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‘पुष्पेंद्र की तानाशाही खत्म कराने में साथ दें’

Karuna Madan18 अक्टूबर को प्रेस क्लब आफ इंडिया की नई टीम चुनी जाएगी। करुणा मदान महासचिव पद की प्रत्याशी हैं। वे पिछली बार उपाध्यक्ष रहीं। भड़ास4मीडिया के माध्यम से वे पूरे देश के पत्रकारों तक अपनी बात पहुंचाना चाहती हैं। हालांकि वोट देने का अधिकार प्रेस क्लब के सदस्यों को ही है, लेकिन करुणा का मानना है कि प्रेस क्लब आफ इंडिया को पूरे देश के लिए रोल मॉडल बनाया जाना चाहिए। यह काम नई सोच व नई उर्जा से लैस टीम ही कर सकती है। पेश है करुणा के विचार। आप उन्हें पढ़ें, सुनें और गुनें। – संपादक, भड़ास4मीडिया 

Karuna Madan18 अक्टूबर को प्रेस क्लब आफ इंडिया की नई टीम चुनी जाएगी। करुणा मदान महासचिव पद की प्रत्याशी हैं। वे पिछली बार उपाध्यक्ष रहीं। भड़ास4मीडिया के माध्यम से वे पूरे देश के पत्रकारों तक अपनी बात पहुंचाना चाहती हैं। हालांकि वोट देने का अधिकार प्रेस क्लब के सदस्यों को ही है, लेकिन करुणा का मानना है कि प्रेस क्लब आफ इंडिया को पूरे देश के लिए रोल मॉडल बनाया जाना चाहिए। यह काम नई सोच व नई उर्जा से लैस टीम ही कर सकती है। पेश है करुणा के विचार। आप उन्हें पढ़ें, सुनें और गुनें। – संपादक, भड़ास4मीडिया 

मैंने पलायन नहीं, डटकर मुकाबला किया 

जब मैं पिछली बार उपाध्यक्ष चुनी गई तो मुझे लगा था कि मैं क्लब को एक नई दशा-दिशा दे सकूंगी। अपने कार्यकाल में मैंने पाया कि महासचिव पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने दो वर्षों से सारे अधिकार अपने हाथों में केंद्रित कर रखा है। मुझे बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मेंबरशिप देने से लेकर अन्य फंक्शनिंग को पुष्पेंद्र ने अपने तक सीमित कर रखा है। पिछले साल काम सुचारू रूप से चलाने के लिए कोई कमेटी तक नहीं बनने दी। इससे पिछले साल कोई कांस्ट्रक्टिव काम नहीं हो सका। मेरे विरोध के बावजूद महासचिव की तानाशाही बरकरार रही।

मैं इंडिपेंडेंट जीत कर आई थी, इस वजह से मुझे क्लब के लिए कोई भी कांस्ट्रक्टिव काम करवाने के लिए महासचिव और उनकी जमात से जूझना पड़ा। कई बार मुझे मायूसी झेलनी पड़ी। लेकिन मैंने हारी नहीं मानी। पिछले अध्यक्ष राहुल जलाली और मैनेजमेंट कमेटी के कुछ अन्य लोगों की तरह इस्तीफा नहीं दिया। मुझे लगता है कि इस्तीफा देना पलायन होता है। उन लोगों ने इस्तीफा देकर एक तरह से पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के हाथ मजबूत ही कर दिए। मुझे याद है कि महासचिव ने इस साल एक दिन बिना मीटिंग बुलाए और बिना किसी से सलाह-मशविरा किए, अपना फैसला लागू कर दिया कि सुबह 11 से रात के 11 बजे तक शराब परोसी जाएगी।

जब कुछ मेंबर्स ने मुझसे इस बाबत शिकायत की तो मुझे पहली बार इस फैसले के बारे में जानकारी मिली। इस फैसले का असर पत्रकार भाइयों की जेब और सेहत पर सीधे पड़ा। महासचिव ने सोचा था कि इस कदम से जर्नलिस्टों में उनकी लोकप्रियता बहुत बढ़ जाएगी और अगली बार उनका महासचिव चुना जाना तय हो जाएगा। काफी संघर्ष और लड़ाई के बाद महासचिव के इस गैर-जिम्मेदार निर्णय को वापस कराया गया। मैंने अंदर रहकर संघर्ष किया। तानाशाह और क्लब को बर्बाद करने पर उतारू ताकतों से लड़ाई की। मेरी ये लड़ाई अब भी जारी है।

