ज्यादातर संवाददाता अकुशल हैं : जीएन राय

न्यायमूर्ति जीएन राय का संबोधनसंवाद माध्यम गैर-जिम्मेदार हैं : केएस सच्चिदानंद मूर्ति

पिछले सप्ताह नागपुर में तिलक पत्रकार भवन ट्रस्ट और दैनिक भास्कर के सहयोग से मीडिया वर्कशाप का आयोजन किया गया जिसका उदघाटन भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जीएन राय ने किया। कार्यशाला का विषय था- ‘आपात परिस्थिति में समाचार संकलन : संवाद माध्यमों के अधिकार और दायित्व’। कार्यक्रम की अध्यक्षता एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव केएस सच्चिदानंद मूर्ति ने की।

वर्कशाप में जीएन राय ने कहा कि आतंकी हमलों के समाचार संकलित करते समय सनसनी से बचना चाहिए। प्रकाशन एवं प्रसारण में नाटकीयता एवं अतिरेक का कोई स्थान न हो। न्यायमूर्ति राय ने यह भी कहा कि केवल प्रसार संख्या अथवा टीआरपी बढ़ाने के लिए संवेदनशील खबरों के साथ अन्याय नहीं किया जाए। आतंकी हमलों के संदर्भ में संवाद माध्यमों की तैयारी अधूरी है। मुम्बई आतंकी हमले के दौरान यह बात सामने आई।  सेना एवं सहायक सेना बल की तरह संवाद माध्यमों के लिए भी आतंकी हमला चुनौती है। ज्यादातर संवाददाता अकुशल हैं। विषय की वे समुचित जानकारी केएस सच्चिदानंद मूर्ति का संबोधननहीं रखते। केवल आतंकी हमला ही नहीं,  प्राकृतिक आपदा के समय भी समाचार संकलन के लिए संवाद माध्यमों के पास कोई ठोस योजना नहीं है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव केएस सच्चिदानंद मूर्ति ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि संवाद माध्यम गैर-जिम्मेदार हैं। संवाददाताओं को प्रशिक्षित कर गलतियों को कम किया जा सकता है। सम्पादकीय निर्णय ऐसे हों, जिनसे खबर के साथ न्याय हो। संवाद माध्यम विशेषाधिकार न लें,  उनके अधिकार आम व्यक्ति के अधिकारों से अलग नहीं हैं। घटना का सीधा प्रसारण करते समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बेहद सतर्क रहना होगा। मुद्रित माध्यमों में संवाददाता की समाचार कॉपी कई लोगों से होकर गुजरती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस प्रकार की स्थिति नहीं है। खबरों का संकलन तटस्थ होकर करें, खासकर तब जब सम्पादक संवाददाता की भूमिका अदा करता है।

सीखना है अभी और, बहुत कुछ है बाकी

मीडिया वर्कशाप में मंचासीन अतिथितिलक पत्रकार भवन ट्रस्ट एवं दैनिक भास्कर के सहयोग से नागपुर में आयोजित मीडिया कार्यशाला तीन सत्रों में चली। आतंकी हमलों का समाचार संकलन, नैसर्गिक आपदा, दुर्घटना की रिपोर्टिंग, रिपोर्टिंग और मानवाधिकार विषय पर वक्ताओं एवं विशेषज्ञों ने राय रखी। श्रोताओं ने सवाल पूछे। चर्चा में यह बात सामने आई कि पत्रकारों को और अधिक सीखने की जरूरत है। संवेदनशील खबरों को संकलित करने के लिए संवाद माध्यमों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। मानवाधिकार के विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखकर ही ठोस निर्णय पर पहुंचा जाए। संवेदनशील खबरों के संकलन पर जानकारों की राय : 

मीडिया वर्कशाप में मौजूद श्रोताएडवोकेट उज्जवल निकम ने कहा- ऐसा कानून बने जिसमें अपने कार्य के दुष्परिणामों की जिम्मेदारी संवाद माध्यम स्वीकार करें। सनसनी एवं घबराहट पैदा करने वाले शीर्षक न दिए जाएं। मुम्बई आतंकी हमले के सीधे प्रसारण से आतंकियों को कार्ययोजना तैयार करने में मदद मिली।  नक्सली, आतंकियों, डाकुओं एवं सरकार के बीच पत्रकारों की मध्यस्थता का भी कोई औचित्य नहीं है। 

