करीबी मायूस, पूर्व हिंदुस्तानी प्रसन्न

क्या प्रमोद जोशी और नवीन जोशी भी जाएंगे : प्रमुख संपादक पद से मृणाल पांडे के इस्तीफे के बाद हिंदुस्तान ग्रुप में हड़कंप मचा हुआ है। दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जो लोग मृणाल पांडे के कार्यकाल में उपेक्षित रहे या निकाल दिए गए, उनके चेहरे तो खिले हुए हैं लेकिन हिंदुस्तान में काम कर रहे ज्यादातर स्थानीय संपादक और संपादकीय विभाग के ज्यादातर वरिष्ठ पदों पर काबिज पत्रकारों के चेहरों पर मायूसी है। सभी को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है। कहा जा रहा है कि मृणाल पांडे के जान के बाद दिल्ली संस्करण में नंबर दी की हैसियत प्राप्त वरिष्ठ स्थानीय संपादक प्रमोद जोशी भी इस्तीफा दे सकते हैं। इसी तरह लखनऊ में स्थानीय संपादक के रूप में कार्यरत नवीन जोशी के बारे में भी बताया जा रहा है कि मृणाल के जाने के बाद उनका स्थानीय संपादक पद पर लंबे समय तक बने रह पाना मुश्किल है। नवीन जोशी को प्रमोद जोशी के बाद मृणाल पांडे का तीसरा सबसे खास और ताकतवर आदमी माना जाता है। उधर, मृणाल पांडे के कार्यकाल में जिन वरिष्ठ पत्रकारों की अपमानित करके और बिना मौके दिए निकाल दिया गया था, वे लोग इस घटनाक्रम से बेहद खुश हैं। भड़ास4मीडिया से बातचीत में सभी लोग इसे प्रकृति का न्याय बता रहे हैं।

हिंदुस्तान अखबार में कई वर्षों तक काम करने के बाद एक दिन अचानक निकाल दी गईं वरिष्ठ पत्रकार इरा झा कहती हैं- जैसा बोया वैसा काटा। मैनेजमेंट बड़ा बेरहम होता है। मीडिया की जो दुनिया है, उसमें ज्यादातर के साथ ऐसा होता है। मुझे जब निकाला जा रहा था तो मैंने कहा था कि एक-एक कर सभी का नंबर आएगा। मुझे नहीं पता था कि मृणाल जी का इतना जल्दी नंबर आ जाएगा। मृणाल जी के जाने पर मेरे अंदर न खुशी है न उदासी। मुझे लगता है कि मृणाल जी का मैनेजमेंट ने खूब इस्तेमाल किया।

हिंदुस्तान, दिल्ली में कई दशक तक काम करने के बाद वरिष्ठ पत्रकार और नेशनल ब्यूरो के हेड विनोद वार्ष्णेय को भी एक दिन अचानक बाय बोल दिया गया था। उन्होंने मृणाल पांडे के जाने पर भड़ास4मीडिया से बातचीत के दौरान कहा-यह हिंदुस्तान अखबार के लिए अच्छा कदम है। मृणाल जी के अनप्रोफेशनल रवैये से अखबार को नुकसान हो रहा था। अब अखबार को उबरने में मदद मिलेगी। मृणाल जी की कार्यशैली और उनकी कोटरी उनके जाने का कारण बनी। वे अपने तारीफ करने वालों का गिरोह बनाकर जिस तरह संपादकीय विभाग का संचालन कर रहीं थीं, उससे मृणाल जी का कार्यकाल हिंदुस्तान अखबार के इतिहास में काले अध्याय के रूप में गिना जाएगा। जो संपादक अपने मेहनती, कुशल और अनुभवी सहयोगियों की रक्षा नही कर पाता, उनके साथ ऐसा होता ही है। एक साथ 18 सीनियर लोगों को दिल्ली के संपादकीय विभाग से छुट्टी कर दिया गया और उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई। वह दुखद घटना थी। मृणाल जी का जाना उस दुखद घटना का अगल चरण है। इस घटना से संपादकों को सबक लेना चाहिए कि जो संपादक अपने सहयोगियों का साथ नहीं देते हैं, वे इसी तरह से अपमानित होते हैं।

हिंदुस्तान अखबार में कई वर्ष तक काम करने के बाद इन दिनों नई दुनिया अखबार, दिल्ली में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रास बिहारी का कहना है कि मृणाल जी के राज में शक गैर-प्रोफेशनल माहौल बना। उनके कारण अच्छे लोगों को छोड़ना पड़ा। तमाम लोगों की नौकरियां तमाम हुईं। उन्होंने अपने खास लोगों को बढ़ाया। उनकी हां में हां मिलाने वाले आगे बढ़े। जो उनके विचार से सहमत नहीं होते थे, उन्हीं परेशानी उठानी पड़ती थी।

