चौथी दुनिया की कहानी, संतोष भारतीय की जुबानी

चौथी दुनिया‘ के पुनर्जन्म में ज्यादा देर नहीं है। इस ऐतिहासिक अखबार की दूसरी पारी के प्रधान संपादक वही संतोष भारतीय हैं जो पहली पारी के भी नेता थे। संतोष जी की किताब ‘पत्रकारिता – नया दौर : नए प्रतिमान‘ में एक अध्याय ‘चौथी दुनिया‘ शीर्षक से है। इसमें बताया गया है कि यह अखबार किस तरह अस्तित्व में आया, कौन-कौन लोग किस तरह से जुड़े, अखबार क्यों बंद हुआ। संतोष जी की अनुमति से किताब का यह अध्याय यहां पूरा इसलिए दिया जा रहा है ताकि पत्रकारिता के आधुनिक सिपाही जनरल नालेज बढ़ाने के साथ हिंदी पत्रकारिता की स्वर्णिम परंपरा के साथ खुद को एकाकार करने में मदद पा सकें। इस किताब के अन्य पठनीय और उपयोगी अध्याय आगे भी प्रकाशित किए जाते रहेंगे। आपके सुझावों का yashwant@bhadas4media.com पर इंतजार रहेगा। -संपादक, भड़ास4मीडिया

चौथी दुनिया

संतोष भारतीय

चौथी दुनिया हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास का पहला साप्ताहिक ब्राडशीट पेपर था,  इसे पहला ब्राडशीट रविवारीय अखबार भी कह सकते हैं। मेरा यह सौभाग्य है कि मैं इसका पहला सम्पादक था। मैं यह संक्षिप्त परिचय इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि कई मित्रों का ऐसा गंभीर आग्रह था कि कुछ न कुछ चौथी दुनिया के बारे में अवश्य लिखा जाना चाहिए। चौथी दुनिया ने शायद कुछ ऐसा जरूर किया था जिससे वह पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ। आज अक्सर ऐसे लोग मिलजाते हैं जो चौथी दुनिया को याद करते हुए उसकी कमी महसूस करते हैं। बहुत से ऐसे आईएएस व आईपीएस मिले जिन्होंने कहा कि उन्हें आईएएस या आईपीएस बनाने में चौथी दुनिया का बहुत बड़ा हाथ था।

हालांकि चौथी दुनिया इसलिए नहीं निकली थी कि वह लोगों को आईएएस और आईपीएस बनने में मदद करे। रविवार से सुरेन्द्र प्रताप सिंह हट चुके थे तथा रविवार ने अपनी दिशा बदल दी थी। उदयन शर्मा के सम्पादकत्व में रविवार निकल रहा था पर उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा था जो रविवार की स्पष्टता व निष्पक्षता के कायल थे। दिनमान भी आपातकाल से जो पटरी से उतरा तो बहुत से ऐसे लोगों को निराशा दे गया। रविवार के तीखेपन और दिनमान की गम्भीरता लिए एक पत्र की आवश्यकता थी। शायद इतिहास ऐसे ही समय संयोग पैदा करता है।

मैं बम्बई गया हुआ था। कमला मोरारका जी से मिलने चला गया। पत्रकारिता पर बात चल रही थी और हम दोनों के विचार एक नई विधा पर मिल गए। कमलजी ने कहा कि आप अखबार क्यों नहीं निकालते? मैने कहा- पैसा कहां है? कमल जी ने कहा, मैं लगाता हूं। बात विश्लेषणसे शुरू हुई पर गम्भीर हो गई। मैंने पूछा, कब से काम शुरू किया जाए?  मुझे लग रहा था कि कमलजी कहेंगे कि अगली बैठक में तय करेंगे। पर उन्होंने कहा, आज से। वे गम्भीर थे। मैंने वहीं से कलकत्ता जाने काकार्यक्रम बनाया।

जब उदयन शर्मा रविवार के सम्पादक बने तब मैं रविवार का विशेष संवाददाता बनकर दिल्ली आ गया था। उन्होंने मुझे कहा कि रविवार की डेस्क उनका सहयोग नहीं कर रही है, क्या दो लोग ऐसे आ सकते हैं जो विश्वस्त भी हों और पूर्ण पत्रकार भी। उन दिनों लखनऊ नवभारत टाइम्स में रामकृपाल वरिष्ठ उप सम्पादक व कमर वहीद नकवी उप सम्पादक थे। मैंने उनका नाम सुझाया। उदयन ने उन्हें तैयार करने की जिम्मेदारी भी मुझे सौंप दी। मैंने दोनों से बात की और दोनों कलकत्ता जाने के लिए तैयार हो गए। इन दोनों ने जाकर रविवार को संभाल लिया। जब कमलजी ने कहा कि अखबार निकालना ही है तब मुझे इन्हीं का ध्यान आया। मैंने इन्हें नए साप्ताहिक की कल्पना, योजना, सपने व उसके खतरे बताए पर इन्होंने कहा कि आपकी सलाह पर हम रविवार में आए, पर सन्तुष्टि नहीं मिल रही, इसलिए आप आने को कहेंगे तो हम दिल्ली आएंगे।मैंने इन्हें आमंत्रित कर दिया।

