घीसू, धनिया, होरी से बाजार नहीं चलता मृणालजी

मृणाल पांडे ने इस बार सर्वहारा के ज्ञान से लेकर बाजार और हिन्दी पत्रकारों की खोई गरिमा तक पर अच्छा भाषण दिया है। मैंने उन्हें काफी देर से पढ़ना शुरू किया है इसलिए उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता पर जो भी पढ़ा है उससे यही लगता है कि वे बड़ी उलझी हुई हैं और गुस्से में भी। यह विडम्बना ही है कि जीवन भर हिन्दी पत्रकारिता करने के बावजूद वे खुद को हिन्दी पत्रकारों की श्रेणी में नहीं रखती हैं। दूसरी ओर, 2002 में नौकरी छोड़ देने के बाद भी मृणाल जी हिन्दी पत्रकारों के बारे में जो सरलीकरण करती हैं उससे मैं आहत होता हूं। कोशिश करूंगा कि अब मैं उनका लिखा न पढ़ूं और इस तरह प्रतिक्रिया करने के लिए मजबूर न होऊं। इसीलिए मैंने जनसत्ता लेना बंद कर दिया पर यशवंत जी ने उनके आलेख को भड़ास पर प्रकाशित कर यह सब करने के लिए मजबूर कर दिया।

इस बार मृणाल पांडे ने लिखा है- मेरे इस प्रस्ताव से  कि हिंदी अखबारों के हर घालमेल का ठीकरा पहले वरिष्ठ संपादकीय कर्मियों पर फोड़ने और फिर उन्हीं से स्थिति बदलने की मांग करने के बजाय, क्यों न खुद आम पाठक भी जागरूक उपभोक्ता का दायित्व निभाते हुए ऐसे अखबारों का समवेत विरोध और बहिष्कार करें, एक महोदय बेहद गुस्सा हैं। उनकी राय में हिंदी अखबारों का आम पाठक तो एक ‘सर्वहारा’ है। पेट भरने की चिंता का उस पर दिन-रात उत्कट दबाव रहता है, इसलिए उससे लामबंद प्रतिरोध की उम्मीद करना गलत है। और उपभोक्तावाद तो नए पैसे का एक निहायत निंदनीय प्रतिफलन और उपभोग का बाजारू महिमामंडन है। इसलिए सर्वहारा को उपभोक्ता कहना उसका अपमान करना है।

मुझे नहीं पता मृणाल जी के ये महोदय कौन हैं पर वे सही हैं। उनका गुस्सा जायज है,  इसमें कोई शक नहीं है। और उन्होंने जो कहा है वही सही है। मृणाल जी जो चाहती हैं वह हो नहीं सकता। हिन्दी अखबारों के घालमेल का ठीकरा संपादकों पर ही (पिछली बार उन्होंने लिखा था जो मालिक भी हैं) फूटेगा, फूटना चाहिए। वैसे भी, जिम्मेदारी तो ऊपर वाले की ही होती है नीचे वाला तो बलि का बकरा ही बनता है। मालिकान संपादक को बनाएं तो अपनी स्थिति संपादक को ही स्पष्ट करनी होगी।

उन्होंने आगे लिखा है- …. आशय यह है कि भारत में सर्वहारा एक मूक, अपढ़, अनाथ वर्ग है जो सामूहिक तौर से शेष समाज की दया और अनंत इमदाद का ही पात्र ठहरता है। और इस वर्ग के हकों का परचम उसके बजाय हमारे मुखर-पढ़े-लिखे शहरी मीडिया को ही आगे आकर उठाना चाहिए। सर्वहारा और उपभोक्तावाद की ऐसी व्याख्या के तहत ‘सर्वहारा’ एक बे-चेहरा मानव समूह का मूक हिस्सा बन कर रह जाता है। हर आदमी के पास अपनी जो एक बुनियादी विशिष्टता और जीवन संघर्ष के दुर्लभ अनुभव हैं, जिसके बल पर हम साहित्य में घीसू, धनिया, लंगड़ और होरी जैसे अविस्मरणीय पात्रों से रूबरू होते रहे हैं, उसके प्रति ऐसे सपाट सर्वहारावाद में एक गहरा अज्ञान झलकता है। क्या हम भारत को अपने आदर्श सर्वहारापरस्त रूप में अगर एक व्यक्ति और बाजार निरपेक्ष देश मान लें? तो फिर उस अंतर्मुखी घोंघे के भीतर दुनिया की महाशक्ति बनने की उत्कट कामना क्यों?

इस मामले में यही कहा जा सकता है कि मृणाल जी जिसे साहित्य के घीसू, धनिया, लंगड़ और होरी जैसे अविस्मरणीय पात्रों के प्रति गहरे अज्ञान का प्रतीक बता रही हैं वह दरअसल बाजार के प्रति मृणाल जी का अज्ञान है। बाजार घीसू और होरी से नहीं चल रहा है – खासकर भारतीय बाजार का मालिक उसका मध्यम वर्ग है और रहा है। मध्यम वर्ग के विकास से ही बाजार का विकास जुड़ा है यह बाजार को जानने वाला बच्चा भी समझता है। दुनिया की महाशक्ति बनने की कामना घीसू और होरी रूपी अंतर्मुखी घोंघे की नहीं, दि ग्रेट इंडियन मिडि्ल क्लास की है।

मृणाल जी ने लिखा है- आज हर व्यक्ति जो बाजार में खरीदारी करता है, भले ही वह पाव भर आटा, पचास ग्राम नमक और दो हरी मिर्चें ही क्यों न मोलाए, एक उपभोक्ता है, और बतौर उपभोक्ता वाजिब कीमत पर ठीकठाक सामान पाने का उसे पूरा हक है।

इसमें कोई शक नहीं है पर यहां मृणाल जी जिस उपभोक्ता के बारे में कह रही हैं कि- …. फर्क यही है कि अक्सर उसे अपने इन हकों की जानकारी नहीं होती, और अगर होती भी है तो वह उनको बिना एकजुट हुए हासिल नहीं कर सकता। इसलिए गरीब उपभोक्ता को लगातार उपभोक्तावाद विषयक सटीक जानकारियां देना और अपनी विशाल बिरादरी के साथ एकजुट कानूनी गुहार लगाने का महत्व समझाना और भी जरूरी है।

सवाल उठता है किसलिए? पाव भर आटा, पचास ग्राम नमक और दो हरी मिर्च  खरीदने वाला उपभोक्ता वाल-मार्ट या बिग बाजार में जाता है क्या कि उसे एकजुट होकर लड़ाई लड़ने की जरूरत है। पाव भार आटा बेचने वाला बनिया इस गरीब ग्रामीण को कितना लूट लेगा कि हिन्दी पत्रकारों को अपनी ताकत इस नेक काम में लगा देना चाहिए। वह भी तब जब इन्हीं उपभोक्ताओं के बारे में वे आगे लिखती हैं, हर राज्य में हिंदी अखबार का गाहक आज औसत अंग्रेजी अखबार के गाहक से अधिक दाम देकर, अपेक्षाकृत कम पन्नों का अखबार खरीद रहा है, अलबत्ता सर्वहारा के हक के नाम पर दामन चाक करने वालों ने इस पर कुछ नहीं कहा-किया है। फिर भी बिहार के किसी छोटे से गांव से बस से शहर आकर रोज स्टाल पर रखे अखबारों में अपने काम की खबरों की तादाद चेक कर तब अखबार खरीदने वाला गरीब पाठक …. कहीं बेहतर उपभोक्ता हैं।