अगर मैं महासचिव बनीं तो… 

अगर मैं महासचिव पद के लिए चुनी गई तो बहुत सी चीजें मेरी प्रियारिटी में रहेंगी। मेरी कोशिश रहेगी कि क्लब को जल्द से जल्द नई जमीन का पजेशन मिले। हां कांस्ट्रक्शन शुरू हो। वहां ज्यादा स्पेस है इसलिए लाइब्रेरी व हेल्थ क्लब Karuna Madanजैसी सुविधाएं शुरू की जाएंगी। सीनियर मेंबर्स और फीमेल जर्नलिस्ट भी क्लब की गतिविधियों में हिस्सा लें, क्लब में ज्यादा से ज्यादा आएं, इसके लिए मैंने कुछ योजनाएं बनाई हैं। मेरी कोशिश रहेगी कि सीनियर मेंबर्स को क्लब में पूरा सम्मान मिले। मेंबर्स के बच्चों के लिए किड्स कार्नर की योजना मेरे मन में है। मैं ड्रिंक नहीं करती, स्मोकिंग नहीं करती, नान-वेज नहीं खाती।

मैं क्लब की छवि को सुधारना चाहती हूं जो इस वक्त पिछले कुछ पदाधिकारियों के गलत निर्णयों के चलते काफी खराब हो चुकी है। ये क्लब दारूबाजी के एक अड्डे के रूप में कुख्यात हो चुका है। यहां मेंबर्स की फेमिली का इन्वाल्वमेंट बिलकुल नहीं है। मेंबर्स भी खुद यहां के माहौल को देखते हुए अपने परिवार के सदस्यों को नहीं लाना चाहते। मुझे ये चीज बहुत अखरती है। मैं चाहती हूं कि प्रेस क्लब में वाकई एक क्लब कल्चर आए और ये प्रेस क्लब आफ इंडिया देश के तमाम क्लब के लिए एक मिसाल बने। मैं चाहती हूं कि सभी पत्रकार बंधु मेरे हाथ मजबूत करें ताकि मैं जीत कर क्लब के लिए कुछ कांस्ट्रक्टिव काम कर सकूं।

महिलाओं के प्रति ऐसी सोच क्यों? 

मुझे क्लब के कुछ हिस्सों में पुरुष प्रधान मानसिकता की बू आती है जो मुझे अखरती है। जब लोग कहते हैं कि ये क्लब पुरुष प्रधान है और यहां का प्रेसीडेंट या जनरल सेक्रेटरी अमूमन पुरुष ही होता है तो मुझे बहुत दुख पहुंचता है। क्या ये जरूरी है कि प्रेस क्लब मैनेजमेंट पुरुषों के हाथ में ही रहे? महिलाओं के प्रति ऐसी सोच मुझे पीड़ा पहुंचाती है। प्रेस क्लब में काम करने वाले स्टाफ में एक भी फीमेल नहीं है।

मैं चाहूंगी कि अगर मैं इस बार महासचिव बनूं तो क्लब स्टाफ में फीमेल भी दिखें।  मैं बतौर महासचिव सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल के आदेश के अनुसार फीमेल बार टेंडर्स नियुक्त करूंगी। प्रेस क्लब आफ इंडिया में महिला मेंबर्स सुरक्षित व सम्मानित महसूस करती हैं। यहां  महिलाएं जितनी बार काउंटर के सामने सुरक्षित हैं उतनी ही उसके पीछे भी रह सकती हैं। वैसे भी, क्लब में स्टाफ की कमी है। इसको मैं महिला बार टेंडर्स के जरिए पूरा करना चाहूंगी।


करुणा मदान को सपोर्ट करने के लिए उनके मोबाइल 09811300601 और 09953755469 पर काल कर सकते हैं। उनसे [email protected] के जरिए भी संपर्क कर सकते हैं। करुणा ब्लागर भी हैं और उनके ब्लाग का नाम हैं अनफुलफिल्ड। इस ब्लाग लिंक पर क्लिक कर उनके बारे में और ज्यादा जान सकते हैं।


प्रेस क्लब चुनाव के अन्य प्रत्याशी अगर अपनी बात भड़ास4मीडिया के जरिए देश भर के पत्रकारों तक पहुंचाना चाहते हैं तो वो [email protected] पर मेल कर सकते हैं।


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