दिल्ली में साप्ताहिक पत्र का खाका बना। सारी चीजें बुनियादी तौर पर मुझे ही शुरू करनी पड़ी।योगेन्द्र राठौर भाग-दौड़ के लिए साथ आए तथा मैनेजमेंट का काम संभाला। एक महीने बाद कमलजी ने बम्बई से शैलेन्द्र दुबे को भेज दिया जिन्हें आर्थिक संयोजन करना था। रामकृपाल व नकवी भी कलकत्ता से आ गए, योजनाएं बनने लगी। किन्हें लेना है, इस पर विचार होने लगा। मैं पुराने लोगों के लेने के खिलाफ था इसलिए नए लोगों को लेने का फैसला लिया। यह मैंने सुरेन्द्रजी से सीखा था। पुराना अपने ज्ञान के मद मे ज्यादा डूबा रहता है जबकि नए को मौका मिले तो वह अपने को साबित करने के लिए दिन-रात एक कर देता है। रामकृपाल जी के बहुत कहने पर मैं रविवार से केवल अजय चौधरी को लेने के लिए तैयार हुआ, पर उससे पहले हरि हमारे साथ आ चुके थे। अजय चौधरी उदयनके बहुत विश्वासपात्र थे, मुझे लग रहा था कि अजय आएंगे तो उदयन को लगेगा कि मैं उनकी टीम तोड़ रहा हूं तथा मेरा उन पर विश्वास नहीं जम पाएगा। पर रामकृपाल चाहते थे इसलिए दबाव डाल रहे थे। अन्त में अजय चौधरी को लेने का निर्णय लियागया।

वीरेन्द्र सेंगर के बारे में मुझे बहुतों ने सावधान किया कि इन्हें कहीं भी नैकरी इसलिए नहीं मिल रही क्योंकि ये आन्दोलनकारी टीम के मुखियाओं में रहते हैं। इनसे लिखवाना चाहिए पर स्टॉफ में नहीं रखना चाहिए। मुझे लगा कि सलाह सही नहीं है, यदि पत्रकार अच्छा है तो उसे लेने का खतरा उठाना चाहिए। अरविन्द के कुछ लेख मुझे जनसत्ता में पढ़ने को मिले थे, उनका पता मैंने जनसत्ता से तलाशा व उन्हें तलाश कर इलाहाबाद से बुलवाया। आलोक पुराणिक, राजीव कटारा व विनोद चन्दोला ऐसे साथी थे जो नए थे व जिन्होंने अपनी पारी की शुरुआत चौथी दुनिया से प्रारम्भ की। अर्चना झा के बारे में सुरेन्द्रजी ने कहा। एक और मेहनती लड़की सुमिता भी थी।

चौथी दुनिया में मैंने अधिकांशतया सुरेन्द्रजी के तरीके को ही अपनाने की कोशिश की। ज्यादा से ज्यादा फील्ड रिपोर्ट पर ध्यान दिया तथा जो भी लिख सकते थे, उनसे लिखवाया। खबरों का चुनाव इस आधार पर होता था कि वे दैनिक अखबारों का विस्तार न लगें, उनमें गम्भीरता हो, विश्लेषण हो, जानकारी हो, निष्पक्षता हो और निर्भीकता भी हो। कोशिश थी कि रिपोर्ट का राजनीति के साथ सामाजिक व आर्थिक पहलू भी पाठक के सामने आए। चौथी दुनिया, टीम के मामले में काफी भाग्यशाली मानी जा सकती है।