यूरोपियन यूनिवर्सिटी और इस्ट एंड वेस्ट के चांसलर प्रो. एम के गौतम ने ऐसी पत्रकारिता की आवश्यकता जताई जिसमें सरकार को दुर्घटनाओं के  बारे में आगाह किया जा सके एवं जनता को तथ्यपूर्ण खबर मिले। केवल लोकप्रियता के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ न की जाए। प्रो. एम के गौतम ने नीदरलैंड का उदाहरण दिया- वहां विविध संस्कृतियों के लोग रहते हैं, पर आपदा के समय एक होकर निर्णय लेते हैं।

बाएं से दाएं- परंजय गुहा, प्रो. एमके गौतम, प्रकाश दुबे, योगेश चंद्र, डा. ललित मनगोत्रा, प्रफुल्ल मारपकवार, शीतला सिंह, वीएन राय, उज्जवल निकमजम्मू से आए डोंगरी के नामी साहित्यकार डा. ललित मनगोत्रा ने कहा- कई पत्रकार अकुशल एवं असुरक्षित हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में कार्यरत पत्रकारों के लिए सुरक्षा मुहैया कराना राज्य सरकार का कर्तव्य हो। आतंकी हमलों का समाचार संकलन कठिन कार्य है, सच मानिए यही पत्रकारिता के पेशे की असली परीक्षा है।

आज तक विशेष खोज दल के सम्पादक दीपक शर्मा की राय थी- आतंकियों से बातचीत करने में कोई हर्ज नहीं। सवाल यह है कि कौन पूछ रहा है? क्या पूछा जा रहा है? पूछने वाला कितना कुशल है? सजग है? आतंकियों को बातचीत में उलझाकर सुरक्षा एजेंसियों की मदद की जा सकती है। बातचीत के दौरान आतंकियों के छिपने की जगह का पता चल सकता है। इस तरह के प्रयोग में सफलता भी मिली है। यही पत्रकारिता के प्रति निष्ठा है। विदेशी संवादमाध्यमों का विचार गलत है कि भारतीय संवादमाध्यमों को आतंकी हमलों का समाचार संकलन करने का अनुभव नहीं है। उन्हें पता होना चाहिए कि भारतीय पत्रकारों के लिए आतंकवाद नया नहीं है।

आज तक-महाराष्ट्र एवं गोवा के प्रभारी मनीष अवस्थी ने कहा- गुप्त सूचना के आधार पर खबरें मिलती हैं। उन्हीं के आधार पर दमखम के साथ संवाददाता खबरों का संकलन करता है। समाचार लेखन एवं वाचन में शालीन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए।

जनमोर्चा के सम्पादक शीतला सिंह ने कहा- घटनाएं अंधेरे में नहीं होतीं। व्यावसायिक लाभ के लिए समाचार संकलन में बुरी प्रवृत्ति हावी हो रही है। संवादमाध्यम अपना लक्ष्य भूल रहे हैं। प्रसार संख्या, टीआपी और व्यावसायिक लाभ की होड़ लगी है।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का मानना था कि आपात्ï घटनाओं में संवादमाध्यम समय पर नहीं पहुंच पाता। यही कारण है कि खबरों से भ्रम पैदा होता है। सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी को पत्रकार मौलिक बनाने की कोशिश करता है। बहुत सारे दंगे संवादमाध्यमों की लापरवाही से हुए। केवल कानून बनाकर संवादमाध्यमों की गैर जिम्मेदारी पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता।

वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल मारपकवार ने कहा- एक हजार चैनल आ गए हैं। श्रमशक्ति नहीं है। कुशल पत्रकारों का अभाव है। जनप्रतिनिधि आरोप-प्रत्यारोप  में लगे रहते हैं। वे नहीं चाहते कि स्थिति नियंत्रित हो, इसलिए संवादमाध्यमों पर अफवाह एवं काल्पनिक खबर गढऩे का आरोप लगाते हैं। खूफिया एजेंसियों की सूचनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया।

एशियन डिफेंस टेलीविजन के सम्पादक योगेश चन्द्र की राय थी- शैक्षणिक स्तर पर पत्रकारिता का विकास नहीं हुआ। विद्यार्थियों को ऐसे लोग प्रशिक्षण दे रहे हैं जिन्हें पत्रकारिता का अनुभव नहीं। पेशेवर पत्रकारों की बहुत कम सेवा ली जा रही है।