ऐसे में जिस उपभोक्ता की बात मृणाल जी कर रही हैं वह उन्हीं के हिसाब से अखबार भी ठोक पीट कर लेता है। जाहिर है उसे जो पसंद नहीं आएगा उसे नहीं लेगा, खबरों की जगह विज्ञापन छापने वाले अखबार नहीं खरीदेगा और वह शहरी उपभोक्ताओं से (अखबारों के) ज्यादा जागरूक है। शहरी उपभोक्ताओं के बारे में उन्होंने लिखा है, जो हाकर से अक्सर किसी प्रमोशन स्कीम के तहत (मुफ्त चाय या स्टील का डिब्बा या तौलिया पाने के लिए) महीनों के लिए एक अखबार बुक करा लेता है, वह पसंद हो या न हो। गांव-कस्बे का यह पाठक गरीब भले हो, पर वह अखबार का एक जागरूक पाठक है, जिसकी अपनी स्पष्ट पसंद, नापसंद है, और स्थानीय सरोकार भी। अगर वह एकजुट होकर अखबारों की ईमानदारी पर सवाल बुलंद करे, और भ्रष्ट अखबारों का बहिष्कार भी, तो स्थिति में स्थायी सुधार होगा, और जल्द होगा, क्योंकि बाजार अब तेजी से छोटे शहरों और गांवों की तरफ खिंच रहा है। और अगर ऐसा ही है तो हिन्दी पत्रकारों की यहां क्या भूमिका है? जो अखबार इस बाजार में जाएंगे इस लायक होंगे तो टिकेंगे नहीं तो पिटेंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा उपभोक्ता बाजार के लिए अच्छा नहीं होता।

मृणाल जी ने लिखा है, हम गहरे पानी में पैठ कर मोती खोजने के बजाय तट पर ही एकाध डुबकी लगा कर ‘हर हर गंगे’ का नारा बुलंद करने वाले देश के वासी हैं। यहां डुबकी लगा कर समय और मेहनत बचाए जाते हैं, जबकि धारा में पैठना निरंतर तैरने की क्षमता मांगता है, हजारों कष्टसाध्य, जोखिमभरी शैलियां सीखने का आग्रह करता है। हमारे पूर्वजों ने कभी सप्त सिंधु और अनगिनत महानदियों के देश में गहरे जाकर तैरने-तरने के कई लाभ भले गिनाए हों, पर सच तो यह है कि आज हम श्राद्ध से लेकर पर्व के अवसर तक तट पर खड़े हो…गंगे चैव यमुने गोदावरीसिंधुकावेरी…जपते हुए, तमाम नदियों का अपनी छोटी-सी अंजली में ही न्योत कर तृप्त हो जाते हैं। एक डुबकी लगाई और मान लिया कि सात पीढ़ियां तर गईं।

मृणाल जी को कौन बताए कि उनके लिखे के ही मुताबिक मोती ढूंढ़ने वाला तट पर एकाध डुबकी लगाकर नहीं आता है – वह हर हर गंगे का नारा बुलंद करने वाला होता है। इसी तरह तमाम नदियों को अपनी छोटी-सी अंजली में ही न्योत कर तृप्त हो जाने वाला मोती खोजने नहीं जाता वह आधुनिक पर धर्मभीरू है और उसमें इतनी हिम्मत नहीं है कि पाप करे पर गंगा न नहाए। वह आज की मारा-मारी और गला काट जिन्दगी में अपने लिए मोती चुन ले रहा है और पाप धोने की कोशिश भी कर रहा है। मोती वह नदी में नहीं सड़कों पर, बाजार में, कारखाने में, नई बनती इमारतों में और कभी-कभार शेयर बाजार में ढूंढ़ता और पाता भी है।

