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इराक वाला फेंके तो जायज, जरनैल मर्यादाहीन !

जरनैल का जूता और भारतीय पत्रकारिता की दोहरी नैतिकता

गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंकने की घटना को ना खुद जरनैल सही ठहरा रहें हैं और ना मेरी ऐसी मंशा है। लेकिन चैनलों पर जो प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं, उससे साफ है कि भारतीय पत्रकारिता दोहरी मानसिकता में जीती है। तमाम चैनल इस टीआरपी बटोरु स्टोरी को धड़ल्ले से चला रहें हैं, लेकिन साथ ही ये बताना भी नहीं भूल रहे हैं कि जरनैल सिंह के इस दुस्साहस को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है।

जरनैल का जूता और भारतीय पत्रकारिता की दोहरी नैतिकता

गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंकने की घटना को ना खुद जरनैल सही ठहरा रहें हैं और ना मेरी ऐसी मंशा है। लेकिन चैनलों पर जो प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं, उससे साफ है कि भारतीय पत्रकारिता दोहरी मानसिकता में जीती है। तमाम चैनल इस टीआरपी बटोरु स्टोरी को धड़ल्ले से चला रहें हैं, लेकिन साथ ही ये बताना भी नहीं भूल रहे हैं कि जरनैल सिंह के इस दुस्साहस को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है।

एक सुर में तमाम हिंदी-अंग्रेजी चैनल पत्रकारिता की मर्यादा और उसकी लक्ष्मण रेखा की बातें करते नजर आ रहें हैं। ऐसे में मेरे और आपके मन में ये सवाल उठना लाजिमी है कि जब इराक का एक पत्रकार बुश पर जूता फेंकता है तो यही चैनल इसे उस गुस्से का प्रतीक बताता फिरता है जो इराक की जनता के मन में बुश के खिलाफ है। कहा गया कि मुंतजर अल जैदी का जूता फेंकना बुश की नीतियों और उनकी गिरती लोकप्रियता का प्रतीक है। लेकिन इसी मीडिया का सुर देखिए, चिदंबरम के मामले में कैसा बदला हुआ दिख रहा है। चैनलों को जरनैल का जूता फेंकना उस गुस्से का प्रतीक नहीं लग रहा है जो सिक्खों में न्यान ना मिलने की वजह से धधक रहा है। जरनैल सिंह जिस जगह पर बैठे थे, वो चाहते तो चिंदबरम के पास जाकर उन्हें जूता से मार सकते थे, लेकिन उन्होंने जूते को सिर्फ प्रतीकात्माक तौर पर इस्तेमाल किया।

क्या इस संभावना को खारिज किया जा सकता है कि 1984 के दंगों के आरोपी जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट देने के लिए सरकार ने सीबीआई पर दबाव डाला होगा। 25 साल से जो समुदाय दंगों की आंच में झुलस रहा है, उसे न्याय चाहिए। जरनैल सिंह का जूता फेंकना उसी गुस्से का प्रतीक है जो गुस्सा इराकी पत्रकार मुंतजर में भारतीय मीडिया को बुश के खिलाफ नजर आया था। मीडिया में ये भी दलील दी जा रही है कि इराक की घटना से इसकी तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन मैं मानता हूं कि ये घटना इराक से भी कहीं ज्यादा मुखर है। बुश पर जूता फेंकने वाला पत्रकार किसी दूसरे मुल्क का था, लेकिन चिदंबरम पर जूता फेंकने वाला इसी देश का पत्रकार है। एक नेता के खिलाफ गैर-मुल्क के लोगों का गुस्सा थोड़ा समझा भी जा सकता है, लेकिन अपने ही मुल्क में अपनों का गुस्सा, कहीं बड़े सवाल खड़ी करती है।

जगदीश टाइटलर को सजा दिलाने की जगह हर बार कांग्रेस टिकट देती रही है। ऐसे में न्याय की आस में बैठा एक समुदाय आखिर क्या करेगा! जब जरनैल सिंह जैसे एक वरिष्ठ पत्रकार इस तरह की घटना कर सकते हैं तो आम लोगों के मन में दहक रहें गुस्से की कल्पना आसानी से की जा सकती है। फिर मीडिया बुश की तरह चिदंबरम पर जूते फेंकने की घटना को एक समुदाय के गुस्से की तरह क्यों नहीं पेश कर रहा?

क्या मुंतजर और जरनैल के लिए गुस्से को इजहार करने की नैतिकता मीडिया ने अलग-अलग तय कर रखें हैं ?


लेखक धीरज वशिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों हिंदी न्यूज चैनल ‘न्यूज 24’ के साथ कार्यरत हैं। उनसे संपर्क करने के लिए आप उन्हें [email protected] पर मेल भज सकते हैं।

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