पिछले साल जुलाई महीने में वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर नियुक्त किए गए जाने-माने पत्रकार अनिल चमड़िया को उनके पद से विश्वविद्यालय ने हटा दिया है. आधिकारिक कारण यह बताया गया है कि अनिल चमड़िया की नियुक्ति को विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव कौंसिल ने अपनी मंजूरी नहीं दी. सूत्रों के मुताबिक सिर्फ बीकाम की डिग्री होने के कारण अनिल चमड़िया की नियुक्ति पर एक्जीक्यूटिव कौंसिल में सवाल खड़ा किया गया. इसी वजह से उन्हें प्रोफेसर पद के लिए अपात्र माना गया. सूत्रों के मुताबिक अनिल चमड़िया इस अपमान के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.
अनिल के करीबी लोगों ने बताया कि जब विश्वविद्यालय के कर्ताधर्ताओं को अनिल चमड़िया के बारे में सब पता था तो फिर वे उन्हें ले ही क्यों आए. आप किसी को जोरशोर से ले आए और सात महीने बाद कह दिया कि आपके पास डिग्री ही नहीं है या फिर यह कि आप प्रोफेसर बनने लायक हैं ही नहीं. यह तो सरासर गलत है और अपमानित करने जैसा है. ज्ञात हो कि अनिल चमड़िया पत्रकारिता में करीब 25 वर्षों से सक्रिय हैं. जेपी मूवमेंट में शामिल रहे अनिल पिछड़ों को आरक्षण दिलाने वाले छात्र आंदोलन के नेता भी रहे. मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के बिहार के सचिव रहे. किसान और खेतिहर मजदूरों के आंदोलनों से करीब का नाता रहा.
देश के विभिन्न मीडिया हाउसों में सामाजिक मुद्दों पर बेलौस लेखन करने वाले अनिल चमड़िया जनसरोकार की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. अनिल भारतीय मीडिया में दलित पत्रकारों की मामूली मौजूदगी को लेकर बराबर चिंतित रहे हैं और इस मुद्दे पर सक्रिय लेखन करते रहे हैं. उनके वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद पर नियुक्ति का चौतरफा स्वागत किया गया था और इसे गुणवत्ता परक पत्रकारिता शिक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम करार दिया गया. पर सात महीने बाद ही विश्वविद्यालय ने उनकी नियुक्ति पर यू टर्न ले लिया.
अनिल चमड़िया को हटाए जाने को लेकर एक चर्चा यह है कि उनकी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय से अनिल चमड़िया के रिश्ते ठीक नहीं रह गए थे. शायद यही वजह है कि कुलपति ने एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक बुलवाकर चमड़िया की नियुक्ति को नाजायज ठहरा दिया और उन्हें कार्यमुक्त करा दिया. सूत्रों के मुताबिक पिछले दिनों दिल्ली में हुई एक्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक में चमड़िया के मुद्दे पर कमेटी के सदस्यों में जोरदार बहस भी हुई. कुछ लोग अनिल चमड़िया के पक्ष में थे. ये लोग अनिल चमड़िया के करियर और पत्रकारिता में योगदान को देखते हुए डिग्री व अन्य मानकों से छूट देने की वकालत कर रहे थे. पर बहुमत अनिल चमड़िया की नियुक्ति के खिलाफ था इसलिए तत्काल प्रभाव से उनकी नियुक्ति रद करने का प्रस्ताव पारित करा दिया गया.












shani singh
January 28, 2010 at 8:28 am
jis tarah se aapki niukti hui thi ushi tarah aapko university se nikal diya,
Chandan ( Freelancer Cine Editor,Patna)
January 28, 2010 at 8:34 am
university ke Mass Comm dprt. ke sath waha ke VC ka koi achh niyat nahi hai chhaye vo B.N. Jee ho ya Gopi nathan…..