मृणाल जी चाहती हैं कि, पत्रकार बंधु अवयस्क किस्म की लीपापोती या सर्वहारावाद की ओट लेकर छिछोरी छींटाकशी करने से बाज आएं। क्यों न वे हिंदी अखबारों की बेहतरी पर गंभीरता से बात करें, नए बदलावों के बारे में अपने अनुभव साझा करें, पन्नों पर संपादकीय मैटर और विज्ञापन के इलाकों के बीच साफ-सुथरी विभाजक रेखाएं बनाने के लिए समवेत नीतियां रचें, ताजा खबरों के निरंतर सत्यापन और उससे जुड़े दायरों पर पत्रकारिता से इतर क्षेत्रों में हो रहे शोध की जानकारी लें, जमीनी भागदौड़ को खबरें जमा करने की बुनियादी जरूरत समझें और हिंदी को सिर्फ एक माध्यम नहीं, बल्कि जीवंत, निरंतर गतिशील कथ्य के रूप में भी देखें बरतें।

अव्वल तो पत्रकार वह सब कर नहीं रहे हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए और जो करने की अपेक्षा वे कर रही हैं वह उनका काम नहीं है और जो उनका काम है उसे वे कर ही रहे हैं। पत्रकारों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है खबरों की विश्वसनीयता बनी रहे। यह काम मुख्य रूप से मालिकों का था पर जब मालिकान ही पैसे लेकर खबरें छापने लगे तो उनके मुलाजिम होने के बावजूद पत्रकारों ने इसका विरोध किया, खुल कर किया और कर रहे हैं। यह उनका काम नहीं है, पर उनकी जरूरत है। मुख्य काम तो संपादकों और मालिकों को करना है पर प्रसार भारती की छत से मृणाल जी वही देख रही हैं जो देखना चाहती हैं। पत्रकारों को जो करना है वह न करे तो चाकरी कैसे चलेगी? जो चाकरी नहीं करते उनके बारे में वे अपने पिछले आलेख में लिख ही चुकी हैं, ब्लॉग-जगत के चंद नियतिहीन कोनों में हिंदी के कुछ मीडियाकर्मी न्यूयॉर्क की सड़कों पर पखावज बजा कर कीर्तन करने वाले हरे-कृष्ण अनुयायियों की तरह कुछेक सुरीले-बेसुरे नारे जरूर उठा रहे हैं; पर उनके सुरों में दम नहीं। हो भी कैसे? फिर भी, इस बार वे यह बतातीं कि वयस्क किस्म की लीपापोती से उनकी क्या अपेक्षा है तो बेहतर होता और हमारा कुछ मार्ग दर्शन भी हो जाता।

मृणाल जी कहती हैं, हिंदी पत्रकारिता के संकट से निबटने के लिए क्या जरूरी नहीं कि पहले हिंदी के पत्रकार खुद अपनी निगाहों में अपनी खोई गरिमा संजय कुमार सिंहपाएं और मनुष्य के नाते अपने आपको अपने प्रतिस्पर्धियों की बराबरी का तो महसूस करें? मृणाल जी से किसने कह दिया कि हिन्दी के पत्रकारों ने अपनी निगाहों में अपनी गरिमा खो दी है। मृणाल जी स्वयं को एक हिन्दी पत्रकार मानकर ऐसा कह रही हैं तब तो बात समझ में आती है पर तब यह चिन्ता सताने लगती है कि मृणाल जी अगर खुद को प्रतिस्पर्धियों की बराबरी का नहीं महसूस करतीं तो हमारी क्या औकात?

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे अनुवाद का काम बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। उनसे संपर्क [email protected] या 9810143426 के जरिए कर सकते हैं.

Comments on “घीसू, धनिया, होरी से बाजार नहीं चलता मृणालजी

  • विनीत कुमार says:

    बाजार की तो छोड़िए क्या मृणाल पांडे का ही काम चल जाता है. ऐसे लोग सेफ जोन में रहकर सिर्फ भाषणबाजी करते हैं।.

