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अखबारों का रियेलिटी शो- झूठ का सामना

उदय चंद्र सिंहअखबार के इस झूठ गढ़ने वाले रिपोर्टर का क्या बिगाड़ लेंगे आप? बीते दिनों दिल्ली के कुछ अखबारों में छपी एक खबर को पाठकों ने खूब चटकारे लेकर पढ़ा। खबर ग्रेटर नोएडा के शख्स की थी। खबर में बताया गया था कि एक टीवी चैनल पर आने वाले शो ‘सच का सामना’ देखने वाला एक शख्स अपनी लाइफ के सच का सामना नहीं कर सका और सदमे में फांसी लगाकर जान दे दी। प्रोग्राम देखकर एक्साइटमंट में उसने पत्नी से अपने सच का खुलासा करने को कहा, लेकिन सच को वह सहन नहीं कर सका। खबर में कासना पुलिस का भी हवाला दिया गया था। खबर में बताया गया था कि एक मॉल में काम करने वाला शख्स अपनी पत्नी के साथ टीवी पर आने वाला रियेलिटी शो ‘सच का सामना’ रेगुलर देखा करता था।।शो के तर्ज पर उस शख्स ने  अपनी पत्नी को सच का सामना करने के लिए कहा। पत्नी ने पहले इससे इनकार किया।

उदय चंद्र सिंहअखबार के इस झूठ गढ़ने वाले रिपोर्टर का क्या बिगाड़ लेंगे आप? बीते दिनों दिल्ली के कुछ अखबारों में छपी एक खबर को पाठकों ने खूब चटकारे लेकर पढ़ा। खबर ग्रेटर नोएडा के शख्स की थी। खबर में बताया गया था कि एक टीवी चैनल पर आने वाले शो ‘सच का सामना’ देखने वाला एक शख्स अपनी लाइफ के सच का सामना नहीं कर सका और सदमे में फांसी लगाकर जान दे दी। प्रोग्राम देखकर एक्साइटमंट में उसने पत्नी से अपने सच का खुलासा करने को कहा, लेकिन सच को वह सहन नहीं कर सका। खबर में कासना पुलिस का भी हवाला दिया गया था। खबर में बताया गया था कि एक मॉल में काम करने वाला शख्स अपनी पत्नी के साथ टीवी पर आने वाला रियेलिटी शो ‘सच का सामना’ रेगुलर देखा करता था।।शो के तर्ज पर उस शख्स ने  अपनी पत्नी को सच का सामना करने के लिए कहा। पत्नी ने पहले इससे इनकार किया।

लेकिन अपनी कसम दिलाकर उस शख्स ने पत्नी को मना ही लिया। उसने पत्नी को यकीन दिलाया कि सच जैसा भी हो, वह उसे मंजूर करेंगा और पत्नी को उतना ही प्यार करता रहेगा। भरोसे में आई पत्नी ने पति को बता दिया कि शादी से पहले उसने अपने प्रेमी से शारीरिक संबंध बनाए थे। यह सुनकर उस शख्स को को गहरा सदमा लगा। अगले दिन वो रोज की तरह काम पर चला गया। देर शाम वो शख्स चुपचाप घर पहुंचा तो पत्नी घर पर नहीं थी। बस उसने पत्नी की चुनरी का फंदा बनाया और खिड़की की ग्रिल के सहारे फांसी लगा ली।

खबर वाकई चौंकानेवाली थी। तुरंत मैनें अपने एक रिपोर्टर को खबर की तफ्तीश में लगा दिया। एक समाजशास्त्री को भी शाम को स्टूडियो में निमंत्रित कर लिया ताकि इस पर स्पेशल शो किया जा सके। लेकिन हमारी पूरी तैयारी उस वक्त हवा हो गई जब मौके पर पहुंचे रिपोर्टर ने मुझे हकीकत बताया। खबर में हकीकत सिर्फ इतनी थी कि एक शख्स ने आर्थिक तंगी के चलते खुदकुशी की थी। सच का सामना शो से उस केस का कोई लेना देना नहीं था। उस परिवार की आर्थिक हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वो एक खाली प्लाट में एक कच्चे मकान में रहता था जहां न तो बिजली थी और न कोई टीवी। जिस कासना पुलिस के हवाले से खबर छपी थी वो लोग भी खबर पढ़कर भन्ना रहे थे। घर में बिजली न होने के कारण पुलिसवालों को मोटरसाइकिल की हे़ड लाइट जलाकर तफ्तीश करनी पड़ी थी और उसी रोशनी में किसी तरह शव को उठाकर पोस्टमार्टम के लिए भेजना पड़ा था। पुलिस वालों ने हमारे रिपोर्टर अंबुजेश शुक्ला को वो नाइलान की रस्सी भी दिखाई जिसे गले में लगाकर खुदकुशी की गई थी।

ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि आखिर खुदकुशी एक खबर को ‘सच का सामना’ रियेलिटी शो से क्यों जोड़ा गया? क्या सिर्फ इसलिए की खबर को पहले पन्ने पर जगह मिले? इस घटना के दो दुखद पहलू हैं- एक तो रिपोर्टर ने पूरी तरह से खबर को बेचने के लिए खूब मिर्च मसाला लगाया और गलत खबर लिखी। दूसरा- डेस्क पर बैठे पत्रकारों ने भी पत्रकारीय नैतिकता को नजरअंदाज किया। रिपोर्टर ने जो कुछ लिखा उसे डेस्क पर बैठे लोगों ने ज्यों का त्यों छाप दिया। डेस्क पर बैठे पत्रकार बंधुओं ने इस बात पर जरा भी गौर नहीं किया कि जिस तथाकथित सच के खुलासे का जिक्र रिपोर्टर ने किया है, उसे छापना चाहिए या नहीं। अगर मान लिया जाए कि खबर सच भी होती तो क्या इस बात का जिक्र किया जाना चाहिए था कि उस महिला जिसने अभी अभी अपना पति खोया हो, उसके बारे में यह लिखा जाए कि शादी से पहले उसने किसी और से भी शारीरिक संबंध बनाये थे।

सचमुच यह स्थिति दुखद है। दरअसल, यह किसी से छिपा नहीं रह गया है कि आज ज्यादातर मीडिया हाउस पर किसी न किसी बडे औद्योगिक घराने या राजनेता का कब्जा है… जिन्हें जनमानस की प्रतिबद्धता से अधिक अपने व्यापारिक या राजनीतिक हितों की चिंता ज्यादा रहती है। खबरों का चुनाव जन जागरण और जन समस्याओं से हटकर अपने मालिकों के हित को पोषित करना आधार होता है, जिसके कारण पत्रकारिता की गौरवशाली परम्परा खत्म हो गयी है। सम्पादक अब सम्पादन कार्य भूलकर मालिकों के निजी काम ज्यादा करने लगे हैं। जाहिर है, ऐसे में पत्रकारिता का उद्देश्य तो बदलेगा ही। बहरहाल इस खबर ने पत्रकारिता के गिरते स्तर और उसकी दिशा को लेकर अनेक सवाल खडे कर दिये हैं। अगर यह कहा जाए कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की हबड़-दबड़ पत्रकारिता ने अखबारों के रिपोर्टरों खासकर स्ट्रिंगरों  को भी सच के नाम पर इतनी तेजी से दौडा दिया है कि वे खुद हीं समाचार गढ़ने लग गए हैं।


लेखक उदय चंद्र सिंह पिछले पंद्रह वर्षों से टीवी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस समय ‘हमार टीवी’ में बतौर एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर (आउटपुट) कार्यरत हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।
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