarurat h. ye batg jarur h ki establising ke liye ad ki jarurat hoti h lekin content se samjota nahi karna chaiye..

    Reply
  • tomar sir.. main apke vicharo s bohot prabhavit hu.. main lucknow university
    s journlism ki padae kar rha hu ..par apke bebak alfaj kahi na kahi prerna dete hai free journlism ki …

    Reply
  • Amit Singh VIrat says:

    aalok tomar ji sabse pahle to aapko dhanyavad ki is vyaparik yug mein bhi aap apni kalam ki dhar banye huye hain. koi kya likhega tomar ji aapne colector ki baat ki log chaprasi se bhi darte haii yeh baat main isliye kar raha hoon kyonki main ek patrakar hoon main jaanta hoon ki agar kalam ki dhar tez ho jati hai to turant duniya bharki cheeje yaad dilai jati hain. sopport karne ke bajay bataya jata hai ab wo zamana chala gaya. lekin aap jaise logon ko padkar hausla bana rahta hai varna ab kya hai patrakarita kaun hai patrakar. paisa to pehle bhi tha nahin patrikarita mein aur samman ko dalalon ne girvi rakh diya . aese aap jaise logon ke lekh padkar thoda hausla bandhta hai nahi to hum jaise nae patrakaron ke patrakarita padosi ki khoobsoorat bibi ki tarah hai.

    Reply
  • braj kishore singh,hajipur, vaishali says:

    वर्तमान समय के अखबार जनता को जागरूक करने के लिए नहीं चलाये जा रहे वे ख़बरों का धंधा करते हैं और धंधा तो धंधा होता है भले ही गन्दा हो.जब उद्देश्य ही बदल गए हैं तब फिर आप कैसे उनसे गंधियुगिन आदर्शों के पालन की उम्मीद कर सकते हैं.

    Reply
  • SHAILENDER SEHGAL says:

    Dear Tomer, Maine aapka lekh padha hai. Wakayee Akhbaaron ko to ek hathyar kee tarah istemaal kya ja raha hai media to Gandhari ka role kar raha hai our kahin kahin to Shikhandi bana bhi nazar ata hai. Aaj ka khuda Bana yeh media agar kisi se dara hai to advertiser se kyonki yeh khud vygyapan ke makkarjaal main phansa hua hai

    Reply
  • SHAILENDER SEHGAL says:

    Dear Tomer, Aaj ke kuchh akhbaar to hathyar ki tarh istemal ho rahe hain kahin to media Gandhari bana dikhta hai to kahin Shikhandi ke roop main drishtygochar hota hai. Vygyapano ke Makkarjaal main Phansa media ab bharose ke kabil nahin raha. Note vote TRP our circulation ke chakarvyuh main sach ka Dum ghut raha hai.Taqat hathyana our taqat dikhana hi samrath ka ek sutry karyakarm reh gya hai.Inke eham ko thes lag jaye to sab tabah karne par utaru! Shailender Sehgal Editor AVTAR KESARI JALANDHAR .98786-93516

    Reply
  • hariom dwivedi says:

    are sirji kaha enko kaha aap gandhiji ke sath jod rahe hain bhai jara enki utpatti ke bare me dhyan dijiyega jo shayad aap jante hain enki niyat ka pata chal jayega,,,,,
    apka lekh vicharniy prashn hai.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.