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  • संजय जी लगता कोई बड़ी चोट खाई है आपने मृणाल जी से। इतनी आलोचना तो नामवरसिंह भी किसी की नहीं करते हैं।

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  • Sanjayje, acceptence or non acceptance may be but one should not go on the path of opposition. You should know at first Geesu, Dhania and Hory who is Premchand’s story-novel mostest rememberal character and also a symbol of originator of market or it’s cocequenses.

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  • sanjay ji apne mrinal ji ke bare main lekin pehle apne kabhi apne giraba jhanki. aap ka carrier kya tha. pehle aap kya the. aap dalal the. aur suruyati dino main filmo ki tecket black karte the. bhool gaye. hindi patrakarita ke bare main aap jitna jante hain apki bhasa se legta. hindi jiski sabd main mithas, garima hoti hain wo apki bhasa main nahi, yahi nahi agar apki sachai bati di jaye to shayed hindi patrikarita ko sharm aa jaye ki apne noukri karne ke liye kya kya nahi kiya. kis had tak aap gire.

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  • radheshyam Tewai says:

    All most all Hindi Editors of the news papers and magazines are responsi’ble for death of Hindi Jounalism in the country. They let the Ex IAS,IFS, and IPS officials, professors of the universities grab the land of the Hindi Journalism of India by allowing them to write columns to their respective papers with honor and more remuneration than the real Journalists. They grabbed our land under the patronage of such editors who do not know the art of editing but they got the job some how ….every one knows, how? For me Mrinal ji one such editor who always misused the power of an editor and tried to overload with HIFi informstions to that Chaiwalk ,Thela wala ye wala wo wala, who had just started reading the news paper any how.The writeups and the special essays written by the ex IAS and professors of JNu were facilated with name and fame and the readers got indifferent What a bad luck of the country SiRJI She is not alone. there is a band of such incapable editors to hid own incapability they donated our land of Jounalism to these intellectuak white collared SeTh ji. Most of the Hindi retired professors are editing the Hindi magazines of India. Do not U think the art of editing is different than teaching a language in collages? then they cry Hindi Ptrika nahin Bkti. Bikegi kaise Bhaiya. Galat aadmi ko galat jagah par baitha diye ho. Bhugato. In logon ne bech diya journalism ko. sari Jamin bik gayee Now all the govt officials will be writing in the newspapers and the journalist will be be watching them helplessly.

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  • sandip thakur says:

    mrinalji ka kya hai,pancho ungali ghee aur sir karahi mei….moti salary per hindustan mei editor rahi,phir prasar bharati mei chali gayi hain.Grater kailash mein shandar makan mei rahati hain.pati IAS rah chuke hain.bache USA mein rahate hain.delhi mein garmi adhik hoti hai to USA chali jati hain.lambi car mein ghumti hain.dry fruits khati hain.hindi patrakaro ke garima lotane ke leye aaj tak mirnalji ne kuch nahe kiya,garima ko lekar bhashan khub deti hain. bolti metha hain,isi ke kamai kha rahi hain.

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  • Sanjay Bhai,
    Aap sahi kahte hain. Pata nahi kyon Jab bhi Mrinaljee ne Hindustan ke Edit Page per likha mujhe Samajh me nahi aya ki wo kahna kya chahati hain.ho sakta wo jo likhati hain meri samajh se bahar ki bat ho.
    Anil Singh

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  • Rakesh kumar says:

    कैसे चिंतक और पत्रकार हैं संजय जी…मृणाल जी की आलोचना के इर्द गिर्द ही हिन्दी पत्रकारिता का कल्याण देख रहे हैं…फिर इसमें भी इतना बड़ा विरोधाभास कि जिन मृणाल जी को नहीं पढ़ने के लिए जनसत्ता जैसे अखबार से तौबा कर ली उन्हीं मृणाल जी को भड़ास पर पढ़ने से नहीं रोक पाए… आपकी रुचि और समझ का ये कैसा परिष्कार हुआ है कि जनसत्ता छोड़कर भड़ास आपके लिए हर कीमत पर जरूरी बन गया…य़शवंत जो तो इसके लिए बहुत बहुत बधाई लेकिन संजय जी के लिए अफसोस…