कमर वहीद नकदी ने डेस्क की सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी तो रामकृपाल ने संयोजन और सामान्य योजना की। आलोक पुराणिक, विनोद चन्दोला, राजीव कटारा और अजय चौधरी डेस्क में मेहनत करते थे। वीरेन्द्र सेंगर व अरविन्द ने रिपोर्टर का काम काफी मेहनत से किया। जोसेफ गाथिया भी कुछ दिनों तक रहे और जब तक रहे अच्छे रिपोर्टर का काम करते रहे। राज्यों में परशुराम शर्मा व शीतल ने अच्छा काम किया। रामपाल भदौरिया ने सामान्य प्रकाशन का काम संभाला। लखनऊ आर्ट कॉलेज के प्रिंसिपल योगेन्द्र नाथ योगी ने अनुशील नामक छात्र को हमारे पास भेजा। इसने चौथी दुनिया का मास्ट डिजाइन करने में बड़ी मेहनत की, प्रारम्भिक लेआउट भी उसी ने बनाया था, इसमें नकवी दिशा-निर्देश कर रहे थे। पहले अंक मे बनाया गया जयप्रकाश नारायण का स्केच अदभुत था, अनुशील सचमुच हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

यहां मेरा प्रयास चौथी दुनिया का प्रशस्ति गान नहीं है लेकिन चौथी दुनिया ने रविवार व दिनमान की शैली का मिश्रण किया, और इस प्रयास में चौथी दुनिया की अपनी शैली विकसित हो गई। यह शैली थी साहस, धारदार पत्रकारिता और वैचारिक सोच से ओत-प्रोत रिपोर्ट का प्रस्तुतिकरण। यदि रिपोर्ट की संख्या गिनने बैठें तो बहुत सी मिलेंगी पर जिस तरह चौथी दुनिया ने किसान आन्दोलन को कवर किया था वह इतिहास में न उससे पहले हुआ और न अब तक हुआ है। जिस तरह के दंगों की रिपोर्टिंग हुई वह अपने आप में अनूठी थी। चौथी दुनिया की हेड लाइन थी, “लाइन मे खड़ा किया, गोली मारी और लाशें बहा दीं।” हाशिमपुरा मलियाना में हुए इस अमानवीय हत्याकांड को देश के किसी अखबार में उजागर करने की हिम्मत नहीं हुई। यह रिपोर्ट चौथी दुनिया के टीम की सच्ची पत्रकारिता की जगमगाती मिसाल है। इसे वीरेंद्र सेंगर ने सबसे पहले खोजा था।

चौथी दुनिया में हम सब इस सिद्धान्त पर भरोसा करते थे कि यदि रिपोर्ट सही है तो उसके साथ रिपोर्टर और अखबार को खड़ा होना चाहिए। हमने उस समय की राजनैतिक स्थिति, भष्टाचार, नेताओं के आचरण को आधार बनाकर साफ और निर्भीक रिपोर्ट करवाई। सच हमेशा एक तरफ खड़ा होता है। उन दिनों यह सत्ताधीशों के खिलाफ खड़ा था और इतनी साफगोई से खड़ा था कि एक प्रधानमंत्री के खिलाफ आम हवा बना गया।

‘चौथी दुनिया’ देश के हिन्दी इतिहास में पहला साप्ताहिक अखबार तो था ही, दैनिक अखबारों में भी यह पहला था जिसने ग्लेज पेपर पर सम्पूर्ण यानी चार और आठ पेज चार कलर में छापे। तब तक हिन्दी में अखबार न्यूजप्रिंट पर पहला और चौथा पेज कलर छापते थे।

साहित्य, कला, संस्कृति और व्यंग्य में चौथी दुनिया ने कई कीर्तिमान स्थापित किए। नरेन्द्र कोहली का उपन्यास इतना ज्यादा लोकप्रिय हो गया था कि नकवी को लगा कि यह नए तरह का नशा बन रहा है। उसे सोच-समझकर छापना बन्द करना पड़ा। चंचल लगातार व्यंग्य लेखन करते थे, और अच्छे व्यंग्यकार के रूप में उन्होंने स्थान बनाया। ‘चौथी दुनिया’ ने लगातार विश्व के देशों के बारे में जानकारीपूर्ण श्रृंखला छापी जिसे बहुत दिनों तक आन्नद स्वरूप वर्मा ने लिखा।

जो ‘चौथी दुनिया’ में साथ थे, उन्होंने बाद में अपना जो स्थान बनाया वह यह स्थापित कर गया कि चौथी दुनिया ने सही पत्रकारिता की दिशा पकड़ी थी। आज रामकृपाल नवभारत टाइम्स के सम्पादक हैं। कमर वहीद नकवी पहले ‘आज तक’ के मुख्य कार्यकारी निर्माता रहे यानी मुख्य सम्पादक। नकवी ‘आज तक’ में इस समय निदेशक समाचार हैं। कुछ दिनों के लिए नकवी ने आज तक छोड़ दिया था। तब अजय चौधरी ने ‘आज तक’ का संयोजन किया पर उनकी कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई। आलोक पुराणिक केवल व्यंग्यकार के रूप में ही स्थापित नहीं हुए बल्कि उन्होंने व्यापार सम्बन्धी लेखों में भी महारत हासिल की। राजीव कटारा देश के प्रसिद्ध खेल पत्रकार हैं। विनोद चन्दोला इस समय बीजिंग रेडियो की हिन्दी सर्विस के सम्पादक हैं। कई साल पहले विनोद चन्दोला आए और उन्होंने कहा कि आपके साथ काम करने के लिए मै बीजिंग छोड़कर आ सकता हूं। वीरेन्द्र सेंगर अमर उजाला के दिल्ली इंचार्ज हैं तथा अरविन्द जनसत्ता एक्सप्रेस के राजनीतिक सम्पादक हैं। अजीत अंजुम इन दिनों अनुराधा प्रसाद की बीएजी फिल्म के सर्वेसर्वा हैं। जोसेफ गाथिया बच्चों से संबंधित एक बड़ी संस्था चला रहे हैं।

मैं हरि नरायण सिंह को नहीं भूल सकता, वे रविवार में सहायक थे, चौथी दुनिया में उप सम्पादक बनकर आए। हरि बहुत मेहनती थे, हरि बाद में प्रभात खबर में न्यूज एडीटर बन कर गए तथा उसके बाद रांची से निकलने वाले दैनिक हिन्दुस्तान में स्थानीय सम्पादक हो गए।  चौथी दुनिया में फ्रीलांस करने वाले कई राष्ट्रीय अखबारों में सहायक सम्पादक बन गए। कई आज बड़े फिल्म निर्माता हैं। यहां मैं संजय सलिल का जिक्र करना चाहूंगा। वे मेरे साथ हेडलाइन में आए और तेजी से तरक्की  करते हुए आज तक सुबह के प्रमुख हो गए। इन दिनों वे जागरण टी.वी. की स्थापना कर रहे हैं तथा उनका इरादा टी.वी. चैनल की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाने का है। इन सब लोगों ने जहां पत्रकारिता में अपना ऊंचा स्थान बनाया वहीं मुझे भी यह सौभाग्य दिया कि मैं कह सकूं कि मैंने इनके साथ काफी दिनों तक कार्य किया है।

मैं चौथी दुनिया के बारे मे ज्यादा लिखना नहीं चाहता पर इतना अवश्य लिखना चाहता हूं कि रामनाथ गोयनका, अवीक सरकार और कमल मोरारका जैसे मालिक हों तो अखबारों में काम करने का पत्रकारों को मजा आता है। इसमें अवीक सरकार के साथ मेरा सीधा सम्बन्ध बहुत नहीं रहा पर यदि वे आजादी न देते तो रविवार, रविवार न होता और यदि कमल मोरारका आजादी न देते तो चौथी दुनिया, चौथी दुनिया न हो पाती। कमल मोरारका ने हिन्दी पत्रकारिता से हाथ खींच लिया, शायद इसके पीछे मैं हूं, जिसने लोकसभा में जाने के बाद चौथी दुनिया में रूचि लेना बन्द कर दिया था। उन्होंने चौथी दुनिया मेरे लिए निकाली और मैं उनका साथ नहीं दे पाया।

मेरे सामने बड़ा सवाल था, यदि मैं अपने नाम के अनुरूप पत्रकारिता करता हूं तो मुझे हर हफ्ते जनता दल के खिलाफ लिखना पड़ेगा जिससे उस समय की बनी सरकार परेशानी में पड़ जाती और यदि जनता सरकार की चापलूसी करता तो मैं पाठकों के साथ दगाबाजी करता। इसलिए मैं सांसद बनते ही चौथी दुनिया का सलाहकार सम्पादक बन गया, पर मैंने लगातार इलस्ट्रेटेड वीकली और धर्मयुग में कॉलम लिखना जारी रखा और वे कॉलम उस समय भी गवाह थे, आज भी गवाह हैं कि मैंने कभी लिखने का सौदा नहीं किया। इसमें से कुछ इस पुस्तक में हैं। एक पत्रकार के लिए सबसे गर्व की बात यही है कि उसे जब भी लोग याद करें पत्रकार के रूप में याद करें, और अपने इस सौभाग्य पर, पाठकों के आशीर्वाद पर मेरा सर हमेशा झुका रहेगा। 


(संतोष भारतीय द्वारा लिखित और वर्ष 2005 में प्रकाशित किताब ‘पत्रकारिता – नया दौर : नए प्रतिमान’ से साभार)

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