”मैंने वोट देने के लिए पैसे नहीं मांगे थे लेकिन वे मेरी खबर छापने के लिए पैसे मांग रहे हैं”

”राज्यसभा के चुनाव में उन्हें वोट देने के लिए मैंने पैसे नही मांगे थे, मगर मेरी खबर छापने के लिए वो पैसे मांग रहे हैं।”  ये बात लखनऊ से भाजपा के प्रत्याशी लालजी टंडन ने यू.पी. के एक अखबार मालिक के बारे में चुनाव के दौरान प्रेस कांफ्रेंस में कही थी। इस प्रकरण का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने अपने भाषण में किया। इंदौर में पिछले दिनों आयोजित संगोष्ठी में प्रभाष जोशी ने चुनाव के दौरान मीडिया के कारोबारी स्वरूप लेने की जमकर धज्जियां उड़ाई और उसकी कारगुजारियों का कच्चा चिठ्ठा श्रोताओं के सामने पेश किया। एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीज ने भी मीडिया के इस अतिरेकपूर्ण आचरण की निंदा की। ये दोनों धुरंधर पत्रकार चुनाव के नतीजे आने के एक दिन पहले यानी 15 मई को इंदौर की सामाजिक संस्था ‘सम-सामयिक अध्ययन केन्द्र’ द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।

“चुनाव में मीडिया की बदलती भूमिका” विषय पर हुई इस संगोष्ठी में इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने इंदौर के युवा पत्रकार सुबोध खंडेलवाल द्वारा इसी विषय पर लिखी गई एक रिपोर्ट का विमोचन भी किया। संगोष्ठी को सबसे पहले प्रभाष जी ने संबोधित किया। प्रभाष जी ने लगभग 40 मिनट के उदबोधन में मीडिया की धंधेबाजी की खूब खबर ली। मीडिया के इस दागी चेहरे को बेनकाब करते हुए उन्होंने कहा कि इस बार देश के पाठको ने अखबारों में चुनाव से सम्बंधित जो भी खबरें पढीं, उनमें से ज़्यादातर किसी न किसी उम्मीदवार के पैसे के प्रभाव में छापी गई थी, और यदि किसी के खिलाफ खबर छपी तो वो इसलिए छपी क्योकि उसने विज्ञापन को खबरों के रूप में छापने का पैकेज नही लिया था। उन्होंने कहा कि इस बार लखनऊ से भाजपा के प्रत्याशी लालजी टंडन ने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करके ये कहा कि इस चुनाव में मेरी लड़ाई सिर्फ मैदान में उतरे प्रत्याशियों से ही नहीं बल्कि इन अखबारों से भी है क्योकि उस प्रत्याशी ने सभी अखबारों के पैकेज खरीद लिए हैं, लिहाजा सारे अखबार रोज उस प्रत्याशी की कई-कई खबरें छाप रहे हैं जबकि मेरी एक भी खबर नहीं दी जा रही है। टंडन ने उसी प्रेस कांफ्रेंस में एक अखबार के मालिक, जिन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया था, का नाम लेकर कहा कि राज्यसभा के चुनाव में मैंने भी उन्हें वोट दिया था मगर मैंने वोट देने के लिए पैसे नही मांगे थे, मगर अब वे चुनाव में मेरी खबर छपने के पैसे मांग रहे हैं।

प्रभाष जी ने कहा कि गुलाबी पन्नों पर निकालने वाले अंग्रजी के अखबार इकोनोमिक टाइम्स में पैसे लेकर खबरें छापने का काम वर्ष 2006 से चल रहा है। टाइम्स समूह ने इसके लिए मीडिया इनीशिएटिव नामक एक कंपनी बनाई थी। बाद में एचटी ने भी ऐसा ही किया। इन अखबारों ने इस चुनाव में चुनावी खबरों के कवरेज के लिए वसूलने वाली राशि के रेट कार्ड भी छपवाए थे। प्रभाष जोशी के मुताबिक अखबार और पाठक के बीच विश्वास का रिश्ता होता है। यदि इस विश्वास को आप तोड़ रहे हो तो आप अपनी जिम्मेदारी नही निभा रहे हो।

इन दोनों पत्रकारों को सुनने के लिए इंदौर की हिन्दी साहित्य समिति सभाग्रह में सैकड़ों प्रबुद्धजन उपस्थित थे लेकिन लगभग 25 लाख की आबादी वाले इस शहर के अधिकांश लोगों तक इनकी बात नहीं पहुच पायी क्योकि शाम के दो और सुबह के एक अखबार को छोड़कर ज्यादातर अखबारों ने इस आयोजन की खबर को न छापना ही बेहतर समझा। लोकल चैनल्स ने जरूर थोड़ी बहुत हिम्मत दिखाई मगर उन्होंने भी इस खबर को उतनी तवज्जो नही दी। शायद इस आयोजन की प्रेस विज्ञप्ति पढते वक्त उनको भी कोई अपराधबोध सता रहा था।

इसके पहले सुबोध खंडेलवाल ने चुनाव में मीडिया की बदलती भूमिका पर आधारित रिपोर्ट के बारे में जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि इस चुनाव में कुछ अपवादों को छोड़कर देश का मीडिया सिक्के से चलाने वाले पब्लिक फोन की तरह नजर आया, जिसमें जो व्यक्ति सिक्का डालेगा उसी की आवाज सामने वाले छोर तक पहुंचेगी। यदि किसी ने इसमें सिक्का नही डाला है तो फिर चाहे उसकी आवाज कितनी भी बुलंद हो, उसे दबा दिया जायेगा।

प्रभाष जी के संबोधन को आप इन वीडियोज पर क्लिक कर देख-सुन सकते हैं :


 


 


 



रिपोर्ट और वीडियो : सुबोध (इंदौर)

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