कई दशक तक हिंदुस्तान अखबार में नौकरी करने वाली शैलबाला भी उन वरिष्ठ लोगों में से हैं जिन्हें एक दिन अचानक हिंदुस्तान अखबार से हटा दिया गया था। शैलबाला ने भड़ास4मीडिया से कहा-ये तो होना ही था। प्रकृति तो न्याय करती ही है। मृणाल पांडे ने हम लोगों के साथ झल किया। हम लोगों से झूठ बोला। हर एडिटर की एक जुबान होती है पर मृणाल पांडे अपनी जुबान की पक्की नहीं निकलीं। मैंने उनसे पूछा था कि अगर हम लोगों की नौकरी पर कोई संकट है तो बता दीजिए, इस वक्त नौकरी का आफर है, कहीं दूसरी जगह ज्वाइन कर लूंगी। तब उन्होंने कहा था कि कहीं नहीं जाना है। आप लोगों का कांट्रैक्ट दो साल के लिए रीन्यू कर दिया गया है। नौकरी दो साल के लिए पक्की है। दो साल तक कोई नहीं हटा सकता। आगे भी एक्सटेंशन मिल सकता है। मैंने जब पूछा कि कहीं उम्र (55 वर्ष के बाद रिटायरमेंट से संबंधित) हम लोगों से इसने कहा कि आप लोगों की नौकरी पक्की है दो साल तक। कांट्रैक्ट रिन्यू कर दिया है। दो साल तक कोई नहीं हटा सकता। आगे भी एक्सटेंशन मिल सकता है। मैंने पूछा कि 55 प्लस का कोई चक्कर है तो उन्होंने कहा था कि मैं 62 साल की होकर काम कर रही हूं। ऐसा कोई चक्कर नहीं है। तब मैंने अपनी संपादक मृणाल पांडे की जुबान पर विश्वास कर यह बात उन सभी लोगों को बताई जा संस्थान छोड़ने के लिए तैयार बैठे थे। मैंने उन लोगों को रोकने की कोशिश की। मुझे लगा था कि मृणाल पांडे एडिटर हैं, वरिष्ठ हैं, झूठ नहीं बोलेंगी। पिछले साल 31 अक्टूबर तक हम लोग ठीक थे। मैंने निकाले जाने के कुछ दिन पहले ही दुबारा पूछा था कि दीदी, हम लोगों के लिए कहीं कोई प्राब्लम तो नहीं है। तब उन्होंने कहा था कि कुछ नहीं है, निश्चिंत रहो। पर एक दिन अचानक हम 18-20 लोगों को निकाल दिया गया। हफ्ते-दस दिन तक का समय भी नहीं दिया गया नई नौकरी खोजने के लिए। मुझे पता होता तो मैं गाड़ी भी नहीं खरीदती। अब इस गाड़ी का लोन चुकाना मुश्किल हो रहा है। प्रमोद जोशी को मैंने निकाले जाते समय कहा था कि आप दूसरों का बुरा करने वालों का खुद का बुरा हो जाता है। जो लोग दूसरों के पेट पर लात मारते हैं, आज नहीं तो कल भगवान उनके भी पेट पर लात मारेगा। यह प्रकृति का न्याय होता है। प्रकृति दंड देती है। मैंने कहा था कि प्रकृति इन्हें कड़ा दंड देगी। हमारे बच्चे की जो चीख और भूख है, वो इनके पेट पर लात मारेगी।

हिंदुस्तान, दिल्ली से हटाए गए वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला का कहना है कि मृणाल ने मेरिट की कभी कदर नहीं की। इनका अखबार से कोई मतलब नहीं रह गया था। इन्होंने तो अपनी पूरी पारी खेली। इनके साथ क्या बुरा हुआ। बुरा तो उन सैकड़ों लोगों के साथ हुआ जो काबिल होते हुए भी छलपूर्वक अचानक बाहर कर दिए गए। उन्हीं दिनों में हिंदुस्तान टाइम्स से एक भी आदमी नहीं निकाला गया। वीर सिंघवी ने साफ कह दिया था कि यहां से कोई नहीं जाएगा। लेकिन मृणाल पांडे प्रबंधन का खास बनने के चक्कर में वो सब कुछ करती रहीं जो किसी संपादक को शोभा नहीं देता। हर परिवार के मुखिया का दायित्व होता है कि वह पूरे परिवार के हित के लिए लड़े। पर मृणाल ने बेदाग करियर के लोगों को भी बाहर निकाल दिया।

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