मीडिया दंगे न भड़काने की कसम खाए

: वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने की अपील : अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जमीन पर राम मंदिर बनाने के विवाद ने हजारों जानें अब तक ले ली हैं। इस विवाद ने सामाजिक ताने बाने को क्षति पहुंचाने में भी बड़ी भूमिका अदा की है।

अनिल चमड़िया अनैतिक टीचर : वीएन राय

[caption id="attachment_16827" align="alignleft"]वीएन रायवीएन राय[/caption]अनिल चमड़िया ने इंट्रेस एक्जाम में हेरीफेरी की जिसके कारण परीक्षा कैंसिल करानी पड़ी : जांच कमेटी की रिपोर्ट आते ही अनिल राय अंकित पर कार्रवाई होगी : मेरे जीवन में ऐसी स्थिति आएगी, इसकी मैंने कल्पना नहीं की थी : जिन लोगों के स्वार्थ मुझसे पूरे नहीं हो पाए वही लोग आरोप लगा रहे हैं : एक पक्षीय रिपोर्टिंग और गाली-गलौज की भाषा के चलते ब्लागों की विश्वसनीयता कम हो रही है : इतने ही दलितवादी हैं तो ब्लाग वाले अपने ब्लागों का संपादक किसी दलति को क्यों नहीं बना लेते? : वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय इन दिनों दिल्ली आए हुए हैं. इसी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर अनिल चमड़िया को हटाए जाने के मामले में वे आजकल चर्चा में हैं. आज सुबह जब उनका फोन आया तो अनिल चमड़िया प्रकरण पर उनसे कई बातें हुईं. उन्होंने कई सवालों के जवाब भी दिए. पेश है बातचीत के अंश-

अनिल के खिलाफ एक और साजिश

अनिल चमड़िया

गज़ब है. ”अनिल चमड़िया ऐट दी रेट आफ जीमेल डॉट काम” की मेल आईडी से एक मेल भड़ास4मीडिया के पास आया. इस मेल में एक प्रेस रिलीज, एक फोटो और एक डिजिटल हस्ताक्षर अटैच था. प्रेस रिलीज दो फार्मेट में थे. एक वर्ड डाक्यूमेंट फाइल और दूसरा पीडीएफ फाइल में. अनिल चमड़िया की प्यारी-सी तस्वीर और उनका डिजिटल हस्ताक्षर जेपेग (जेपीईजी) फार्मेट में था. किसी को कोई शक-सुबहा होने का मतलब ही नहीं था. मेल भड़ास4मीडिया के पास पहुंचा तो पब्लिश करने से पहले अनिल चमड़िया को औपचारिकतावश फोन कर एक बार कनफर्म कर लेने की कवायद की गई.  

मेरे पीछे पड़े हैं वीएन राय : अनिल चमड़िया

[caption id="attachment_14920" align="alignleft"]अनिल चमड़ियाअनिल चमड़िया[/caption]मेरा दलितवादी होना भी वीएन राय को बुरा लगा : वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर पद से हटाए गए जाने-माने पत्रकार अनिल चमड़िया का कहना है कि विश्वविद्यालय की जिस एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) ने उन्हें हटाने का फैसला लिया, उसमें 18 सदस्य हैं लेकिन केवल आठ अपने करीबी लोगों के साथ बैठक करके कुलपति विभूति नारायण राय ने मनमाना निर्णय करा लिया. वीएन राय ने ईसी की बैठक इसी उद्देश्य से दिल्ली में रखी ताकि वे अपने लोगों के साथ बैठकर इच्छित फैसला करा सकें. ईसी की इस बैठक में जो आठ सदस्य शामिल हुए, उनमें मृणाल पांडे भी हैं जो मेरी विरोधी रही हैं. वीएन राय के दो-तीन स्वजातीय लोग हैं. अनिल चमड़िया ने भड़ास4मीडिया से विस्तार से बातचीत में जो कुछ कहा वह इस प्रकार है-

अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त

पिछले साल जुलाई महीने में वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर नियुक्त किए गए जाने-माने पत्रकार अनिल चमड़िया को उनके पद से विश्वविद्यालय ने हटा दिया है. आधिकारिक कारण यह बताया गया है कि अनिल चमड़िया की नियुक्ति को विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव कौंसिल ने अपनी मंजूरी नहीं दी. सूत्रों के मुताबिक सिर्फ बीकाम की डिग्री होने के कारण अनिल चमड़िया की नियुक्ति पर एक्जीक्यूटिव कौंसिल में सवाल खड़ा किया गया. इसी वजह से उन्हें प्रोफेसर पद के लिए अपात्र माना गया. सूत्रों के मुताबिक अनिल चमड़िया इस अपमान के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं. 

अनिल चमड़िया व कृपाशंकर की नई पारी

[caption id="attachment_14920" align="alignleft"]अनिल चमड़ियाअनिल चमड़िया[/caption]देश के दो वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों ने अध्यापन की तरफ रुख कर लिया है। ये हैं अनिल चमड़िया और कृपाशंकर चौबे। इन दोनों ने वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में ज्वाइन किया है। अनिल चमड़िया ने प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया है तो कृपाशंकर चौबे ने एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में। अनिल चमड़िया और कृपाशंकर चौबे दोनों मुख्यधारा की पत्रकारिता में करीब 25 वर्षों से सक्रिय हैं। सागर (मध्य प्रदेश) के रहने वाले अनिल चमड़िया का जन्म, लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा उनके ननिहाल बिहार के सासाराम जिले में हुई। औपचारिक पढ़ाई-लिखाई कम करने वाले अनिल ने ज्यादा कुछ पढ़ा-सीखा आंदोलनों से। वे जेपी मूवमेंट में शामिल हुए। पिछड़ों को आरक्षण दिलाने वाले छात्र आंदोलन के नेता रहे। मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के बिहार के सचिव रहे। किसान और खेतिहर मजदूरों के आंदोलनों से करीब का नाता रहा। देश के विभिन्न मीडिया हाउसों में सामाजिक मुद्दों पर बेलौस लेखन करने वाले अनिल चमड़िया जनसरोकार की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं।