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न्यूज चैनल कई पैंतरे अपनाएंगे ही

[caption id="attachment_15417" align="alignleft"]पुण्य प्रसून वाजपेयीपुण्य प्रसून वाजपेयी[/caption]आर्थिक तौर पर कमजोर और राजनीतिक तौर पर मजबूत बजट को देश में संकट की परिस्थितियों से जोड़ कर कैसे दिखाया जाए, न्यूज चैनलों के सामने यह एक मुश्किल सवाल है। यह ठीक उसी तरह की मुश्किल है, जैसे देश में बीस फीसदी लोग समझ ही नहीं सकते कि प्रतिदिन 20 रुपये की कमाई से भी जिन्दगी चलती है और उनकी अपनी जेब में बीस रुपये का नोट कोई मायने नहीं रखता है। कह सकते हैं कि न्यूज चैनलों ने यह मान लिया है कि अगर वह बाजार से हटे तो उनकी अपनी इक्नॉमी ठीक वैसे ही गड़बड़ा सकती है, जैसे कोई राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद देश की समस्याओं को सुलझाने में लग जाये। और आखिर में सवाल उसी संसदीय राजनीति पर उठ जाये, जिसके भरोसे वह सत्ता तक पहुंचा है।

पुण्य प्रसून वाजपेयीआर्थिक तौर पर कमजोर और राजनीतिक तौर पर मजबूत बजट को देश में संकट की परिस्थितियों से जोड़ कर कैसे दिखाया जाए, न्यूज चैनलों के सामने यह एक मुश्किल सवाल है। यह ठीक उसी तरह की मुश्किल है, जैसे देश में बीस फीसदी लोग समझ ही नहीं सकते कि प्रतिदिन 20 रुपये की कमाई से भी जिन्दगी चलती है और उनकी अपनी जेब में बीस रुपये का नोट कोई मायने नहीं रखता है। कह सकते हैं कि न्यूज चैनलों ने यह मान लिया है कि अगर वह बाजार से हटे तो उनकी अपनी इक्नॉमी ठीक वैसे ही गड़बड़ा सकती है, जैसे कोई राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद देश की समस्याओं को सुलझाने में लग जाये। और आखिर में सवाल उसी संसदीय राजनीति पर उठ जाये, जिसके भरोसे वह सत्ता तक पहुंचा है।

जाहिर है, ऐसे में न्यूज चैनल कई पैंतरे अपनाएंगे ही। जो खबर और मनोरंजन से लेकर मानसिक दिवालियेपन वाले तक को सुकुन देने का माध्यम बनता चले। सरकार का नजरिया भी इससे कुछ हटकर नहीं है। जनादेश मिलने के बाद पहला बजट इसका उदाहरण है। आम बजट में पहली बार उस मध्यम वर्ग को दरकिनार किया गया, जिसे आम आदमी मान कर आर्थिक सुधार के बाद से बजट बनाया जाता रहा। ऐसे में पहला सवाल यही उठा कि क्या वाकई आर्थिक सुधार का नया चेहरा गांव-किसान पर केंन्द्रित हो रहा है क्योंकि बजट में ग्रामीण समाज को ज्यादा से ज्यादा धन देने की व्यवस्था की गयी।

जब बहस आर्थिक सुधार के नये नजरिये से बजट के जरिये शुरु होगी तो अखबार में आंकड़ों के जरिये ग्रामीण जीवन की जरुरत और बजट की खोखली स्थिति पर लिखा जा सकता है। लेकिन हिन्दी न्यूज चैनलो का संकट यह है, उसे देखने वालो की बड़ी तादाद अक्षर ज्ञान से भी वंचित है। यानी टीवी पढ़ने के लिये नहीं, देखने-सुनने के लिये होता है। बजट में किसान, मजदूर, पिछडा तबका, अल्पसंख्यक समुदाय के हालात को लेकर जिस तरह की चिंता व्यक्त की गयी, उसमें उनके विकास को उसी पूंजी पर टिका दिया गया, जिसके आसरे बाजार किसी भी तबके को समाधान का रास्ता नहीं मिलने नहीं दे रहा है। यानी उच्च या मध्यम वर्ग की कमाई या मुनाफा बढ़ भी जाये तो भी उसकी जरुरते पूरी हो जायेगी, यह सोचना रोमानीपन है। इतना ही नहीं सरकार मुश्किल हालात उसी आर्थिक सुधार के जरीय खड़ा कर रही है, जिस सुधार के आसरे ज्यादा मुनाफा देने की बात कर वह बाजारवाद को बढ़ाती है। यानी ज्यादा से ज्यादा पूंजी किसी भी तबके को इस व्यवस्था में थोडी राहत दे सकती है…बड़ा उपभोक्ता बना सकती है। लेकिन देश का विकास नहीं कर सकती क्योंकि उसका अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। और सरकार इस इन्फ्रास्ट्रक्चर को बनाने की दिशा में जा नहीं रही है। न्यूज चैनलों का सबसे बडा संकट यही है कि वह सरकार की सोच और ग्रामीण भारत के माहौल को एक साथ पकड़ नहीं पा रहे हैं…

…इसके आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें- अंधेरे दौर में, अंधेरे के गीत

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