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पितरों के श्राद्ध के लिए कौवे नहीं मिले

[caption id="attachment_15798" align="alignleft"]कैद में है कौवाकैद में है कौवा[/caption]लखनऊ : पितरों के श्राद्ध का कल आखिरी दिन था। भूले बिसरे पितरों को तर्पण करने के लिए यह दिन मुकरर्र किया गया था। उनके लिए जिनकी तिथियां याद न रह गयीं हों, उन सब का तर्पण आज के ही दिन करते हैं। पितरों का तर्पण तब तक अधूरा है जब तक कागभुशुण्डी जी महाराज को अन्न न खिला दें। लखनऊ में गोमती नदी से लेकर तालाबों, पोखरों, कुओं और यहां तक कि कॉलोनियों के हैंडपंपों तक पर श्राद्ध कर पितरों को तर्पण करने वालों की भीड़ थी। श्राद्ध के सारे अनुषष्ठान पूरे हो रहे थे पर नहीं मिल रहे थे तो बस कौवे।

कैद में है कौवालखनऊ : पितरों के श्राद्ध का कल आखिरी दिन था। भूले बिसरे पितरों को तर्पण करने के लिए यह दिन मुकरर्र किया गया था। उनके लिए जिनकी तिथियां याद न रह गयीं हों, उन सब का तर्पण आज के ही दिन करते हैं। पितरों का तर्पण तब तक अधूरा है जब तक कागभुशुण्डी जी महाराज को अन्न न खिला दें। लखनऊ में गोमती नदी से लेकर तालाबों, पोखरों, कुओं और यहां तक कि कॉलोनियों के हैंडपंपों तक पर श्राद्ध कर पितरों को तर्पण करने वालों की भीड़ थी। श्राद्ध के सारे अनुषष्ठान पूरे हो रहे थे पर नहीं मिल रहे थे तो बस कौवे।

कहा गया है कि अन्न अगर कौवे ने खा लिया तो खाना सीधे पितरों के पेट में पहुंचता है। कौवों की तलाश शहर के हर कोने में हो रही थी । मगर कौवे थे कि मानों बिला गए थे। लखनऊ की 40 लाख की आबादी को कौवे खोजे नही मिल रहे थे। लोग मन मसोस कर रह गए कि पितरों को कहीं भूखा न रहना पड़े। कुछ तो अनिष्ट की आशंका से भी ग्रस्त दिखे।

पर इसका भी इलाज मौजूद था, इसी शहर में। राजधानी लखनऊ के अवैध चिड़िया बाजार नक्खास में कल तीतर, बटेर या लकी कबूतर की मांग नही थी। आज यहां कौवे हॉट सेलिंग केक थे। कौवे पिंजरों में बंद थे और उनके चारों तरफ खरीदारों की भीड़ थी। बेचने वाले मोल-भाव करने को भी न तैयार थे। जो मांगा वही दो नहीं तो आगे बढ़ो। कुछ ऐसा ही भाव था भाई लोगों के चेहरों पर। कौवे 800 रुपए से लेकर 1200 रुपए तक की कीमत में बिके और जम के बिके। श्राद्ध के दिन काले तीतर पर काला कौवा भारी था। हालांकि चिड़िया बाजार के पुराने चिड़ियाफरोश हबीबुल्लाह का कहना है कि आजकल वैसे ही कौवे मंहगी कीमत में बिक रहे हैं। उनका कहना है कि नामर्दी के शिकार लोग भी कौवे का गोश्त खाकर खुद को जवां महसूस करते हैं। पुराने ललखनऊ के कई हकीम तो आजकल बूढ़ों को कौवे का गोश्त खिला कर फिर से जवानी के अखाड़े में उतारने का दावा करते हैं। डालीगंज के हाजी हकीम मोहब्बत हुसैन एनुद्दीन जरार्ह का कहना है कि कौवे के गोश्त में जो गर्मी होती है वो ढीली नसों को खोल देती है और जवान कर देती है।

खैर इनके दावे तो अपनी जगह पर जो अपने पितरों के नाम अन्न कौवों को खरीद कर नहीं खिला पाए उनके लिए भी यहां नुस्खा था। श्राद्ध का सामान यहीं लाकर कौवों को खिला दो और 30 रुपए दे जाओ। आज का बिजनेस सिद्धार्थ कलहंसदेख कई चिड़ियाफरोशों ने आगले साल की भी रणनीति तैयार कर ली है। उनका कहना है कि अब से गोमती किनारे या एसी जगहें जहां ज्यादा श्राद्ध होते हों, वहीं कौवे बेंचेंगे। मुनाफा खासा जो है।


लेखक सिद्धार्थ कलहंस लखनऊ के पत्रकार हैं। इन दिनों बिजनेस स्टैंडर्ड, लखनऊ के प्रिंसिपल करेस्पांडेंट हैं। उनसे संपर्क करने के लिए [email protected] पर मेल कर सकते हैं या फिर 09336154024 पर फोन कर सकते हैं।
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