धंधेबाज अखबारों-चैनलों को छोड़ेंगे नहीं

प्रभाष जोशीमीडिया पर लोक निगरानी : यह जानते हुए भी कि पिछड़ों, दलितों और वाम सरोकारों के तथाकथित रक्षकों की राय में मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है, हमने हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के दौरान मीडिया के बर्ताव और व्यवहार का अध्ययन करवाना शुरू कर दिया है। लोकहित के लिए जीवन भर पत्रकारिता करने वाले कुछ दुर्लभ पत्रकारों के साथ भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक और विद्यार्थी, नयी दिल्ली के मीडिया स्टडी सेंटर की मीडिया लैब, मुंबई के मेंटॉर स्कूल और दूसरी और मीडिया संस्थानों ने अपने साधन और लोग इस अध्ययन में लगाये हैं। इससे अपने अखबारों और खबर चैनल के उम्मीदवारों और पार्टियों से काला धन लेकर विज्ञापनों और प्रचार सामग्री को खबर बना कर छापने और प्रसारित करने का काला धंधा तो सही है कि रुकेगा नहीं। लेकिन चुनाव के बाद एक विश्वसनीय अध्ययन जरूर हाथ में होगा।

इसे भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को इस निवेदन के साथ दिया जा सके कि चुनाव जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किस तरह पलीता लगाया जा रहा है और प्रेस की स्वतंत्रता को इस देश के नागरिकों के हितों के बजाए अवैध व्यापारिक तौर-तरीकों से नष्ट किया जा रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद जब हमने इन संस्थानों के दरवाजे पर दस्तक दी थी तो पैसे और वह भी काले धन से ख़बरों को बेचने और आचार संहिता का उल्लंघन करके प्रचार पाने की प्रति ये दोनों ही संस्थान सजग थे। लेकिन चुनाव के दौरान मीडिया के विरुद्ध चुनाव आयोग की सीमाएं हैं और भारतीय प्रेस परिषद भी जब तक ख़बरों को बेचने के काले धंधे का व्यवस्थित अध्ययन करके पुख्ता सबूत इकट्ठे नहीं कर लेती, न कार्रवाई कर सकती है, न सरकार को सुझा सकती है कि कानून में कैसे परिवर्तन किए जाने चाहिए कि मीडिया की इस कुप्रवृति पर अंकुश लगाया जा सके। प्रेस परिषद और चुनाव आयोग – दोनों को ही नागरिकों, पत्रकारों और उम्मीदवारों की ओर से अनगिनत शिकायतें मिली थीं। लेकिन चुनाव आयोग उम्मीदवारों के खर्च में पैसा देकर छपवाई गई ख़बरों को तभी शामिल कर सकता है जब इसके लेन-देन के पुख्ता सबूत उसके पास हों। उसके पर्यवेक्षक चुनाव के दौरान इस पर निगरानी तो रख सकते हैं, इसे रोक नहीं सकते। एक मुख्य चुनाव आयुक्त ने तो कुछ बरस पहले ही कहा था कि हमारी जानकारी में है कि ख़बरों का काला धंधा चल रहा है। लेकिन संवैधानिक संस्थानों को कार्रवाई करने के पहले जांच और सबूत जुटाने पड़ते हैं। मीडिया के व्यवहार की जांच करने के साधन और तामझाम उसके पास नहीं हैं। वह जानता है कि काला धन देकर प्रचार सामग्री को ख़बरों की तरह छपवाना भ्रष्ट चुनाव बर्ताव में आता है। लेकिन इस पर अंकुश लागने की कोशिश करे तो मीडिया उसकी मदद कनरे के बजाए उसके पीछे पड़ जाएगा क्योंकि इस भ्रष्टाचार में वह खुद शामिल है। उम्मीदवार और पार्टियां मीडिया से चुपचाप समझौता कर लेते हैं और यह दोनों के हित में है कि वे न इसे जाहिर होने दें न इस भ्रष्टाचार की कोई लिखत-पढ़त करें।