Bari bat ye hai Joining ke samy ke Counsil kiya kar rahi thi.. jab unhe joining diya gaya… kiya ye VC ki koi jatiy Dushmani hai ya Anil Chamariya Jee se koi pura Dusmani to nahi… jiske karn VC ne inke career ke sath khelwar kiya… is university mai kai dasko se koi Proffecer nahi jana chahte seat khali hi rah jata hai…
ye university mai sirf Bhai bhatija bad hai hamesa panpa hai… yese kai Bhudheman kao yanha se jana para…. mera mana hai ki Anil Chamaria jee ko tatkal koi hard action lena chahiye….un kamiti per jo unki yogiyta per naukri nirast ki….
ACHHO KE SATH YAHI HOTA HAI AKSAR…UNHE BHI UNIVERSITY KE GADDARO KE SATH KIA HATH MILA CHAIYE… PATA NAHI….
रितेश
January 28, 2010 at 8:39 am
jis tarah ke baat Chandan ji ker rahe ho ush se to ye hi lagta hai , ki aap bhi???????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????????// ho
ritesh
January 28, 2010 at 8:52 am
चंदन जी आप अपनी जेनरल नौलेज सुधार लिजिए नियुक्ति के समय कौन्सिल ही नहीं थी और उनके लिए इतना सेन्तिमेंटल क्यों हो रहे हैं ,एसे लोगों को तो जना ही चाहिए और गए तो जाने दिजिए|
uday
January 28, 2010 at 8:57 am
anil ji jis dalit ki bat karte hai kabhi wah kahte hai obc hu kabhi st ban jate hai akhir hai kya.bat aaj gunwatta ki hai to kripa bhi ja sakte hai unka bhi pg sub ject me nahi hai aap ek kuntha grast hai aap ko 80 hajar milte the kitane garibo ko khana khilaya chillane se kuchh nahi hota jaise aap kahate hai vaise aap nahi hai aap ko kuchh logo ne chada diya ki aap mahan hai es galat fahmi me n rahe aap manan kare ki aap kitane layak hai ye kuntha se grasit soch band kare best of luck ghar me rahe aur lal salam karte rahe aap jaise dongi ka koi jarurat nahi hai
Chandan ( Freelancer Cine Editor,Patna)
January 28, 2010 at 3:55 pm
Ritesh Jee mujhe lagta hai ap Anil chamria Jee ko sahi trah se nahi jante….ya ap media se nahi jure hai..
Chandan ( Freelancer Cine Editor,Patna)
January 28, 2010 at 4:18 pm
DEAR
RITESH J KISHI ACHHE INSAN KESTH JURNE SE SENTIMENTAL AUTO HO JATA HAI…KIYA APME SENTIMENT NAHI HAI…KIYA AP APNE PERENTS SE SENIMANTAL NAHI RAHTE……ANIL JEE HAMARE SIR HAI OR NA JANE KITE DIGAJO KE GURU HONGE….. HUM OR AP TO KUCHH BHI NAHI HAI ….
OR HAI EC GALTI SE LIKHA GAYA……OR AP APNI JANKARI BADHAE…
नवीन कुमार"रणवीर"
January 28, 2010 at 4:20 pm
दोस्तों, वो लोग जो अनिल सर के साथ ऐसा होनें पर खुश हो रहे हैं, वो भी सुनें और जो उन्हें दारूबाज़ कह रहे हैं वो भी सुनें। पहली बात जो लोग अनिल सर को जानते नहीं हो वो आपनी चाटुकारिता भरी जुबान बंद रखे। जिनका कोई बैर है उनसे तो वो तार्किक लिखें, सामनें आकर लिखें। पत्रकारिता में जातिवाद का कितना बोलबाला है, उस सच्चाई को बाहर निकालनें में भी अनिल सर और योगेंद्र यादव जी का योगदान रहा है, तो ज़ाहिर सी बात है कि उन लोगों को अब भौंकनें का मौका तो मिला ही है, उनकी जैसी सोच वाले उनके पूर्वज वीसी (वीएन राय) नें काम ही कुछ ऐसा किया है। उनका गौरवांवित होना तो बनता है। रही बात पत्रकारिता में पीएचडी करनें वाले छात्रों के साथ न्याय की तो, अनिल चमड़िया अपनें आप में पत्रकारिता संस्थान है, किसी पीएचडी की डिग्री में इतना फिल्ड वर्क नहीं मिलेगा जितना इस शख्सियत में मिलेगा। चाटुकारिता और प्रो. लोगों के घर काम करके पीएचडी करनें वालों की संख्या कम नहीं मिलेगी इस देश में। अनिल सर की नियुक्ति किसी “चौरसिया चालिसा” की मौहताज़ नहीं है। आईआईएमसी में मेरे बैच 07-08 के दौरान भी सर का लगाव हमेशा वर्धा के छात्रों से रहा था। उनका हमेंशा मानना रहा है कि पत्रकार, पत्रकारिता को पेशा ना बनाकर दायित्व मानें, उसके लिए उन्होनें अपनें छात्रों में ऐसे विचार रखे कि, आज भी हमारे बैच के छात्र कई आंदोलनों से जुड़े है, और जगह-जगह पर मीडिया में हो रही धांधली और ख़बरों के बाजारीकरण के खिलाफ खड़े है। सर की हमेंशा से कोशिश रही की छात्र केवल नौकरी पानें भर के लिए आईआईएमसी जैसे संस्थान में ना आऐं, बल्कि पत्रकारीय गुण सीखे, अपनें पूर्वाघ्रह को तोड़ें।
अरे बेटा जिस समय देश में टेलीविजन चैनल शुरू ही हुए थे. उस समय में आपके पाप(अनिल सर) किसी बड़े चैनल में ही प्रड्यूसर हुआ करते थे, जिनकें अंडर में आज के टीआऱपी के महरथी चैनलों के आऊटपुट हैड( जो आज लाखों में कमा रहे हैं) तक इंटर्न किया करते थे। बाबू लोगों, सुनों… जिसनें जीवन में केवल संघर्ष ही किया है औऱ पत्रकारिता के लिए संघर्ष किया हो, उसे कोई लाखों में क्या खरीदेगा? उनके छात्र ही उनका सबसे बड़ा धन है…।
kumar sudhakar
January 28, 2010 at 7:26 pm
anil ji acchhe patrakar the ye to sach hai lekin abhi hain ki nahi ye to shayad unko bhi nahi pata. paise aur pad ke moh me wardha pahunchkar anil ji ne jo politics shuru kiya lagata hai anil ji khud hi us politics ke shikar ho gaye. waise ek baat aur hai ki kuchh tathaakathit kism ke jan sarokar wale log aur bhi us university me hain. dekhate hain un jan sarokariyon ka kya hota hai. aur rahi baat niyukti ki to janab MGAHV wardha me niyukt 80% log FARJI hi hain. aur anil ji ke shubhchintakon agar anil ji ke jaane ka itana hi dard ho raha hai to unako join karane se roka kyon nahi ki wah jahag unake layak nahi hai. socha hoga chalo thodi malai mujhe bhi marane ko mil jaayegi. khair bure ko ant to bura hi hona tha, kyon anil ji?
manish
January 29, 2010 at 8:02 pm
वीएन राय पूर्व पुलिस अधिकारी हैं, कानून के तोड़-मरोड़ और दांवपेच देखते हुए करियर गुजार दिया-नाम भी खूब कमाया। अपने इर्दगिर्द अपने पैरोकारों-चाटुकारों की मंडली बना कर अपनी दुकान चलाते रहने के लिए कई चमकते लोगो ने मठ बना लिए हैं। ये धंधा तुम मेरी पीठ खुजाओ मैं तुम्हारी पीठ खुजाऊंगा के सिद्धांत पर चलता है। लेकिन अनिल जी की नियुक्ति के मामले में धोखा हो गया। कुछ लोग बिकाऊ नहीं होते। वो लोग तो कतई नहीं जो पत्रकारिता में बरसों गुजारने के बावजूद रफी मार्ग से शिवाजी डिपो पैदल जाना पसंद करते हैं (ताकि पत्रकारिताकर्म के लिए हर रोज रोहिणी से देश की सियासत के केंद्र लुटियंस जोन पहुंचने के लिए पैसा बचाया जा सके-मैं समझता