आत्मकथ्य : मुसाफिर हूं यारों…(1)

sanjay

हरिभूमि, रायपुर के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी अब जी न्यूज 24 घंटे छत्तीसगढ़ के डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोडयूसर (एडिटर इनपुट) बने हैं। इस बदलाव के समय में संजय ने अपने जीवन के उन क्षणों को याद किया है जिन्हें आमतौर पर लोग सफलता मिलने के बाद भूल-से जाते हैं। बचपन से लेकर छात्र जीवन तक की शहर दर शहर यात्रा, शिक्षक से लेकर अखबारवाला फिर टीवीवाला बनने की यात्रा…। इन यात्राओं में काफी कुछ ऐसा रहा जिसे संजय दिल से याद करते हैं,  हमेशा याद रखना चाहते हैं।

14 साल से पत्रकारिता में सक्रिय  संजय अब तक दैनिक भास्कर, नवभारत, स्वदेश, इन्फोइंडिया डाटकाम जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं। वे कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में रीडर भी रह चुके हैं। उनकी अब तक मीडिया की विविध विधाओं पर 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। यहां पेश है संजय द्विवेदी का आत्मकथ्य…


मुसाफिर हूं यारों…

काले अक्षरों से कागज रंगते, टेबल पर झुके हुए कब चौदह कैलेंडर बीते, पता ही नहीं चला। इस बीच कलम थामकर कागज पर खेलने वाली उंगलियां की-बोर्ड पर थिरकने लगीं। प्रदेश और शहर बदलते गए, अखबार भी बदलते गए, अगर कुछ नहीं बदला तो वह थी इस कलम के साथ जुड़ी एक जिम्मेदारी। जिसकी धुन में जिंदगी की सबसे अहम चीज फुरसत छिन गई और खबरों के बीच ही बाकी की जिंदगी सोते, जागते, उठते, बैठते, खाते, पीते गुजरती है। एक शायर के इस शेर की तरह-

अब तो ये हालत है कि जिंदगी के रात-दिन,  सुबह मिलते हैं मुड़े अखबार में लिपटे हुए।

बस्ती : ये जो मेरी बस्ती है…

उत्तर प्रदेश के एक बहुत पिछड़े जिले बस्ती का जिक्र अक्सर बाढ़ या सूखे के समय खबरों में आता है। लगभग उद्योग शून्य और मुंबई, दिल्ली या कोलकाता में मजदूरी कर जीवनयापन कर रहे लोगों के द्वारा भेजे जाने वाले ‘मनीआर्डर इकानामीज पर यह पूरा का पूरा इलाका जिंदा है। बस्ती शहर से लगकर बहती हुई कुआनो नदी वैसे तो देखने में बहुत ही निर्मल और सहिष्णु लगती है, पर बाढ़ के दिनों में इसकी विकरालता न जाने कितने गांव, खेत और मवेशियों को अपनी लपेट में लेती है, कहा नहीं जा सकता।

बस्ती जहां खत्म होता है, वहीं से अयोध्या शुरू होता है। अयोध्या और बस्ती के बीच बहने वाली सरयू नदी लगभग वही करिश्मा करती है, जो कुआनो। इसके लंबे पाट पर कितने खेत, कितने गांव और कितने मवेशी हर साल बह जाते हैं जिन्हें देखते हुए आंखें पथरा सी गई हैं। हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का कविता संग्रह ‘कुआनो नदी’ इन्हीं विद्रूपताओं के आसपास घूमता है। सर्वेश्वर इस इलाके की गरीबी, बदहाली और दैनंदिन जीवन के संघर्ष से जूझती हुई जनता के आत्मविश्वास को रेखांकित करना नहीं भूलते।

वे एक कविता में लिखते हैं- गांव के मेले में / पनवाड़ी की दुकान का शीशा / जिस पर / इतनी धूल जम गई है / कि अब कोई अक्स दिखाई नहीं देता।’

सर्वेश्वर की यह कविता इस पहचान विहीन इलाके को बहुत अच्छी तरह से अभिव्यक्त करती है। यह वही शहर है, जहां मैं पैदा तो नहीं हुआ पर मेरा बचपन इसी शहर में बीता। इस शहर ने मुझे चीजों को देखने का नजरिया, लोगों को समझने की दृष्टि और वह पहचान दी, जिसे लेकर मैं कहीं भी जा सकता था और अपनी अलग ‘बस्ती’ बसा सकता था।

बस्ती मेरी आंखों के सामने जैसा भी रहा हो, लेकिन आजादी के बहुत पहले जब भारतेंदु हरिश्चंद्र एक बार बस्ती आए तो उन्होंने बस्ती को देखकर कहा- ‘बस्ती को बस्ती कहौं, तो काको कहौं उजाड़।’

