क्या! जो टॉयलेट में घुसा था, वो पत्रकार था?

: मुजरिम चांद (अंतिम भाग) : डाक बंगले से थाने की दूरी ज्यादा नहीं थी। कोई 5-7 मिनट में पुलिस जीप थाने पहुंच गई। सड़क भी पूरी ख़ाली थी। कि शायद ख़ाली करवा ली गई थी। क्योंकि इस सड़क पर कोई आता-जाता भी नहीं दिखा। हां, जहां-तहां पुलिस वाले जरूर तैनात दिखे। छिटपुट आबादी वाले इलाकों में सन्नाटा पसरा पड़ा था। रास्ते में एकाध खेत भी पड़े जिनमें खिले हुए सरसों के पीले फूलों ने राजीव को इस आफत में भी मोहित किया।

उसने कोई गाना भी गुनगुनाया। पर बहुत धीमे से। थाने पहुंच कर राजीव ने थोड़ी राहत की सांस ली। यहां किसी ने उसके लिए अपशब्द भी नहीं उच्चारे न ही गालियां। बल्कि यहां उसके लिए संबोधन भी बदला हुआ था। ‘तुम’ या ‘तू’ से बदल कर यह पुलिस वाले ‘आप-आप’ पर थे। न सिर्फ ‘आप’ पर बल्कि यहां पुलिस वालों ने उससे चाय पानी के लिए भी पूछा। पानी तो उसने पी लिया पर चाय के लिए मना कर दिया। यहां उसे बिठाया भी कुर्सी पर गया था। फिर भी एन.एस.ए. की काली छाया यहां भी मंडरा रही थी। खुसफुसाहट में ही सही ‘राज्यपाल’ का सर्वेंट क्वार्टर में जाना यहां भी चरचा का विषय था।

एक दरोगा ने उससे सहानुभूतिपूर्वक कहा भी कि, ‘कहीं खेत-वेत में चले गए होते। राज्यपाल के अड्डे पर जाने की क्या जरूरत थी?’

वह क्या जवाब देता। चुप ही रहा।

अब सिर पर दोपहर सवार थी लेकिन उसके छूट पाने की कोई राह नहीं निकल पा रही थी। जाने क्या सोच कर वहां बैठे एक इंस्पेक्टर से जो कि लखनऊ से आया था और उससे थोड़ी-थोड़ी सहानुभूति भी जता रहा था, राजीव ने बिना किसी भूमिका के सीधे-सीधे कह दिया कि, ‘हो सके तो वायरलेस पर एस.पी. से छोड़ने के बारे में पुछवा लें।’

‘एस.पी. साहब आप को जानते हैं?’ इंस्पेक्टर ने नरमी से पूछा।

‘मैं तो यह भी नहीं जानता कि यहां एस.पी. कौन है?’ राजीव ने साफ-साफ बताते हुए कहा, ‘तो कैसे कह दूं कि वह मुझे जानते हैं।’

‘फिर मैं कैसे पूछ सकता हूं?’ उसने उदास हो कर कहा।

‘आप एक बार फिर भी पूछवा लें।’ उसने जोड़ा, ‘बड़ी कृपा होगी।’

‘मैं नहीं पूछ पाऊंगा।’ उसने बिलकुल साफ-साफ बता दिया।

राजीव चुप हो गया।

तभी थाने में 5-6 स्थानीय पत्रकारों की टोली आ गई। वह फोटोग्राफर भी साथ था। सभी पत्रकारों ने राजीव से आत्मीयता जताते हुए कहा, ‘आप घबराइए नहीं। जल्दी ही कुछ इंतजाम हो जाएगा।’

‘आपके साथ कोई बदसुलूकी तो नहीं की इन लोगों ने?’ पुलिस वालों की ओर इंगित करते हुए एक बुजुर्ग पत्रकार ने राजीव से पूछा।

‘नहीं साहब, हम लोगों ने सम्मान सहित इनको बिठा रखा है!’ एक दरोगा बोला, ‘हम लोगों का वश चलता तो इन्हें छोड़ भी देते। पर क्या करें ऊपर का आदेश है। बेबस हैं हम लोग।’ उसने जोड़ा, ‘यह भी कोई जुर्म है?’

