अखबार बोले तो इंडियन एक्सप्रेस!

विदिशा और स्मिता
विदिशा और स्मिता
अज्ञानी पत्रकार अधकचरी रिपोर्ट देकर समाज का नुकसान कर रहे हैं- कपिल सिब्बल : संकल्प पत्र पर हस्ताक्षर करके पेड न्यूज की समस्या का समाधान नहीं होगा- शेखर गुप्ता : जिन अखबारों ने पैसे के लिए न्यूज स्पेस बेचा, उनका पर्दाफाश हो- जस्टिस एएस आनंद : ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की स्मिता नायर और ‘द वीक’ की विदिशा घोषाल को संयुक्त रूप से ‘आईपीआई इंडिया पुरस्कार’ : 

अखबार का मतलब इंडियन एक्सप्रेस होना होता है, देश में उपलब्ध अखबारों को देखकर मेरा तो ऐसा ही मानना है. आज रेड्डी बंधुओं को भी निपटा दिए जाने की खबर इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुई है. कर्नाटक के मंत्री रेड्डी बंधुओं की दबंगई, कब्जा, अवैध खनन, भ्रष्टाचार आदि की खबर इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाताओं ने ब्रेक की. लगातार फालोअप छापा. रेड्डी बंधुओं का पक्ष भी विस्तार से रखा. सुप्रीम कोर्ट ने रेड्डी बंधुओं की तीन खनन लीज को रद्द करने का आदेश दे दिया. एक्सप्रेस की इस बड़ी खबर का असर आज एक्सप्रेस अखबार में प्रकाशित है. ये सिर्फ एक्सप्रेस वालों की खबर है. ऐसी खबरें लगातार एक्सप्रेस में छपती रहती हैं. इसी तरह की खोजी व जवाबदेह पत्रकारिता के लिए इंडियन एक्सप्रेस की एक संवाददाता पुरस्कृत भी की गई हैं और इसकी खबर व तस्वीर एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर है. यह अपने जीवट व बहादुर पत्रकार के प्रति एक्सप्रेस का सम्मान है.

हिंदी अखबारों को देख लीजिए तो ये सिर्फ हो चुकी घटनाओं को छापने-परोसने में यकीन रखते हैं. या अगर बड़ी खबर छापते भी हैं तो यदा-कदा या फिर उसी के खिलाफ छापते हैं जिसे नुकसान पहुंचाने की मंशा रखते हैं. मतलब, जिनसे काम नहीं निकल सका उन्हें जानबूझ कर नुकसान पहुंचाने की रणनीति के तहत खोजी पत्रकारिता करने-कराने लगते हैं. मेरे एक मित्र बता रहे थे जयपुर में एक बड़े अखबार के मालिक ने जमीन का एक मामला मंत्री से सेट न होने पर उनके विभाग के खिलाफ खोजी पत्रकारिता शुरू करा दी. मंत्री के सरेंडर करने और मालिक का काम कर देने के बाद खोजी पत्रकारिता पर विराम लगा दिया गया और फिर से रुटीन पब्लिश करने का आदेश दे दिया गया. ऐसा करना पत्रकारिता नहीं ब्लैकमेलिंग है और सही कहें तो पत्रकार तो मजबूरी में ब्लैकमेलर बनता है, असली ब्लैकमेलर तो मीडिया हाउस का मालिक होता है.