आज का बस्ती जाहिर है उस तरह का नहीं है। एक लंबी सी सडक़ और उसके आसपास ढेर सारी सडक़ें उग आई हैं। कई बड़े भवन भी दिखते हैं। कुछ चमकीले शोरूम भी। बस्ती बदलती दुनिया के साथ बदलने की सचेतन कोशिश कर रहा है। बस्ती एक ऐसी जगह है, जो प्रथमदृष्टया किसी भी तरह से आकर्षण का केंद्र नहीं है। कुआनो नदी भी बरसात के मौसम को छोड़क़र बहुत दयनीय दिखती है, लेकिन साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में यहां के साहित्यकारों, पत्रकारों ने जो जगह बनाई है उससे बस्ती मुग्ध होते रहती है। हिंदी के समालोचना सम्राट आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जन्मभूमि अगौना इसी जिले में है। यह एक ऐसा साहित्यिक तीर्थ है, जिस पर बार-बार सिर झुकाने का मन होता है।

बस्ती शहर से बहुत थोड़ी दूर पर ही मगहर नाम की वह जगह है, जहां संत कबीर ने अपनी देह त्यागी थी। मगहर को कबीर ने क्यों चुना? यह वजह लगभग सब जानते हैं कि काशी में मरने से मोक्ष मिलता है। कबीर ने इस श्रद्धा को तोडऩे के लिए मगहर का चयन किया था। कबीर का कहना था कि- ‘यदि मैं काशी में मरता हूं और मुझे मोक्ष मिल जाता है, तो इसमें राम को क्या श्रेय।’ इसीलिए कबीर अपनी मृत्यु के लिए मगहर को चुनते हैं। हमें पता है कबीर की मृत्यु के बाद मगहर में उनके पार्थिव शरीर को लेकर एक अलग तरह का संघर्ष छिड़ गया। मुसलमान उन्हें दफनाना चाहते थे, तो हिंदू उनका हिंदू रीति से अंतिम क्रियाकर्म करना चाहते थे। इस संघर्ष में जब लोग कबीर के शव के पास जाते हैं, तो वहां उनका शव नहीं होता, कुछ फूल पड़े होते हैं। हिंदू-मुसलमान इन फूलों को बांट लेते हैं और अपने-अपने धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार इन फूलों का ही अंतिम संस्कार कर देते हैं। वहीं पर मंदिर और मस्जिद अगल-बगल एक साथ बनाए जाते हैं। एकता का यह स्मारक आज भी हमें प्रेरणा देता है।

यह एक संयोग ही है कि छत्तीसगढ़ के लोक गायक भारती बंधु मगहर में प्रतिवर्ष होने वाले मगहर महोत्सव में कबीर का गान करके लौटे हैं। बस्ती शहर में भी उन्हें सुना गया। कबीर इस तरह से आज भी विविध संस्कृतियों और प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र बने हुए हैं।  फिर बाद के दौर में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, डा. लक्ष्मीनारायण लाल, लक्ष्मीकांत वर्मा, डा. वागीश शुक्ल, डा. माहेश्वर तिवारी, श्याम तिवारी, अष्टभुजा शुक्ल जैसे कई ऐसे नाम हैं, जिन्होंने बस्ती को एक अलग पहचान दी है। यह अलग बात है कि रोजी-रोटी की तलाश में इनमें से ज्यादातर तो बड़े शहरों में ही ेअपना आशियाना बनाने के लिए चले गए और वहां उन्हें जो पहचान मिली उसने बस्ती को गौरव तो दिया, किंतु बस्ती का बस्ती ही रहा। सिर्फ और सिर्फ अष्टभुजा शुक्ल आज की पीढ़ी में एक ऐसे कवि हैं, जो आज भी सुदूर दीक्षापार नामक गांव में रहकर साहित्य साधना में लगे हैं।  

इसी शहर में बारहवीं तक की पढ़ाई के बाद मुझे भी उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ जाना पड़ा। यह एक संयोग ही है कि इस इलाके के ज्यादातर लोग उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। बचे-खुचे बनारस चले जाते हैं, पर जाने क्या हुआ कि मेरा प्रवेश लखनऊ विश्वविद्यालय में करवाया गया। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि मेरे पिता लखनऊ विश्वविद्यालय के ही छात्र थे। इस नाते उस विश्वविद्यालय से उनका राग थोड़ा गहरा रहा होगा। लखनऊ में गुजरे तीन साल छात्र आंदोलनों में मेरी अति सक्रियता के चलते लगभग उल्लेखनीय नहीं हैं। कालेज की पढ़ाई से लगभग रिश्ता विद्यार्थी का कम और परीक्षार्थी का ही ज्यादा रहा। जैसे-तैसे बीए की डिग्री तो मिल गई, लेकिन कैरियर को लेकर चिंताएं शुरू हो गईं। इस बीच कुछ समय के लिए बनारस भी रहना हुआ, और यहां मन में कहीं यह इच्छा भी रही कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की जाए।

…….जारी


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