उम्मीदवारों को यह बहुत पसंद आता है कि पैसा देकर वे जो चाहे छपवा और प्रसारित करवा सकते हैं। स्वतंत्र प्रेस का जो ख़तरा हर उम्मीदवार के माथे मंडराता रहता है और ख़िलाफ़ जा सकने वाली ख़बरों का जो डर बना रहता है सिर्फ़ वही समाप्त नहीं होता, दूसरे उम्मीदवारों के प्रचार की धार भी भोथरी की जा सकती है। प्रेस उस पर निगरानी रखने और जीतने-हारने के उसके मौकों की स्वतंत्र और निष्पक्ष पड़ताल करने के बजाए चुनाव प्रचार में उसका सहयोगी हो जाता है। एक लोकतंत्र और एक चुनाव में इससे बड़ी नियामत क्या हो सकती है कि प्रेस उसके जरखरीद गुलाम की तरह काम करे। पिछले चुनाव में आपने देखा ही कि किस तरह एक पेज पर सभी उम्मीदवार भारी मतों से जीत रहे थे। उम्मीदवारों और राजनेताओं और पार्टियों की इस मिलीभगत के कारण ही तो अख़बारों का हौसला बना रहता है। वे जानते हैं कि इस भ्रष्ट व्यापारिक आचरण के खिलाफ जो कार्रवाई कर सकते हैं वही तो उनके साथ शामिल हैं और इसलिए इसके संरक्षक हैं। अख़बारों की पोल खुलेगी तो पोल तो उम्मीदवारों की भी खुलेगी जो चुनाव आयोग और अदालत से अयोग्य ठहराए जाने के बाद जीता-जिताया चुनाव हार सकते हैं। न अख़बार अपने कामों की नैतिकता पर टिके रहने को मजबूर हैं और न नेता आदर्श आचार संहिता के पालन पर। इसलिए यह काला धंधा खूब फल-फूल रहा है।

लेकिन अख़बारों और राजनेताओं के हित-स्वार्थ मिले हुए हैं, इसलिए कोई भ्रष्ट आचरण सदाचार तो नहीं माना जा सकता। न नेता इसे राजनीति के स्तर पर उचित ठहरा सकते हैं। न अख़बार इसे वैध और उचित व्यावसायिक व्यवहार बता सकते हैं। ख़बरें दुनिया भर में वही मानी जाती हैं जिनका पैसा नहीं लिया गया है और जो लोक हित में अख़बार ने अपनी तरफ से ढूंढ और जांच-पड़ताल करके छापी हैं। पाठक अख़बार ख़बर के लिए पढ़ता है विज्ञापन के लिए। अगर विज्ञापन ही ख़बर है तो अख़बार सिर्फ़ विज्ञापन छाप कर देख लें। और जान लें कि उनकी क्या हालत होती है। यह भी सही है कि सिर्फ़ ख़बरों और विज्ञापन के बिना भी अख़बार नहीं चल सकते। चूंकि दोनों जरूरी हैं इसलिए ख़बर और विज्ञापन के बीच पाठक के विश्वास की एक लक्ष्मण रेखा अनिवार्य है। अख़बार काली कमाई के लिए इस विभाजक रेखा को जान-बूझ कर तोड़ते हैं। उन्हें डर नहीं है कि जल जाएंगे। कार्रवाई करने वाले मनमोहन सिंह ने खुला खेल फर्रूखावादी चला रखा है। पैसे के आगे दंडवत करने वाला मीडिया हर सरकार को प्यारा होता है। और मीडिया को वे नेता और सरकारें पसंद होती हैं जो उनका भंडार भर सकें।

इस भ्रष्टाचार को चलने नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह पत्रकारिता और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरनाक है, इसका अहसास भारतीय प्रेस परिषद को है। उसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति जी एन खरे आजकल अपने हर भाषण में इस ख़तरे की बात करते हैं। उनने परिषद के दो सदस्यों को इस भ्रष्ट आचरण पर जरूरी सामग्री जुटाने को लगाया है और जल्द ही परिषद एक बड़ी जांच समिति बैठाने वाली है, जिसमें पत्रकारों के अलावा प्रतिष्ठित नागरिक और सभी हितों के प्रतिनिधि होंगे जो इसे रोकने के व्यावसायिक, नैतिक और कानूनी उपाय सुझाएंगे। समय जरूर लगेगा। यह भी सही है कि प्रेस परिषद के न दांत हैं न नाखून। लेकिन उसकी कार्रवाई ऐसा नैतिक वातावरण बना सकती है जो सभ्य समाज और सरकार को उचित कार्रवाई को मजबूर कर सकती है। अपने न्यायमूर्ति सूचना के अधिकार के तहत अपनी संपत्ति और संसाधनों की घोषणा करने को तैयार नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट भी नहीं चाहता था कि सूचना के अधिकार का कानून उस पर लागू हो। लेकिन लोकमत का करिश्मा देखिए कि अब एक के बाद एक न्यायमूर्ति अपनी संपत्ति की घोषणा कर रहे हैं। लोकतंत्र में आखिर लोकमत ही सबसे शक्तिशाली औजार है।

प्रेस परिषद को सिक्योरिटीज ऐंड एक्सचेंज बोर्ड यानी सेबी ने भी एक पत्र लिखा है। सेबी ने परिषद का ध्यान उन प्राइवेट ट्रीटीज की तरफ़ खींचा है जो मीडिया समूह बड़ी-बड़ी व्यापारिक कंपनियों से कर रहे हैं। इन निजी संधियों या समझौतों में मीडिया समूह कंपनी के शेयरों को पाकर कंपनी के ब्रांड को अपने अख़बार के जरिए आगे बढ़ाने और प्रचारित करने का समझौता करते हैं। सेबी को डर है कि इन निजी समझौतों से हितों का संघर्ष पैदा होगा। मीडिया के पास जिन कंपनियों के शेयर होंगे और जिनकों बढ़ावा देने का समझौता उनने किया है उनके बारे में सच्ची, सही और उचित जानकारी देने में मीडिया घरानों को अपनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता से समझौता करना पड़ सकता है। इससे प्रेस की स्वतंत्रता पर तो विपरीत असर होगा ही, छोटे-बड़े निवेशकों के हित भी मारे जाएंगे क्योंकि उन्हें कंपनियों के शेयरों के बारे में सही और सच्ची जानकारी नहीं मिलेगी। जिन ब्रांडों को आगे बढ़ाने और प्रचारित करने का ठेका अख़बारों ने लिया है और जिनके शेयर खुद अख़बार के पास हैं क्या वे उनके ख़िलाफ़ जरूरी होने पर ख़बर छापेंगे। सेबी को डर है कि ऐसा नहीं होगा।

अब मजा देखिए कि सेबी का काम प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की रक्षा करना है ताकि वे बाजार में लूट न लिए जाएं। कहीं से भी उसकी जिम्मेदारी प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं है। यह जिम्मेदारी और धर्म अख़बारों और उनके घरानों का है क्योंकि स्वतंत्र प्रेस के बिना लोकतंत्र नहीं चल सकता और लोकतंत्र में प्रेस भी पाठक समाज के सामने उतनी ही जवाबदेह है जितना निर्वाचित नेता जनता और संसद के प्रति। लेकिन अपनी स्वतंत्रता और पाठकों के प्रति जिम्मेदारी की चिंता किए बिना अख़बार घराने कंपनियों से निजी समझौते किए जा रहे हैं जिनसे उनकी स्वतंत्रता से समझौता उन्हें करना पड़ेगा। सेबी ने प्रेस परिषद के पत्र में ऐसे समझौते के जो कागजात नत्थी किए हैं वे सब अपने को भारत का मास्ट हेड बताने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया के हैं जो मुनाफे के लिए पत्रकारिता के हर सिद्धांत को ठेंगा दिखाने में अग्रणी है और जिसने ख़बरों को पैसे लेकर छापने का काला धंधा शुरू किया है।

अंग्रेजी पत्रकारिता में लगे हमारे दो प्रतिष्ठित पत्रकार मित्रों ने लोकसभा चुनाव के बाद बार-बार कोशिश की कि जिन अखबारों ने पैसा लेकर उम्मीदवारों के विज्ञापनों को ख़बर बना कर छापा, उन्हें एक मंच पर बुलाया जाए और अपने इस काम का औचित्य बताने का मौका दिया जाए। बार-बार कोशिश करने पर उनने हां भरी। लेकिन सभा के पहले एक ने मना किया और फिर उसका नाम लेकर बाकी के अखबारों ने भी मना कर दिया। कार्यक्रम और बहस नहीं हो सकी। वे सदाशयी और लोक हितकारी सज्जन अब भी अपनी कोशिश में लगे हैं इसलिए उनके नाम नहीं लिख रहा हूं। लेकिन इतना साफ है कि काला धन लेकर विज्ञापन को ख़बर बनाने वाले अख़बार न तो पाठकों के प्रति जवाबदेह होना चाहते हैं न अपने काले धंधे पर सार्वजनिक बहस करने को तैयार हैं। इसलिए हम महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में उनके बर्ताव का अध्ययन कर रहे हैं। और कुलदीप नैयर के साथ हमने तय किया है कि मीडिया पर लोक निगरानी का लोक संगठन खड़ा किया जाए।


साभार : ‘कागद कारे’, जनसत्ता

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