सत्ता-शासन के भय से मुक्त होकर पत्रकारिता करने वाले, बड़ी खबरें ब्रेक करने वाले अखबारों की संख्या देश में उंगलियों पर गिनने भर है. ऐसे में अखबारो में मैं नंबर वन इंडियन एक्सप्रेस को मानता हूं. जबसे दिल्ली में हूं, सुबह आंख खुलने पर अखबारों की भीड़ में सबसे पहले हाथ इंडियन एक्सप्रेस को तलाशता है क्योंकि बाकी अखबारों में वही खबरें देखने को मिलती हैं जो एक दिन पहले हो चुकी होती हैं और उनकी जानकारी एक दिन पहले टीवी या मोबाइल या इंटरनेट के जरिए मिल चुकी होती है. इंडियन एक्सप्रेस में ही पिछले दिनों यह सनसनीखेज व दिल दहला देने वाली खबर प्रकाशित हुई कि गुजरात में पुलिस अफसरों के पूर्वाभ्यास कार्यक्रम में एक सांप्रदायिक दिमाग वाले पुलिस अधिकारी ने एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी को असल में गोली मार दी. इस घटना के बारे में रवीश कुमार ने अपने ब्लाग में विस्तार से उसी दिन उल्लेख किया, जिसे आप पढ़ने के लिए क्लिक कर सकते हैं- त्रिवेदी ने सैयद को मार दिया… सैयद कहता रहा आतंकवादी नहीं है

बस केवल एक ही बात समझ में नहीं आती कि एक्सप्रेस समूह वाले अपने अंग्रेजी अखबार को चमका कर रखते हैं पर हिंदी अखबार जनसत्ता को दलित की तरह क्यों ट्रीट करते हैं. जनसत्ता में इंडियन एक्सप्रेस की खबर ही अनुवाद की हुई मिलती है. जनसत्ता वाले खुद अपने स्तर पर कोई बड़ा भंडाफोड़, जबरदस्त खुलासा, खोजपरक रिपोर्ट आदि पब्लिश नहीं करते. क्या एक्सप्रेस के मालिक ने जनसत्ता वालों को कह रखा है कि तुम लोग केवल रुटीन कवर करो, इंडियन एक्सप्रेस वाले केवल एक्सक्लूसिव पब्लिश करते रहेंगे, इस प्रकार दोनों अखबार को मिलाकर रुटीन व एक्सक्लूसिव का संपूर्ण पैकेज पाठकों तक पहुंचेगा. अगर ऐसा है तो दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि जनसत्ता कभी तेवरदार अखबार के रूप में जाना जाता था लेकिन अब लकीर के फकीर वाला अखबार बन गया है. 

बात यहां हो रही थी इंडियन एक्सप्रेस की. जोरदार और जबरदस्त पत्रकारिता करने वाले इंडियन एक्सप्रेस के मालिक, संपादक और रिपोर्टरों को एक बार सलाम कर लेते हैं. इसी अखबार की पत्रकार स्मिता नायर को पत्रकारिता 2009 के ‘आईपीआई- इंडिया पुरस्कार’ से कल सम्मानित किया गया. आईपीआई इंडिया पुरस्कार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की स्मिता नायर और ‘द वीक’ की विदिशा घोषाल को संयुक्त रूप से मिला. द इंडियन एक्सप्रेस को तीसरी दफा यह पुरस्कार मिला है. इस पुरस्कार के तहत एक ट्रॉफी, प्रशस्ति पत्र और एक लाख रुपए दिए जाते हैं. मालेगांव और मोदासा में 2008 में हुए धमाकों पर इंडियन एक्सप्रेस ने लगातार खोजपूर्ण रपटें छापी और उन धमाकों के पीछे एक अतिवादी संगठन का हाथ होने का खुलासा किया. घोषाल को महाराष्ट्र में कर्ज के बोझ से दबे किसानों की विधवाओं के शोषण पर लिखी रपटों के लिए पुरस्कृत किया गया. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने विजेताओं को सोमवार को पुरस्कृत किया.

इस मौके पर कपिल सिब्बल ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी ज्यादा मजबूत होती है जब मीडिया के जरिए वे लोग अपनी आवाज रखते हैं जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं होती. दोनों ही खोजपरक खबरों ने अपनी भूमिका निभाई इसीलिए उन्हें पुरस्कृत किया गया. इंडियन एक्सप्रेस की मुंबई संवाददाता स्मिता नायर ने अपनी रपट में उजागर किया था कि पुलिस जांच से यह पता लगा कि मोदासा और मालेगांव में हुए धमाकों के पीछे कट्टरवादी हिंदू समूह थे. इस रपट के बाद एक्सप्रेस संवाददाताओं की एक टीम ने खोज खबरों का सिलसिला शुरू किया और आतंकवादी घटना का पूरा सच पेश किया.

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार न्यायपालिका व कार्यपालिका द्वारा अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभाने के कारण मीडिया ट्रायल जैसी अवांछित प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है. उन्होंने कहा, अखबारों में छपी खबर को आज भी लोग विश्वास के साथ पढ़ते हैं. अखबारों को उन लोगों की आवाज बनना चाहिए जो अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं है. प्रेस की स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं है. उनकी शिकायत थी कि आज पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ ऐसे लोग भी सक्रिय हैं जिन्हें विषय का पर्याप्त ज्ञान नहीं होता. अधकचरी रिपोर्ट देकर वे समाज का नुकसान कर रहे हैं.

द वीक की विदिशा घोषाल ने बताया कि विदर्भ की विधवाओं की गैर-मौजूदगी का ब्योरा मेरी खबर ‘मूक भुक्तभोगी’ में है. उन्होंने कहा कि इस खबर के जरिए उन महिलाओं को अभिव्यक्ति का मौका मिला. द इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शेखर गुप्ता ने इस मौके पर कहा- ”ये खबरें फाइल छीनने या स्टिंग आपरेशन की खबरों जैसी नहीं थीं और पत्रकारिता किसी के बेडरूम में कैमरा लगाना भी नहीं है. ये वे खोजपरक खबर हैं, जिनमें तथ्य जुटाए जाते हैं, छानबीन की जाती है और दूसरे का भी पक्ष रखा जाता है. शेखर गुप्ता ने कहा कि किसी संकल्प पत्र पर हस्ताक्षर करके पेड न्यूज की समस्या का समाधान नहीं होगा.

इस मौके पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष एएस आनंद ने पत्रकारों से अपील करते हुए कहा कि वे काम करते हुए लक्ष्मण रेखा के भीरत रहें. आनंद ने कहा कि मीडिया पाठक और देश के प्रति जवाबदेह है. अवार्ड के लिए गठित जूरी के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एएस आनंद ने कहा कि पेड न्यूज की वजह से मीडिया की विश्वसनीयता खतरे में पड़ गई है. पिछले चुनाव में कुछ अखबारों ने पैसे के लिए न्यूज स्पेस बेचा. विज्ञापन को खबर के रूप में छापना अनैतिक आचरण है. न्यूज स्पेस बेचने वाले अखबारों का पर्दाफाश होना चाहिए.

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Comments on “अखबार बोले तो इंडियन एक्सप्रेस!

  • Rupesh Sharma says:

    Maine Jansatta mai 1996 sey 1999 tak Hazaribagh ( Jharkhand) sey as a distt reporter kaam kiya hai. us samay Thanwi sahab RE they aur Sri Rambhadur Rai Ji News Editor aur Sri Prabhash Joshi Ji Chief Editor
    Mainey jab 1990 mai patrkarita shuru ki thi tab mai Jansatta mai likhney ka sapna dekhta tha aur wo sapna jab pura hua to phir kisi hindi akhbaar mai likhney ki echha nahi hui.
    Us samay Sri Surendra Kishore Patna B Chief they aur Ms Vasvi Ji Ranchi Head thi.
    Jab mai Surendra Kishore ji ko first interview dene Patna gaya aur jab mai unsey milkar bahar aaya to surendra kishore ji khidki sey mujhey dekh rahey they ki mai kis vehicle sey aaya hu Jab unhoney mujhey Ricksaw pey dekha to aandar chaley gaye
    1996 mai Sri Alok Tomar Shams Tahir Khan jaisey Nami Patrkar Janstta mai they.
    Mujhey Sri Rambhadur Rai , Surendra Kishore Ji, Vasvi Ji sey jo bhi sikha usney mere jiwan ki dasha badal di aur mai jivanbhar isnka ehsaanmand rahunga.
    Aaj Ki Patrkarita dekh kar mujhey woh zamana yaad aa gaya, so likh dala
    Thanks for reading
    Rupesh Sharma
    Hazaribagh, Jharkhand
    rupesh.love@gmail.com