हूं शायद यही वजह रही होगी ) । ये एक बार नहीं कई बार की आंखों देखी घटना लिख रहा हूं। हम जैसे बहुत से पत्रकारों की तरह आराम तलब और सुविधाभोगी पत्रकारिता हर कोई नहीं कर रहा। अनिल जी भी उनमें से एक हैं। ऐसी शख्सियत और वीएन राय जैसे व्यक्ति रेल के सामानांतर पटरियों की तरह हैं, साथ चल कर भी दोनों में मेल-मिलाप नहीं होना थी। अनिल जी की ईमानदारी आगे चल कर खतरनाक सिद्ध होती। ये समझने के लिए इतना वक्त काफी था। बाकी सब बहाना है, किसे किस कानून के सहारे रखना है, किस कानून के पेंच औऱ जोड़तोड़ से हटाना है-ऊंचे खेल का ये दस्तूर किसे नहीं पता…
एक विश्वविद्यालय कर्मी
January 30, 2010 at 6:36 am
चुंकि मैं विश्वविद्यालय के लगभग प्रारम्भिक दौर से किसी न किसी रुप में जुड़ी हुई हूं,इसलिए विश्वविद्यालय को किसी ‘बक्से’ में बन्द करने,’वाद’ में संकुचित करने अथवा अनावश्यक विवाद खड़ा कर उसे बदनाम करने की साजिश रचने से बेहद आहत हूं.क्या अनिल चमड़िया इस बात की ओर गौर फरमाने की कोशिश करेंगे कि कक्षा में उनकी विषयगत अज्ञानता किसी भी छात्र से छुपी नहीं है और उनके गिने चुने शब्दों और उदाहरणों (जैसे-साधारण नमक कैसे आयोडिन नमक बना और जब मैं एक टेलीविजन चैनल में था तो मुझे कैसे ग्राहक के बदले कंज्यूमर लिखने के लिए कहा गया)को सुन-सुन कर छात़्रों के कान पक चुके हैं.जिसकी चर्चा करते उनके छात्र परिसर में इधर -उधर कहीं भी मिल जाते हैं.अब विषय की पढाई कर अपनी अज्ञानता कम कर खुद को अपडेट करने का उनके पास बेहतरीन मौका है, बेचारे अनिल चमड़िया मानसिक रुप से बिमार चल रहे हैं.इसलिए पहले अपनी बिमारी का इलाज करा लें जिससे उन्हे अपनी हकिकत का पता चल सके,संभव है उन्हें कभी अपनी गलती महसूस न हो और वह दूसरों पर ही किचड़ उछालते रहें और आप जैसे पत्रकार पत्रकारिता कम और इनकी चाटुकारिता अधिक करते रहें|पर अगर बिमारी ठिक हो जाए और अपनी गलतियों को महसूस कर सकें तो पहले एम.ए. कर लें,कहीं और से क्यों इसी विशवविद्यालय में आकर नमांकन करा लें|फिर प्रो. बनने का सोंचें|
ek din ka kaidi
January 31, 2010 at 2:56 pm
anil chamariya to ek udharan bhar hain es university me huyi dhandhliyon ke.agar sahi se janch ho to kai benkab ho jayenge. pure univ. ke chhatra jail gaye par kuchh nahin hua.aub aniljee ko hataya gaya hai ta bhanda foot gaya hai.magar anil jee aub achhi patrkarita kar sakenge bahut mashala mila hoga 7 mahina me,agar desh ke liye kuchh karne ka jajba wakai hai to sabhi niyuktion ko radd karane ke liye sangharsh kijiye,agar raad ho gaya to aap aur bade patrkar ho jaeye nahhin to ghush me fir naukri mil jaygi.jo chunana chahe aa chun sakte hain.aapki marji…
V Uttank
March 7, 2010 at 7:46 am
Bade khed ki baat hai. Anil ji ke sath kafi burs hua. Anil ji bahut se org. se jude rahe hain aur Hindi patrakarita mein unke yogdaan ko bhulaya nahi ja sakta hai. Lakin Anil ji ko itna to maloom hi hona chahiye ki Professor banane ki qualification kya hoti hai. Shayad Government system ko bigadne mein hum journalists ka bhi bahut bada yogdaan hota hai.
Andher Nagri Chaupat Raja