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  • लोकेश प्रसाद आनन्द says:

    न भूलने वाले पात्र होरी, धनिया और घीसूकोपहले समझें
    संजय जी, सबसे पहले प्रेमचन्द के अविस्मरणीय पात्र होरी, धनिया और घीसू के बारे में जानकारी तो पा लें। उसकी दुखद संघर्ष गाथा की जानकारी पाएं और यह समझने का ढंग से प्रयास करें कि किस तरह से यह अविस्मरणीय एवं कालजयी चरित्र आज भी प्रासंगिक है। यही बाजार का वास्तविक जन्मदाता भी है। मृणाल जी ने इन बेमिसाल पात्रों की जिस मसले पर उदाहरण के तौर पर उपस्थित किया है, उसे बेहतर ढंग से समझा जाना जरूरी है। छिद्रान्वेषी होना ठीक है पर आलोचना के लिए आलोचना करना कतई तर्कसंगत नहीं है। अगर मृणाल जी जैसी अनुभवी और कद्दावर हिन्दी पत्रकार यह कहती हैं कि हिन्दी पत्रकारों को अपनी खोई हुई गरिमा पाने का प्रयास करना चाहिए, तो ऐसा आत्ममन्थन होना चाहिए कि कहां पर चूक हो रही है। बिहार के जिस हिन्दी पाठक वर्ग का मृणाल जी ने उदाहरण दिया है, वह वहां के निवासी इसे भली-भांति जानते हैं और यही कड़वा सत्य है।
    क्या संजय जी, आप यह नहीं जानते हैं कि शहरी पाठक वर्ग टिफिन डब्बे और छोटी-छोटी चीजों के लालच में आकर अखबार खरीदता है? लेकिन लालच जैसे ही पूरा हो जाता है, वैसे ही वह हट भी जाता है। ऐसे में कंटेट आज के समय में बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। पाठक वर्ग के पास अब इतना समय नहीं है कि वह अखबार को महज खबरात्मक सूचना के आधार पर देखे। खबर पाने के बहुत सारे माध्यमों का प्रचार-प्रसार हो चुका है और यह उनके पकड़ क्षेत्र से बाहर भी नहीं है। ऐसे में ज्ञान की उपयोगिता अब हिन्दी अखबार के लिए अनिवार्य सत्य बन चुका है। आप किसी को अपनी बात तभी सुनने के लिए बाध्य कर सकते हैं, जब आप उससे ज्यादा जानते हों। इसी तरह आप किसी को कुछ भी पढ़ने के लिए तभी मजबूर कर सकते हैं, जब आप उससे ज्यादा जानते हों। खबरों का भी एक बैंकग्राउण्ड होता है, जो अनिवार्य तौर पर कई तरह के विषयों के ज्ञान से सम्बंधित होता है। मसलन भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, सामाजिक-ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक इत्यादि। ऐसे में आलोचना के लिए आलोचना करना स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकती है। बेहतर हो कि शीर्ष हिन्दी पत्रकार इसे स्वीकार करें, तो हिन्दी पत्रकारिता जीवित व समकालीन हो पाएगी। अन्यथा काल के थपेड़ों से टकराकर अपनी मूल आवाज को खो देगी, क्योंकि हिन्दी पाठक वर्गका विशाल हिस्सा काफी पढ़े लिखे वर्गों का हो चुका है।
    लोकेश प्रसाद आनन्द
    पत्रकार

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  • ye mrinal bpaandey kaun hai aur hai kyaacheej apanee maa ke naam par saalkosal ht me jam kar kamaayee kee aur logo ko dukhi kiyaa we kya hai kya likhati hai jo hoeri dhania ki baat karatee hai

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