‘भाई साहब, सच बताइए कोई दिक्कत तो नहीं हुई?’ एक नया पत्रकार बोला।

‘नहीं यहां थाने में तो कोई बदसुलूकी नहीं हुई।’ राजीव बोला, ‘पर डाक बंगले में थोड़ी नहीं, ज्यादा बदसुलूकी हुई।’

‘अब वहां साहब पी.ए.सी. वाले थे। बाहर की और फोर्स थी। हम लोग नहीं थे।’ एक दरोगा बोला, ‘तो हम लोग क्या कर सकते थे!’

‘घबराइए नहीं भाई साहब।’ एक पत्रकार बोला, ‘पी.ए.सी. हो या मिलेट्री, सबको निपटाएंगे। पर पहले आपको यहां से छुड़ाने का बंदोबस्त हो जाए। बस।’

‘आप लोगों ने लखनऊ से आए प्रेस वालों को मेरे बारे में बताया कि नहीं?’ राजीव ने कहा, ‘वह लोग कम से कम राज्यपाल पर दबाव तो बना ही सकते हैं।’

‘लखनऊ वालों को जाने दीजिए भाई साहब। हम लोग काफी हैं।’ एक दूसरा पत्रकार सीना ठोंकते हुए बोला।

‘अरे नहीं बता तो दीजिए ही।’ राजीव ने जोर देकर कहा।

‘तो भाई साहब, जानिए कि लखनऊ वालों को भी बता दिया गया है।’ वह पत्रकार क्षुब्ध होता हुआ बोला, ‘पर वह लोग बोले कि पहले कवरेज कर लें, फिर देखते हैं।’

‘ऐसा कहा!’ राजीव चौंकते हुए बोला, ‘हमारे फोटोग्राफर को भी बताया?’ राजीव अफनाया हुआ बोला।

‘हां, पर वह भी कवरेज में हैं।’ वह पत्रकार बोला, ‘बल्कि वह तो कुछ बोला भी नहीं।’

‘गजब है यह तो!’ राजीव बोला, ‘यकीन नहीं होता।’

‘लेकिन इस बात पर तो यकीन कीजिए कि हम लोग पूरी तरह आपके साथ हैं।’ वह पत्रकार बोला।

‘देखिए राजीव जी, आप घबराइए बिलकुल नहीं।’ एक दूसरा पत्रकार जो अभी तक चुप था बोला, ‘हम लोग इस घटना के विरोध में कवरेज छोड़ दिए हैं। एक भी स्थानीय पत्रकार कवरेज नहीं करेगा! यह बात डी.एम. सहित पूरे प्रशासन को बता दी गई है।’ वह बड़े उत्साह से बोला, ‘कवरेज को गोली मार कर हम लोगों ने तीन टीम बनाई है। एक टीम यहां आपके साथ थाने में रहेगी। दूसरी टीम डी.एम. को लगातार फालो कर रही है और तीसरी टीम मंच के पास खड़ी है। मंच पर पुलिस वाले न सूचना दे रहे हैं न ही किसी को जाने दे रहे हैं।’ वह बोला, ‘तो भी हमारी तीसरी टीम वहां मंच के पास खड़ी है। राज्यपाल मंच से ज्यों उतरेंगे, त्यों वह टीम राज्यपाल को घेर लेगी। फिर प्रशासन की सारी कलई खोल देंगे।’

‘राज्यपाल को मेरे साथ हुई बदसुलूकी के बारे में भी बताइएगा। और यह भी कि मुझ पर यह लोग एन.एस.ए. लगाए जाने की बात कह रहे हैं।’ राजीव ने बताया।

‘लगाया तो नहीं है अभी?’ एक पत्रकार ने किसी दरोगा से पूछा, ‘क्या एफ.आई.आर. दर्ज हो गई है?’

