शायद मोबाइल पर उनकी आवाज आ जाए कैसे हो यार!

आलोक तोमर के बारे में 2006 की शुरुआत से पहले मैंने सिर्फ खबरों के जरिए ही जाना था। सोचता था कि कैसे आदमी होंगे। कहां से खबरे खोज लाते होंगे। कैसे इतने सारे बड़े लोगों से एक साथ मोर्चा खोल लेते हैं। पर 2006 में इंडियन एक्सप्रेस में आने के बाद जनसत्ता के अंबरीश कुमार से उनके बारे में काफी कुछ सुना। एक्सप्रेस के अंग्रेजी दां माहौल में अंबरीश जी सबसे ज्यादा या तो मुझसे बात करते थे या फिर बाद में ज्वाइन करने वाले वीरेंद्रनाथ भट्ट जी से।

राहुल के चलते वीआईपी हुए जिलाई पत्रकार

श्रावस्ती के गांव में रात का भोजन करते राहुलअरसे बाद उत्तर प्रदेश में ये हुआ कि गांधी परिवार का चश्मोचिराग कीचड़ भरी कच्ची सड़कें नाप चुपचाप गांवों में पहुंचा। बिना किसी शोर-गुल और तमाशे के। गांव में छप्पर के नीचे मजमा लगाया। दलित के घर भेली खा पानी पिया। रात साहू की दुकान से आनन-फानन में मंगा कर बनायी गयी आलू परवल की तरकारी खायी और बंसखट पर सो रात गुजारी। वाकया ये देश भर के अखबारों की सुर्खी बना और चैनलों का विशेष। पर मीडिया जगत में कुछ एसा नया हुआ जो अमूमन कभी नहीं होता। दिल्ली वाला बड़ा पत्रकार। लखनऊ या राज्यों की राजधानी वाला थोड़ा छोटा पत्रकार। जिले और कस्बे वाला तो बेचारा मच्छर। बड़े स्वनामधन्य तो सीधे मुंह बात भी नहीं करते इनसे। इन जिले-कस्बे वाले बेचारों की याद तभी आती है जब बड़ा पत्रकार उनके इलाके का दौरा करता है। तब इनका काम रास्ता दिखाना या बैकग्राउंडर देना होता है। मगर राहुल गांधी के मामले में तो कमाल हो गया। बिन बताए राहुल आ धमके। बस वायरलेस पर खबर थी कि राहुल अब हैदरगढ़, बाराबंकी और अब श्रावस्ती।

पितरों के श्राद्ध के लिए कौवे नहीं मिले

[caption id="attachment_15798" align="alignleft"]कैद में है कौवाकैद में है कौवा[/caption]लखनऊ : पितरों के श्राद्ध का कल आखिरी दिन था। भूले बिसरे पितरों को तर्पण करने के लिए यह दिन मुकरर्र किया गया था। उनके लिए जिनकी तिथियां याद न रह गयीं हों, उन सब का तर्पण आज के ही दिन करते हैं। पितरों का तर्पण तब तक अधूरा है जब तक कागभुशुण्डी जी महाराज को अन्न न खिला दें। लखनऊ में गोमती नदी से लेकर तालाबों, पोखरों, कुओं और यहां तक कि कॉलोनियों के हैंडपंपों तक पर श्राद्ध कर पितरों को तर्पण करने वालों की भीड़ थी। श्राद्ध के सारे अनुषष्ठान पूरे हो रहे थे पर नहीं मिल रहे थे तो बस कौवे।

मरते-मरते देह मेडिकल कालेज को दान कर गए

सिद्धार्थ कलहंसलखनऊ : चंद्रदत्त तिवारी नहीं रहे। आज ही अखबार में खबर पढ़ी। कोई साथी ऐसा नहीं जो मरने के तुरंत बाद ही यह खबर देता। मेरा नाता उनसे बहुत कम था। जो था वो यह कि देश के जाने-माने पत्रकार अंबरीष कुमार एक लखनऊ यूनिवर्सिटी थिंकर्स काउंसिल बना गए थे जिसमें तिलक छात्रावास में रहने वाले अपने सीनियर राजेंद्र तिवारी मुझे घसीट ले गए थे। चंद्र दत्त तिवारी घनघोर गांधीवादी, आजादी के सिपाही और लोहिया के साथी थे। हम लोग जो छात्र थे उन्हें भी उनका स्नेह मिलता रहता था।