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  • Chandrabhan Singh says:

    Indian Express ke pichhe sadhko ki sadhna dikhlai deti hai. Jansatta parivar ko Indian Express parivar se sikhna chahiye.

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  • pankaj shrimali says:

    sadiyan lag jati hai ek aashiyana bnane me unko laga nhi ek pal isko girane me
    gwalior basant sinema ko kiya dhwast

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  • ANIS KHAN SHAHAN says:

    Majority of our national Hindi News Paper and Channels are busy in Salman-Shahrukh’s dosti-dushmani…and in spare time propagating nonsense like astrology, taro and bhoot-pret story… then after fighting back with astrologers, taro readers, sadhu babas…In short ethically they are still immature, confuse and partial regarding the r…eporting on discriminated society…Especially Muslim and backward…

    But still news paper like INDIAN EXPRESS is flag bearer ethical and honest journalism, hats off to Indian Express Family.

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  • अरे भैया…इंडियन एक्सप्रेस का ऐसा गुणगान करने से पहले वहां काम करने वाले ऊन पत्रकरों से भी पूछ लेते जो इस बात से दुखी रहते है की ऊपर में सेट्टिंग हो जाने के कारन उनकी खबरें नहीं प्रकाशित होती हैं. ..नुक्लिअर डाल के समय तो इस अख़बार का रुख ऐसा था मनो ये वाशिंगटन से प्रकाशित होता है और इसे अमेरिका के हितों की ज्यादा चिंता है. जहाँ तक रेड्डी बंधुओं के खिलाफ खबर का मामला है…तो उसके पीछे की कहानी ही कुछ और है. ..राम नाथ गोयनका के इंडियन एक्सप्रेस और आज के इंडियन एक्सप्रेस में जमीं आसमान का अंतर है.

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  • sonu kumar says:

    bhai indian express to kuch alag hi bat hai. aj indian express ya uske bad tribune jaise akhbar damdar patrkarita kar late hai . baki to pamphlet hai

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  • pawan kumar bansal rohtak says:

    indian express deserves congratulations for investigative reports.There is no need of spy camera for getting investigative reports. On the basis of my thirty years experience as reporter for indian express and jansatta at chandigarh, rohtak and jind i can claim that if the journalist has the credibility to publish the news in publish in public interest and hide the identity of source then top secret government files exposing corruption will come to even without using the right to information.Paid news is also bigger threat to democracy .Prhabash joshi has launched campaign against this evil which he continued till his death.fight must go on. express should give some time to jansatta also.once upon a time jansatta has busted several scandals and scams

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  • Sarvadaman says:

    ग्रेपवाइन जी आपने सत्य कहा है कि रिपोर्टर्स से हार्ड – हिटिंग स्टोरी लाने को कहा जाता है. जब स्टोरी फाइल हो जाती है तो वह किसी न किसी बहाने से रोक ली जाती है. मध्य प्रदेश से प्रकाशित एक बड़े अखवार में पिछले दो साल से यही खेल चल रहा है. लेकिन जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस की बात बाकई अलग है. आखिर देश में कोई तो ऐसा अखवार होना चाहिए जो बड़ो – बड़ो को हिलाए वर्ना ज्यादातर अखवारो के संपादक भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दे रहे है. ऐसे में रिपोर्टर्स की बड़ी ही मुसीबत है अगर खबर लिख दो तो भ्रष्टाचारी संपादक से मिलकर षड़यंत्र करने लगते है.

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