‘अभी तो कोई लिखत-पढ़त नहीं हुई।’ दरोगा बोला, ‘अभी तो इन्हें सिर्फ बैठाए रखने का आदेश है।’

‘तो ठीक है, अभी लिखत-पढ़त करिएगा भी नहीं।’

फिर पत्रकारों की यह टोली वहीं थाने में मजमा लगा कर बैठ गई। थोड़ी देर में उनके लिए चाय बिस्किट भी आ गए। राजीव ने बिस्किट तो ले लिए पर चाय लेने से मना कर दिया।

थोड़ी देर बाद एक लंबी जम्हाई लेने के बाद एक दरोगा से राजीव ने थाने में रखे एक तख्त की ओर इंगित करते हुए कहा कि, ‘वहां थोड़ी देर लेट जाऊं क्या?’ उसने जोड़ा, ‘पूरा बदन टूट रहा है।’

‘हां-हां लेट जाइए।’ दरोगा बोला।

राजीव ने तख्त पर जाकर कोट उतार कर सिरहाने रख दिया और लंबा लेट गया।

थाने में वायरलेस कोई न कोई सूचना लगातार उगल रहा था। राजीव ने एक बार फिर एस.पी. से वायरलेस पर अपने छोड़े जाने के बाबत दरोगा से पूछने के लिए कहा। और यह भी कहा कि एस.पी. न मानें तो लखनऊ में डी.जी.पी. या होम सेक्रेटरी को इस बारे में सूचना बतवा दें। यह दोनों मुझे अच्छी तरह जानते हैं। और कि यह लोग जरूर छोड़ने के लिए कह देंगे। लेकिन दरोगा ने इस पर असमर्थता जता दी। बोला, ‘ज्यादा से ज्यादा हम एस.पी. साहब से पूछ लेते हैं।’ कह कर उस ने एस.पी. को दो-तीन बार काल कर राजीव को छोड़े जाने के बाबत पूछ लिया। उधर से कहा गया कि, ‘इस बारे में थोड़ी देर में बता दिया जाएगा।’ सुन कर राजीव की जान में जान आई। फिर कोई हर दस मिनट में राजीव वायरलेस पर यह बात पुछवाने लगा। लेकिन जवाब में हर बार सिर्फ शब्द भर बदल जाते पर ध्वनि वही होती कि, ‘थोड़ी देर बाद में बता दिया जाएगा।’ और जब इस बाबत वायरलेस मैसेज ज्यादा हो गया तो उधर से लगभग डांटते हुए कहा गया कि, ‘आइंदा सेट पर इस बारे में कोई बात नहीं की जाए!’ सुनकर दरोगा तो कांप गया कि अब उसकी ख़ैर नहीं है।

राजीव भी उदास हो गया।

थोड़ी देर बाद राजीव को जाने क्या सूझा कि वह बड़बड़ाने लगा। उसके इस बड़बड़ाने में पूरा पुलिस सिस्टम समा गया। वह लगभग चिल्लाने लगा कि, ‘बताइए ब्रिटिश रूल चला रखा है। किसी का टट्टी-पेशाब भी जुर्म हो गया है।’ वह बोलता जा रहा था, ‘फिर कोई जबरदस्ती तो मैं डाक बंगले में घुसा नहीं था!’ राजीव का बड़बड़ाना जब ज्यादा हो गया और दो-तीन स्थानीय पत्रकार भी उसके साथ शुरू हो गए तब एक दरोगा बड़ी सर्द आवाज में बोला, ‘नाहक हम लोगों पर आप लोग गुस्सा उतार रहे हैं। मामला अधिकारी लेबिल का है। गुस्सा भी उन्हीं लोगों पर उतारिएगा!’

बात राजीव को भी ठीक लगी। सो वह चुप लगा गया। तभी हेलीकाप्टर की गड़गड़ाहट सुनाई दी। थाने के लोग भी बाहर निकल गए। हेलीकाप्टर देखने। जरा देर बाद हेलीकाप्टर पास के मंडी समिति परिसर में उतर गया। ऐसी सूचना वायरलेस पर दी गई। बताया गया कि फिल्म कलाकार दिलीप कुमार आ गए हैं और समारोह स्थल की ओर जा रहे हैं।

राजीव दिलीप कुमार का आना सुन कर बेचैन हो गया। पुलिस वालों से बोला, ‘इसी के लिए तो मैं यहां आया था।’ उसने पुलिस वालों से रिक्वेस्ट की कि, ‘थोड़ी देर के लिए उस पर यकीन कर उसे छोड़ दें।’ वह बोला, ‘दिलीप कुमार से इंटरव्यू करके मैं तुरंत वापस चला आऊंगा। फिर आप लोग एन.एस.ए. क्या एन.एस.ए. का बाप लगा दीजिएगा!’ राजीव लगातार यही बात दुहराता रहा। बल्कि एक स्थानीय पत्रकार ने कहा भी कि, ‘बतौर जमानत हम दो-तीन लोग राजीव जी की जगह बैठ जाते हैं। लेकिन इन्हें थोड़ी देर के लिए चले जाने दीजिए !’

‘यह फिल्मी लोगों का बहुत अच्छा इंटरव्यू लेते हैं, कल आप लोग भी पढ़िएगा। बहुत मजा आएगा!’ एक दूसरे पत्रकार ने भी कहा। पर पुलिस वाले, ‘नौकरी चली जाएगी!’ सूत्र वाक्य बोलते रहे और राजीव को बिना किसी आदेश के एक सेकेंड के लिए भी छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

राजीव कुढ़ कर रह गया।

तभी थाने के सामने वाली सड़क से दिलीप कुमार का काफिला गुजरा। और राजीव ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’ की सी स्थिति में थाने में किसी तोते की तरह फड़फड़ाता रहा। गोया पिंजड़े में कैद हो! वह फिर से तख्त पर लेट गया। लेटे-लेटे उसने एक स्थानीय पत्रकार को बुलाया। कुछ पैसे देते हुए बोला किसी पी.सी.ओ. से लखनऊ होम सेक्रेटरी को फोन कर के सारी स्थिति बता दीजिए।’ उसने जोड़ा, ‘कोई और चारा नहीं है।’ कह कर उसने फोन नंबर भी बताया।

‘होम सेक्रेटरी मुझसे बात करेंगे भला?’ पत्रकार उदास होता हुआ बोला।

‘हां भई, बिलकुल करेंगे।’ राजीव ने कहा, ‘बहुत भले आदमी हैं। वह सबसे आसानी से बात कर लेते हैं। और फिर कोई दिक्कत हो तो आप उनके स्टाफ से मेरे बारे में बता दीजिएगा। बात हो जाएगी।’

‘छोड़िए भाई साहब, थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा। लखनऊ दिल्ली की कोई जरूरत नहीं है।’ एक दूसरा पत्रकार बोला, ‘थोड़ा समय तो दीजिए हम लोगों को!’

‘और फिर राज्यपाल के बारे में होम सेक्रेटरी तो क्या चीफ सेक्रेटरी भी कुछ नहीं कहेंगे।’ इंस्पेक्टर बोला, ‘यहीं राज्यपाल से माफी वाफी मांग कर मामला निपटा लीजिए!’ उसने जोड़ा, ‘वैसे भी प्रेसीडेंट रूल में गवर्नर राज चल रहा है। किस की हिम्मत है गवर्नर के मामले में टांग अड़ाने की?’

राजीव फिर चुप हो गया।

‘आना तो यार आमिर ख़ान को भी चाहिए था।’ एक पत्रकार उदास होता हुआ बोला।

‘क्यों?’ एक पुलिस वाला खटका लगाता, तंबाकू ठोंक कर खाता हुआ बोल बैठा, ‘वह भी क्या दिलीप कुमार की तरह निठल्ला बैठा है जो दौड़ा चला आएगा?’ वह बोला, ‘उसके पास तो फिल्मों की लाइन लगी पड़ी है। तो वह क्यों आएगा यहां?’

‘इसलिए कि वह यहीं का रहने वाला है।’ पत्रकार बोला, ‘अभी भी उसका घर यहां है। उस के ग्रैंड फादर नासिर हुसैन ख़ान तो कभी कभार आते भी हैं।’ वह बोला, ‘तभी तो डिग्री कालेज के लिए दो लाख रुपए आमिर ख़ान ने भिजवाए हैं। मंच से इस बात की एनाउंसमेंट भी हुई है।’ वह बोला, ‘समझे महाराज!’

‘अच्छा!’ कह कर वह पुलिस वाला विस्मित हो गया। पर आमिर ख़ान प्रसंग जल्दी ही बिसर गया।

हां, थाने में पुलिस वालों की अलग और पत्रकारों की अलग पर मिली-जुली खटर-पटर फिर भी जारी थी। तरह-तरह की। दिलीप कुमार की, उनकी फिल्मों की, उनकी हिरोइनों की, उनकी सख़्ती, उन के ट्रेजिडी किंग होने और इस सबसे भी ज्यादा उनके ‘लीगी’ होने, उन के निःसंतान होने और उनकी दूसरी शादी तक की चरचाओं-बखानों से पूरा थाना गमगमा रहा था। समूचे थाने में दो ही गूंज थी। एक वायरलेस की, दूसरी दिलीप कुमार की।

निःशब्द था तो सिर्फ राजीव। आहत और अपमानित। अफनाता और छटपटाता हुआ।

वह मन ही मन दिलीप कुमार से पूछे जाने वाले सवालों की फेहरिस्त में उतरता हुआ उनसे दिल्ली में हुई पहली मुलाकात की यादों में डूब गया। उनकी कलफ लगी उर्दू और ठसके में डूबी अंगरेजी की याद ने हालांकि उसे बोर किया फिर भी उनकी अदाकारी, उनका अंदाज और उनकी खुली बातें उसे उनसे मिलने के लिए फिर अकुलाने लगीं। पर कोई भी कोशिश अब उसे बेमानी जान पड़ी।

बेमानी ही था थाने में तख्त पर उसका इस तरह से लेटना भी! वह पछता रहा था सुबह-सुबह नींद ख़राब कर इस तहसीलनुमा कस्बे में आ कर। इस तरह बेवजह अपमानित और आहत होकर। वह खौल रहा था और सवाल पूछ रहा था। अपने आप से ही कि अगर दिलीप कुमार से एक इंटरव्यू और करने की तमन्ना नहीं की होती तो क्या आप के कॅरियर की कोई कलगी टूट कर समुद्र में डूब कर खारी तो नहीं हो गई होती? पूछ यह भी रहा था कि इस तरह अपमानित और आहत होकर आप के व्यक्तित्व का शीशा जिस कसैलेपन से टूटा है उसकी सरगोशी में सिर उठा कर आप चल भी सकेंगे? क्योंकि शहरे लखनऊ आप बाद में पहुंचेंगे, आप की यह अपमान-कथा पहले पहुंचेगी। क्या पता कवरेज में जुटे किसी जांबाज ने यह अपमान कथा मय क्षेपक और रूपक कथाओं के पठा भी दी हो! फिर किस-किस को और क्या-क्या जवाब देंगे आप?

क्या पता?

अभी तो वह यही सोच कर सन्न था कि फर्जी आरोप के तौर पर ही सही खुदा न खास्ता जो उस पर एन.एस.ए. मढ़ ही दिया गया तो वह आख़िर करेगा क्या? उस पर तो जो बीतेगी, बीतेगी ही, उसके परिवार पर क्या बीतेगी? बीवी और बच्चे कैसे दिन गुजारेंगे। इस यातना कथा को वह कैसे और कितने दिन बांचेगा।

उसने सोचा। और बारहा सोचा।

हिसाब लगाया एन.एस.ए. की प्रक्रिया में गुजरने वाले दिनों का। अदालतों में खर्च होने वाले पैसों का। और ख़ुद पर जबरिया चस्पा हो गए इस अपमान की आंधी का। थाना प्रपोज करेगा एस.पी. को एन.एस.ए.। एस.पी. डी.एम. को। फिर डी.एम. प्रशासन को। शासन हाईकोर्ट में एडवाइजरी बोर्ड को एप्रूवल के लिए भेजेगा। इतने में ही तीन-चार महीने तो कम से कम लगेंगे। फिर तारीख़, पेशी का कोर्स। और फिर वह कोई माफिया या पैसे वाला तो है नहीं कि अदालतों में लाखों रुपए सुंघा कर अपने ऊपर लगे एन.एस.ए. को रिजेक्ट करवा लेगा, तमाम आरोपों की पुष्टि के बावजूद! वह तो शायद कायदे का वकील भी नहीं खड़ा कर पाए। और क्या पता बिन अपराध के एन.एस.ए. में वो क्या कहते हैं सरकारी हिंदी में कि कहीं ‘निरुद्ध’ न कर दिया जाए!

तो?

इस ‘तो’ का उसके पास कोई जवाब नहीं था। और एन.एस.ए. की काली छाया उसके मन में ऐसे टहल रही थी गोया कोई विषधर सर्प टहल रहा हो। और लगातार डस लेने की धौंस दे रहा हो। वह इस सर्पदंश से कैसे बचे? क्या करे कि यह एन.एस.ए. की काली छाया मन से निकाल बंगाल की खाड़ी में डाल दे! पर कोई तरकीब, कोई राह उसके पास तुरंत तो नहीं ही थी। न कोई इसका जवाब!

लेकिन उसने देखा कि पुलिस वालों से राजीव की गिरफ्तारी का जवाब एक वकील मिमिया कर ही सही मांग रहा था। मिमिया कर ही कचहरी से ले कर थाने तक अपनी बात कहना भले ही सही क्यों न हो! और फिर जैसे न्याय नहीं भीख मांग रहे हों के अंदाज में ‘हुजूर-हुजूर’ कह कर कोर्निश बजाना तहसील स्तर के वकीलों की शायद नियति बन गई है। नहीं, शायद गलत सोच गया राजीव। तहसील स्तर के ही वकील क्यों? क्या हाईकोर्ट के वकील नहीं मिमियाते हैं? मिमिया कर ही न्याय की भीख या अपराधी की जमानत दांत निकाल कर नहीं मांगते हाईकोर्ट के वकील? भीख का कटोरा भर जाए तो भी और जो न भरे तो भी हिनहिनाना वह नहीं भूलते ‘मी लार्ड’ के आगे। फर्क सिर्फ इतना भर होता है कि तहसील वाला वकील हिंदी में ही-ही कर हिनहिनाता और मिमियाता है तो हाईकोर्ट वाला वकील अंगरेजी में हिनहिनाता और मिमियाता है। हिंदी में लोग देख लेते हैं। और अंगरेजी में नहीं देख पाते। बस! यह ही एक फर्क है।

तो यहां थाने में भी यह वकील साहब ही-ही करते हुए हिनहिनाते हुए मिमिया रहे थे कि, ‘हुजूर आप हमें सिर्फ इतना बता दें कि एक ‘प्रतिष्ठित’ आदमी को यहां घंटों से किसलिए बैठाए हैं?’ वह सवाल पर सवाल धरे जा रहा था, ‘आख़िर जुर्म क्या है?’
‘जुर्म यह है कि इन्होंने वी.वी.आई.पी. सिक्योरिटी तोड़ी है।’ बड़ी देर से इस वकील को घूर रहे एक दरोगा ने बड़ी बेरुखी से जवाब दिया।

