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वीओआई : अमित सिन्हा के साथ धोखा हुआ?

[caption id="attachment_15723" align="alignleft"]अमित सिन्हा : उलटी पड़ गईं सब तदबीरें....अमित सिन्हा : उलटी पड़ गईं सब तदबीरें….[/caption]मई महीने में जब अमित सिन्हा ने वीओआई का कामधाम संभाला था तो वे पूरे उत्साह में थे। एक संकटग्रस्त चैनल को रिवाइव करने की चुनौती उन्होंने स्वीकार की थी। समझौता और डील हुए बिना ही सिर्फ भरोसे के रिश्ते पर वे इस चैनल में पैसे लगाते चले गए। वीओआई का संचालन स्मूथ रखने के लिए चैनल के जिस भी हिस्से में आर्थिक संकट पैदा हुआ, उन्होंने अपनी तरफ से पैसा लगाया। कर्मचारियों की सेलरी से लेकर चैनल की ब्रांडिंग करने तक में उन्होंने करोड़ों रुपये खर्च किए। उन्होंने अपने पर्सनल रिश्ते के चलते विज्ञापन की दुनिया से करोड़ों रुपये वीओआई को विज्ञापन के रूप में दिलवाए। बीच में जब कर्मचारी तनख्वाह की मांग को लेकर चैनल बंद करते हुए हड़ताल पर चले गए तो उन्होंने मुंबई से ही लाखों रुपये का भुगतान कर्मचारियों के एकाउंट में करा दिया।

अमित सिन्हा : उलटी पड़ गईं सब तदबीरें....मई महीने में जब अमित सिन्हा ने वीओआई का कामधाम संभाला था तो वे पूरे उत्साह में थे। एक संकटग्रस्त चैनल को रिवाइव करने की चुनौती उन्होंने स्वीकार की थी। समझौता और डील हुए बिना ही सिर्फ भरोसे के रिश्ते पर वे इस चैनल में पैसे लगाते चले गए। वीओआई का संचालन स्मूथ रखने के लिए चैनल के जिस भी हिस्से में आर्थिक संकट पैदा हुआ, उन्होंने अपनी तरफ से पैसा लगाया। कर्मचारियों की सेलरी से लेकर चैनल की ब्रांडिंग करने तक में उन्होंने करोड़ों रुपये खर्च किए। उन्होंने अपने पर्सनल रिश्ते के चलते विज्ञापन की दुनिया से करोड़ों रुपये वीओआई को विज्ञापन के रूप में दिलवाए। बीच में जब कर्मचारी तनख्वाह की मांग को लेकर चैनल बंद करते हुए हड़ताल पर चले गए तो उन्होंने मुंबई से ही लाखों रुपये का भुगतान कर्मचारियों के एकाउंट में करा दिया।

यह सब करने के पीछे उन्हें भरोसा था कि मित्तल बंधु जो वचन दे चुके हैं, उसे निभाएंगे, चैनल के संचालन को लेकर समझौते पर दस्तखत करेंगे। पर जब भी समझौते पर दस्तखत करने की स्थिति आई, मित्तल बंधुओं ने कोई न कोई बहाना कर और समझौते में कोई न कोई कमी निकाल कर दस्तखत करने से इनकार किया। बातचीत चलती रही और उम्मीद कायम रही कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा, मित्तल बंधु दस्तखत कर देंगे। कुछ लोगों का कहना था कि समझौते पर दस्तखत करना मित्तल बंधुओं की मजबूरी है। वजह- जूम द्वारा वीओआई पर बकाया करोड़ों रुपये की वसूली के लिए कोर्ट से मुकदमे का जीत जाना। माना जा रहा था कि मालिकाना हक बदलने की उम्मीद से जूम के लोग भी निश्चिंत हो गए थे कि अगर चैनल चलता है तो उन्हें देर-सबरे अपना बकाया पैसा मिल जाएगा। पर मित्तल बंधु अपने वादे से मुकर गए और अमित सिन्हा को अधर में छोड़ दिया। कहने वाले कह रहे हैं कि अमित सिन्हा एक नए चैनल का लाइसेंस ले चुके हैं और वे अपना चैनल लांच करेंगे लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि डील न होने से सड़क पर आ चुके वीओआई के साढ़े पांच सौ कर्मचारियों का क्या होगा?

अमित सिन्हा मूलतः एक पत्रकार रहे हैं। वर्ष 1991 में जब राष्ट्रीय सहारा लांच हुआ था, तब वे सहारा का करेस्पांडेंट बनकर मुंबई गए थे। बाद में राहुल देव ने उन्हें जनसत्ता में बुला लिया। पांच साल बाद सन 97 में उन्होंने मध्य प्रदेश के नवभारत ग्रुप के मुंबई संस्करण से जुड़ गए। नवभारत के बाद अमित ने खुद का काम शुरू किया और सर्चलाइट नाम से  एक विज्ञापन एजेंसी की स्थापना की। मीडिया के सभी सेक्शन- मार्केटिंग, ब्रांडिंग, रेवेन्यू, सेल्स, कंटेंट, डिस्ट्रीब्यूशन को समझने के बाद अमित एक दिन वीओआई के मालिकों से मिले और दोनों में चैनल चलाने को लेकर मौखिक सहमति हो गई। मित्तल बंधुओं की ओर से आंतरिक मेल जारी कर अमित सिन्हा को वीओआई का सीईओ और निदेशक बता दिया गया। मई महीने में वीओआई के सीईओ और निदेशक के रूप में जुड़े अमित सिन्हा करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद मित्तल बंधुओं के वादे से मुकरने के बाद अब इस चैनल से अलग हो चुके हैं। वीओआई के लोग कह रहे हैं कि अमित सिन्हा के साथ धोखा हुआ है। वीओआई कर्मी अमित सिन्हा की ईमानदारी, स्पष्टवादिता और कर्मचारी समर्थक रवैए की तारीफ करते हुए समझौता न होने के लिए मित्तल बंधुओं को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

अमित सिन्हा ने जब वीओआई ज्वाइन किया था तब बी4एम से अपने बारे में और वीओआई के बारे में विस्तार से बात की थी। अमित का विजन स्पष्ट था। उन्होंने अपने पांच महीने के कार्यकाल में दिखा दिया कि एक संकटग्रस्त चैनल को कैसे रिवाइव किया जा सकता है। लेकिन जब वीओआई के मालिकों मित्तल बंधुओं से लिखत-पढ़ते में हस्ताक्षर नहीं हो पाया तो उन्हें अब हटना पड़ा। सूत्रों का कहना है कि अमित सिन्हा और मित्तल बंधुओं के बीच डील पर दस्तखत करने को लेकर बातचीत एक बार पहले भी टूट गई थी लेकिन कर्मचारियों के हित को ध्यान में रखकर और ग्रुप एडिटर किशोर मालवीय के समझाने से अमित सिन्हा नरम पड़े और अपनी तरफ से एक बार फिर समझौते के लिए पहल की। पर दुर्भाग्य ने वीओआई का पीछा नहीं छोड़ा। समझौते पर हस्ताक्षर अंततः नहीं हो सका। 

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