टेलीविजन विशेषज्ञ परंजय गुहा ठाकुर्ता ने कहा- घटना के बाद पत्रकार जगत घटना के कारणों को खोजता है। पहले ही घटना की संभावना की तलाश क्यों नहीं की जाती? भारत के अलावा कोई देश ऐसा नहीं है, जहां चालीस समाचार चैनल हैं। स्पर्धा के कारण गुणवत्ता घटी है।

वरिष्ठ पत्रकार मिहिर गांगुली ने कहा- राजनैतिक महत्वाकांक्षा के लिए संवादमाध्यमों का दुरुपयोग हुआ है। संवाद माध्यम अफवाह भी फैलाते हैं। पुख्ता सूत्रों के हवाले से सहज शैली में खबरों का संकलन करना चाहिए।

टीवी पत्रकार रुचिर गर्ग का मानना था कि कई बार मानवाधिकार की बात करने वाले पत्रकार को नक्सली ठहरा दिया जाता है। दंतेवाड़ा या फैजाबाद की घटनाओं पर संवादमाध्यमों का ध्यान नहीं है। गांवों पर शहरों का बाजार हावी होता जा रहा है। संवादमाध्यमों को प्रिंट अथवा इलेक्टॉनिक में नहीं, व्यावसायिकता के वर्ग में बांटना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार चन्द्रकांत वानखेड़े ने कहा- ताज होटल पर हमला नहीं होता तो शायद पता ही नहीं चलता कि मुम्बई पर हमला हुआ है। शहीदों को सचिन शतक समर्पित करते हैं तो खबर बनती है? किसान आत्महत्या पर संवादमाध्यमों की संवेदना नहीं जागती! धनी भारत में किसान आत्महत्या मानवाधिकार का हनन है। इस आरोप में दम नहीं कि शराब के कारण किसान आत्महत्या करते हैं। बताने की जरूरत नहीं कि शराब की सबसे ज्यादा खपत किस वर्ग में होती है।

मानवाधिकार खोज एवं सलाह शिक्षा केन्द्र की अध्यक्ष थ्रिटी पटेल ने चेताया कि दूसरों के मानवाधिकार का हनन करने वालों को मानवाधिकार पर बात नहीं करना चाहिए। इसी तरह आतंकियों के लिए मानवाधिकार की बात करने का कोई औचित्य नहीं है। गरीबी, जातिवाद, राजनैतिक इच्छा का अभाव एवं गैर जिम्मेदार संवाद माध्यम भारत में मानवाधिकार के दुश्मन हैं।

दैनिक लोकमत के सम्पादक सुरेश द्वादशीवार ने कहा- आतंकियों का इंटरव्यू लेना पराक्रम नहीं है। सभी आतंकी लोकप्रियता चाहते हैं। सरकार, पुलिस पर टिप्पणी करने के लिए हिम्मत नहीं की जरूरत नहीं, आतंकियों पर टिप्पणी करने से हम क्यों डरते हैं? नक्सलियों के हाथों मारे गए आदिवासियों, पुलिस के लिए मानवाधिकार की बात नहीं की जाती? दहशतवाद कोई वाद नहीं। वे सभी आतंकी हैं जो आतंक फैलाते हैं चाहे राज्य हो, या जनता। जनता का विश्वास संवाद माध्यमों की शक्ति है, इसलिए पत्रकार निहत्था घूमता है। उसे सुरक्षा की जरूरत नहीं।

भारतीय प्रैस परिषद की सचिव विभा भार्गव ने कहा- बंदूक से आतंकी तन को मारते हैं। संवाद माध्यमों के जरिए प्रसारित आतंकियों के शब्द जनता के मस्तिष्क को मारते हैं। संवाद माध्यमों की अपनी भूमिका समझ लेनी चाहिए।

दि हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्यूरो प्रमुख प्रदीप मैत्र  ने कहा- समाचार संकलन के लिए शब्दों का उचित चयन बेहद जरूरी है। ग्रामीणों पर नक्सलियों एवं पुलिस दोनों का दबाव रहता है। पुलिस की सूचना को खबर न माना जाए। तथ्यों की जांच जरूरी है।

वरिष्ठ पत्रकार शिरीष बोरकर ने कहा- संवाद माध्यम पर जनता विश्वास करती है। शासकीय विभागों में इनका भय है।

दैनिक भास्कर के सम्पादक प्रकाश दुबे ने कहा- चर्चा से यही बात सामने आई है कि अब भी पत्रकारिता में बहुत कुछ सीखना बाकी है।  यह भूल जाएं कि टीवी अब भी बच्चा है। जीने की ललक हो तो सब जल्दी ही चलना सीख जाते हैं। अब और गलती नहीं।

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