‘कौन सी धारा लगाई है आपने? और क्या एफ.आई.आर. लिखी गई?’ वकील ने मिमियाहट में थोड़ी कंजूसी बरतते हुए पूछा।
‘एन.एस.ए. लगने की बात है। एफ.आई.आर. अभी नहीं लिखी गई है। बड़े अधिकारी जब आएंगे तभी उनके निर्देश पर लिखी जाएगी।’ दरोगा फिर बेरुखी से बोला, ‘मामला गवर्नर साहब का है।’

‘गवर्नर क्या नागरिक नहीं होता?’ सवाल किया राजीव ने।

‘आप हुजूर जरा चुप रहें।’ वकील राजीव के कंधे पर हाथ रखता हुआ दरोगा से बोला, ‘आई.पी.सी. के बारे में आप जानते हैं?’

‘हां, थोड़ा बहुत!’ वह दरोगा जरा दब कर बोला।

‘नहीं जानते आप। न आप, न आप के अफसरान!’ वकील फिर दरोगा पर भारी पड़ता हुआ बोला।

‘आप ही बता दें।’ दरोगा वकील की बातों में अब दब रहा था।

‘हम आपको क्यों बताएं?’ वकील बोला, ‘अच्छा चलिए, थोड़ी देर में यह भी बता देंगे। पर पहले आप यह बताएं कि इन्होंने वी.वी.आई.पी. सिक्योरिटी तोड़ी। चलिए यह माना। पर यह बताएं कि गवाहा कौन हैं?’

‘अफसरान होंगे।’

‘कौन से अफसरान। नाम बताएं।’

‘नाम हमको नहीं मालूम। अफसरान आएंगे तो बताएंगे।’

‘चलिए ठीक।’ वकील ने जोड़ा, ‘दूसरे यह बताइए कि इनके पास से क्या-क्या चीज बरामद हुई?’

‘क्या मतलब?’

‘आपने तो इन्हें अरेस्ट किया है?’

‘हां, मौका ए वारदात से।’

‘वही तो पूछ रहा हूं कि इनके पास से क्या-क्या बरामद हुआ?’

‘क्या मतलब है आपका?’

‘यही कि इनके पास कितना पैसा था?’

‘पैसे की तलाशी नहीं हुई है?’

‘छोड़िए। पैसा शायद ज्यादा इनके पास होगा भी नहीं। क्यों?’ कहकर उसने राजीव की ओर देखा। तो राजीव ने उसकी सहमति में सिर हिला दिया। फिर मुसकुराया। लेकिन वकील ने सवाल फिर दुहराया, ‘बताइए कि क्या बरामद हुआ इनके पास से?’

‘आप क्या जानना चाहते हैं?’ दरोगा बिदका, ‘सवाल आप अफसरान आएं तो उनसे करिए!’

‘आएंगे तो उनसे भी करूंगा। लेकिन रोक चूंकि आप लोगों ने रखा है अफसरों ने नहीं, वह भी बिना एफ.आई.आर. के तो पूछना भी आपसे ही पड़ेगा।

‘पूछिए!’ दरोगा संक्षिप्त सा बोला।

‘तो बताइए कि इनके पास से क्या बरामद हुआ?’

‘क्या बरामद करवाना चाहते हैं आप?’

‘हम क्यों बरामद करवाएंगे।’ वकील हंसता हुआ दरोगा से बोला, ‘हुजूर आप बड़े भोले हैं। मैं सिर्फ इतना सा जानना चाहता हूं कि क्या इनके पास से कोई हथियार मसलन चाकू, पिस्तौल, कट्टा, बंदूक क्या बरामद हुआ है?’

‘ऐसे किसी भी हथि